<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421</id><updated>2012-02-08T04:51:38.402-08:00</updated><category term='सेक्स और धोखा'/><category term='ये साली जिन्दगी'/><category term='फिलमें देखी'/><category term='मैन विद मूवी कैमरा'/><category term='दांये या बांये'/><category term='ब्लैक स्वान'/><category term='बांध पर फिल्म'/><category term='बवंडर'/><category term='सिनेमा पर'/><category term='फिल्म फेस्टिवल'/><category term='स्क्रीनिंग'/><category term='सोल्जर्स ब्लू'/><category term='फिल्में देखी'/><category term='निलिता वचानी'/><category term='सुपरमैन आफ मालेगांव'/><category term='फिल्मों पर'/><category term='ओसियान'/><category term='डेज़ आफ हैवन'/><category term='इन टू द वाईल्ड'/><category term='द अदर सौंग'/><category term='ब्लू वैवेट'/><category term='कार्यशाला'/><category term='आक्रोश'/><category term='मेरी सोच'/><category term='भोजपुरी फिल्में'/><category term='सिनेमाथैक'/><category term='आईज आफ स्टोन'/><category term='रौकस्टार'/><category term='कविताई'/><category term='नेश्नल अवार्ड'/><category term='बहसतलब- भाग 2'/><category term='सिनेमा'/><category term='चिल्ड्रन आफ पायर'/><category term='बहसतलब'/><category term='डाक्यूमेंट्री फिल्म'/><category term='लव'/><category term='फिल्मों से'/><category term='कुरुसावा के सपने'/><category term='डौक्यूमेंटी फिल्म'/><title type='text'>पिक्चर हौल</title><subtitle type='html'>एक कोशिश उन तक पहुंचने की जिन्हें फिल्मों से प्यार है।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>36</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-4071273630138354054</id><published>2011-12-21T14:55:00.000-08:00</published><updated>2011-12-21T14:55:55.749-08:00</updated><title type='text'>ब्लू वैलेन्टाईन: एक खूबसूरत तनाव</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-SlJ4TClrXzM/TvJgZP58ToI/AAAAAAAAAuI/_1IQ8x48rKc/s1600/blue+vel+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="171" src="http://4.bp.blogspot.com/-SlJ4TClrXzM/TvJgZP58ToI/AAAAAAAAAuI/_1IQ8x48rKc/s320/blue+vel+2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-gnEqCu92L9E/TvJifLCX4zI/AAAAAAAAAuo/Et55TuFh6ys/s1600/bluevalentinebdcap1_original.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;"You Got to be careful that person you fall in love is worth it to you.." &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; "How can you trust your feelings when they can disappear like that.."&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-4TxjKkZ279k/TvJgbl638nI/AAAAAAAAAuQ/VCj1M5g-mcg/s1600/blue+vel+3.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-chjXWra3Uco/TvJgpcGQbeI/AAAAAAAAAug/8GTXzMlWv9s/s1600/blue-valentine-ver3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/-chjXWra3Uco/TvJgpcGQbeI/AAAAAAAAAug/8GTXzMlWv9s/s320/blue-valentine-ver3.jpg" width="220" /&gt;&lt;/a&gt;किसी से प्यार करते वक्त जो बात सबसे जरुरी है वो ये कि इस बात का पूरा ध्यान रखा जाये कि जिससे आपको प्यार हो रहा है वो इस लायक है भी कि नहीं कि उसे प्यार किया जा सके। ये बात भले ही थोड़ा अटपटी लगे लेकिन ब्लू वैलेन्टाईन यही बात व्यावहारिक ढ़ंग से समझाती है...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;अक्सर हम अपनी भावनाओं के वश में आकर प्यार करते हैं... भावनाओं का भरोसा करते हैं.... इम्पल्सेज का कहा मान लेते हैं....फिर वो भावनाएं एक संसार रचती हैं... हमें अपनी असल जिन्दगी के समानान्तर एक जीवन जीने को देती हैं... हम उस जीवन को जीने लगते हैं... पर एक दिन वक्त के किसी हिस्से में हमारा असल जीवन उस समानान्तर खड़ी हो गई दुनिया से टकरा जाता है... वही टकराहट भावनाओं के द्वारा रची गई हमारी दुनिया को सबसे खतरनाक मोड़ पे ले आती है... वहीं पता चलता है कि हमारी भावनाओं का फैसला कितना सही या कितना गलत था.... ब्लू वैलेन्टाईन देखकर यही बात कितनी आसानी से समझ आ जाती है... एक सवाल खड़ा करती सी कि हम उन भावनाओं का भरोसा कैसे कर सकते हैं जो एक दिन अचानक कहीं खो जाती हैं... जो अक्सर एक झूठे रास्ते पर ले जाते हुए वक्त के किसी मोड़ पर हमें मजधार में छोड़कर ख्ुाद कहीं गुम हो जाती हैं। उनकी जगह नई भावनाएं ले लेती हैं... पुरानी भावनाओं को बेमतलब कर देती सी... &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-8acLeQ3L2gg/TvJgns9x1JI/AAAAAAAAAuY/fmOocO8hhPM/s1600/Blue-Valentine-movies-wallpaper.jpeg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://4.bp.blogspot.com/-8acLeQ3L2gg/TvJgns9x1JI/AAAAAAAAAuY/fmOocO8hhPM/s320/Blue-Valentine-movies-wallpaper.jpeg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;डैन और सिंडी पेन्सेल्वेनिया में एक दिन मिलते हैं... हाईस्कूल ड्रौपआउट डैन जिसके लिये पोटेन्शियल का मतलब केवल पैसे कमाकर बड़ा आदमी बनना नहीं है....एक मूविंग कम्पनी में सामान ट्रांसपोर्ट करने का काम करता है... और सिंडी प्रीमेडिकल की स्टूडैंट है जो अपने खराब रिश्तों से जूझ रहे मां बाप के साथ रहती है और अपनी दादी की देखभाल करती है.... दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगते हैं... दोनों के बीच सेक्स होता है...सिंडी प्रेग्नेंट होती है और अपने जीवन में आये इस इक्कीसवे आदमी से सेक्स कर चुकी सिंडी को पता चलता है कि ये बच्चा डैन का नहीं है...वो अबोर्सन कराना चाहती है पर ठीक औपरेशन के वक्त वो अपना फैसला बदल लेती है... डैन उस बच्ची को अपना लेता है...दोनों शादी कर लेते हैं.... लेकिन धीरे धीरे उनका रिश्ता वक्त की जंग खाता सा कमज़ोर पड़ने लगता है...सिंडी चाहती है कि डैन कुछ ऐसा करे जो बड़ा हो... कुछ ऐसा जिससे दोनों खुश रह सकें... पर वो ठीक ठीक क्या चाहती है दोनों में से किसी को नहीं पता... डैन ये जानना चाहता है लेकिन सिंडी के पास इस बात का जवाब नहीं है... धीरे धीरे सिंडी बस यही समझ पाती है कि उनके बीच चीजें वर्क आउट नहीं हो सकती... उसके असंतोष का कोई हल नहीं निकल सकता...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-4TxjKkZ279k/TvJgbl638nI/AAAAAAAAAuQ/VCj1M5g-mcg/s1600/blue+vel+3.jpg" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="171" src="http://4.bp.blogspot.com/-4TxjKkZ279k/TvJgbl638nI/AAAAAAAAAuQ/VCj1M5g-mcg/s320/blue+vel+3.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;फिल्म में एक साथ दो कहानियां एक दूसरे के पैरलल चल रही होती हैं...एक जिसमें डैन और सिंडी का रिश्ता शुरु हो रहा है...दूसरी, जिसमें वही रिश्ता धीरे धीरे खत्म हो रहा है.... अतीत को उसकी पीठ पीछे झुटलाता सा एक वर्तमान....&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;फिल्म के अंत में अतीत का एक हिस्सा चर्च में उनको पति पत्नी के रिश्ते में बांध रहा&amp;nbsp; है और वर्तमान का एक हिस्सा उनके रिश्ते में स्पेस की दरकार पैदा करता सा हमेशा के लिये खत्म हो रहा&amp;nbsp; है ... अपने बीच की कड़ी उनकी बच्ची की इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करता सा... &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-gnEqCu92L9E/TvJifLCX4zI/AAAAAAAAAuo/Et55TuFh6ys/s1600/bluevalentinebdcap1_original.jpg" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="192" src="http://3.bp.blogspot.com/-gnEqCu92L9E/TvJifLCX4zI/AAAAAAAAAuo/Et55TuFh6ys/s320/bluevalentinebdcap1_original.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पूरी फिल्म में एक बेहद खूबसूरत तनाव है... एक बनते और टूटते रिश्ते की कौम्प्लिेक्सिटी है... कहीं कोई बड़ा ड्रामा नहीं है....सब कुछ ऐसे हो रहा है जैसे कोई फिल्म न हो असल जिन्दगी हो... जिसमें वक्त दो हिस्सों में बंटकर एक साथ हमारी आखों के सामने बह रहा हो... एक ऐसी नदी बनकर जो धीरे धीरे सूख रही है... &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-4071273630138354054?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/4071273630138354054/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=4071273630138354054' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4071273630138354054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4071273630138354054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='ब्लू वैलेन्टाईन: एक खूबसूरत तनाव'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-SlJ4TClrXzM/TvJgZP58ToI/AAAAAAAAAuI/_1IQ8x48rKc/s72-c/blue+vel+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-605160908636679318</id><published>2011-11-13T14:47:00.001-08:00</published><updated>2011-11-13T16:09:29.130-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रौकस्टार'/><title type='text'>नादान परिंदे घर आजा.....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-gNC8kaD4efk/TsBLdvugkQI/AAAAAAAAAto/34WHHpFRpHU/s1600/Rockstar-1.jpg" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-gNC8kaD4efk/TsBLdvugkQI/AAAAAAAAAto/34WHHpFRpHU/s320/Rockstar-1.jpg" width="182" /&gt;&lt;/a&gt;कुछ दिन पहले भवन्स कौलेज में रौकस्टार के प्रोमोशन का लाईव शो देखते हुए कई सारे टैक्निकल एरर हुए तो कुछ शक सा हुआ। स्टेज के दोनों ओर दो एलिवेटर लगे थे जिन्हें नर्गिस फखरी और रणबीर कपूर को उनके परफोर्मेंस के बाद नीचे वापस पहुचाना था। रणबीर तो वापस पहुंच गये लेकिन नर्गिस का एलिवेटर गच्चा दे गया। फिर रहमान के गाते वक्त पियानो खराब हो गया तो उन्हें अपना गाना स्किप करना पड़ा। वहां दोनों ओर लगी स्क्रीन्स पर जो प्रोमो दिखे उनमें नर्गिस की खराब एक्टिंग का अक्स दिख चुका था। पर साडडा हक एथ्थे रख का जो औरा था उसने फिल्म देखने का मन बनाने को मजबूर कर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-WVx4J-G7css/TsBLg3o_KxI/AAAAAAAAAt4/KuT7yY1780g/s1600/Rockstar-4.jpg" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-E4NgScBLUho/TsBLfPeY_UI/AAAAAAAAAtw/cZu9tJIiTmU/s1600/rockstar-3.jpg" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;बीती रात, साढ़े नौ बजे के शो की आनलाईन बुकिंग, एचडीएफसी के डेबिट कार्ड से टाजिंक्शन में फिर एक टैक्निकल एरर आने की वजह से केंसिल हो गई। पर फिल्म तो देखनी थी। सोचा जाके देखें शायद औन द स्पौट कोई जुगाड़ हो जाये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुहु के चन्दन सिनेमा हौल पहुंचे तो जैसे चमत्कार हुआ हो। लम्बी लाईन और भीड़ से नाउम्मीद हुए ही थे कि दोस्त भागता हुआ पांच टिकिट ले आया। कैसे ...का जवाब देते हुए उसने बताया कि गार्ड ने जैसे ही कहा कि यहां एक और लाईन लगालो तो वो कूदकर लाईन में सबसे पहले जा लगा। टिकिट लेने वालों की भीड़ में नई लाईन का फायदा उठाते हुए शो शुरु होने से आधे घंटे पहले हम पाचों दोस्त टिकिट पा चुके थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंदन सिनेमा के हौल में घुसते ही एक रफ सा फील आता है। फेम एडलैब्स या फन रिपब्लिक के सोफिस्टिकेटेड कार्पेट्स से अलग एक खुरदुरी सी ज़मीन पे चलते हुए सरकारी सी कुर्सियों पर बैठते हुए लगता है कि हम जेएनयू की किसी फिल्म स्क्रिनिंग का हिस्सा हो गये हों। रौकस्टार जैसी फिल्म को देखने के लिये इससे बेहतर माहौल और क्या हो सकता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म एक न्यूज़रील सा फील देती सी शुरु होती है जिसमें एक आदमी को विदेशी पुलिस पकड़ रही है....फिर&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-E4NgScBLUho/TsBLfPeY_UI/AAAAAAAAAtw/cZu9tJIiTmU/s1600/rockstar-3.jpg" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/-E4NgScBLUho/TsBLfPeY_UI/AAAAAAAAAtw/cZu9tJIiTmU/s320/rockstar-3.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt; एक रौकस्टार दिखता है जो स्टेज पर अपने जलवे बिखेर रहा है और फिर पहुंचती है नौर्थकेंपस जहां कहानी शुरु होती है....जनार्दन जाकड़ जो एक रौकस्टार बनना चाहता है, जिम मौरिशन की तरह.... भरी भीड़ के सामने स्टेज में मिडिल फिंगर दिखाने को बेताब सा। बस स्टाप में अपने गिटार की बेसुरी धुनों और बेतुके गानों से लोगों को इरिटेट करता हुआ... कि तभी कैंटीन का हैड....उसे ब्रहमज्ञान देता है कि टूटे दिल से ही संगीत निकलता है... फिर एक रियलाईजेशायन कि कभी दिल नहीं टूटा... कभी कोई दर्द नहीं मिला... कितनी सीधी...सपाट सी जिन्दगी। फिर दिल तोड़ने की एक कोशिश... और हीर नाम की उस सेंट स्टीफेनियन कश्मीरी, कौलेज आईकेंडी, हाई क्लास लड़की को एक फनी सा प्रपोजल... मेरी गर्लफ्रेंड बनजा ... हम दोनों रौक कर देंगे.... लेकिन इस सीन के बाद वो गंवई सा लड़का पूरी फिल्म में अकेले रौक करता रहा पर यकीन मानिये वो कश्मीरी लड़की फिल्म के एक भी सीन में कहीं रौक नहीं कर पाई। जब जब रहमान की धुनें बजती, जौर्डन स्टेज पे होता फिल्म देखने लायक होती। लेकिन जहां जहां नर्गिस अपनी स्टिफ बाडीलेंग्वेज और जबरदस्ती के एक्सप्रेशन दिखते फिल्म का जायका खराब कर देते। जो भी जौर्डन कहना चाहता हीर उसके अल्फाज़ बरबाद कर देती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्गिस से बहुत कम स्क्रीन प्रेजेंस के बावजूद जर्नलिस्ट का रोल निभा रही अदिति राव की एक्टिंग ज्यादा प्रभावशाली लगती हैं। इससे पहले ये साली ज़िन्दगी में अपनी एक्टिंग से छाप छोड़ने वाली अदिति रौकस्टार की लीड के लिये कई गुना ज्यादा क्वालिफाईड लगती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती रही, खिंचती रही, फिल्म की कहानी रास्ता भूलती रही और अंत में हमें एक ऐसी यात्रा पर ले गयी जिसका कोई अंत नहीं था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इम्तियाज़ अली से इतनी खराब स्क्रिप्ट की उम्मीद शायद ही किसी को हो। पूरी फिल्म देखने के बाद आप अगर बतादें कि फिल्म की कहानी क्या थी तो ये आपकी क्रियेटिविटी की चरम सीमा होगी। एक कहानी जिसमें न कोई फ्लो होता है... न कोई लौजिक। एक सीता और गीता के कैरेक्टर से प्रभावित सी लड़की जो शादी से पहले किसी चीप से थिएटर में एक लड़के के साथ बी ग्रेड फिल्म तो देख लेती है, पर शादी के बाद अपने पति के घर में उसी लड़के का महज बाई कहने आना उसे नागवार गुजरता है। उसे लगता है कि इस बात से उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी खराब हो जाएगी। फिर उस लड़की का बोनमैरो उस लड़के की प्रेजैंस से नौर्मली ब्लड सेल्स पैदा करने लगता है...लड़का चला जाता है तो बोन मैरो की प्रोब्लेम फिर शुरु हो जाती है......एक डाक्टर जो प्रगनेंसी टेस्ट करने के बजाय उस लड़की की मां से पूछता है कि सच बताओ लड़की प्रगनेंट हैं? &lt;br /&gt;पूरी फिल्म देखने के बाद ....लगता है कि शायद फिल्म की स्क्रिप्ट शूट करते हुए कहीं खो गई थी। और खुद डाईरैक्टर साहब भूल गये थे कि कहानी क्या थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म कई बातों को एक साथ एडेªस करने की फिराक में अपना पता खो देती है। जबरदस्ती ओवरकौम्प्लिकेटेड हो जाती है .....एब्सट्रेक्ट होने की नाकाम कोशिश करती सी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हांलाकि रणबीर पूरी फिल्म में हर जगह पर फिल्म की डूबती किश्ती को अपनी शानदार एक्टिंग की पतवार लिये डूबने से बचाने की कोशिश को बखूबी अंजाम देते हैं। चाहे वो नौर्थकैंपस के एक बेशउर, नासमझ और ढ़ीट से लड़के का किरदार हो... निज़ामुददीन दरगाह में कुन फायाकुन की धुन में डूबा घर से निकाल दिया गया &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-WVx4J-G7css/TsBLg3o_KxI/AAAAAAAAAt4/KuT7yY1780g/s1600/Rockstar-4.jpg" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://4.bp.blogspot.com/-WVx4J-G7css/TsBLg3o_KxI/AAAAAAAAAt4/KuT7yY1780g/s320/Rockstar-4.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;एक बेचैन मुसाफिर हो... स्टेज पे पूरे जोश से गाता एक रौकस्टार जौर्डन हो...पत्रकारों को पीटता एक फ्रस्टेट और बेफिक्र कलाकार हो.... या फिर अपनी प्रेमिका से रात को छुपकर मिलने आया एक प्रेमी.... हर रुप में रणबीर कहीं नहीं खले हैं। पूरी फिल्म में कुछ देखने लायक&amp;nbsp; है तो वो रणबीर की शानदार एक्टिंग। और कुछ सुनने लायक तो रहमान की धुनें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रणबीर की कौस्ट्यूम्स डिज़ाईनिंग भी अपनी ओर नज़र खींचती है, वैसे जिस फिल्म में कहानी नहीं होती उसमें म्यूजिक, कौस्ट्यूम्स, कास्टिंग वगैरह वगैरह पर नज़र खुद बखुद जाने लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रौकस्टार की कास्टिंग फिल्म की एक बड़ी कमज़ोर कड़ी है। इंडियन लुकिंग फोरेन एक्टर्स का टेंªड पिछले कुछ समय से इन्डस्ट्री में क्यों आया है, इसकी वजह शायद विदेशी कलाकारों और लोकेशन्स के ज़रिये फिल्म को एक्ज़ोटिक सा लुक देकर मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखने वाली औडियन्स को रिझाने की कोशिश है, लेकिन इसने फिल्मों में एक्ंिटग का स्तर कम ही हुआ है। &lt;br /&gt;सुनने में आया है कि पहले करीना कपूर नर्गिस की जगह फीमेल लीड के रोल के लिये चुनी गई थी लेकिन क्योंकि रणबीर और करीना रिश्तेदार हैं और फिल्म में कुछ संेन्सुअल सीन्स की दरकार थी इसलिये करीना की जगह नर्गिस को लिया गया। जो भी हो इस फैसले ने फिल्म को एक अच्छी फिल्म बन पाने से रोकने में बड़ी भूमिका अदा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिवाज़ों से बंधे, तरीके से चलने वाले समाज के खिलाफ एक आज़ादखयाल रौकस्टार की बगावत का कंसेप्ट फिल्म में उस गहराई से आ ही नहीं पाया जितना गहरा ये कंसेप्ट है। उसपे फ्री तिब्बत और कश्मीर की आज़ादी का मुददा एक मोंटाज़ के जरिये जबरदस्ती ठूसने की कोशिश बेहद बचकानी लगती है। ठीक वैसे ही जैसे कुछ समय पहले आई पंकज कपूर की फिल्म मौसम में एक साथ बाबरी, नाईन इलैवन, कार्गिल, गोधरा सबकुछ ठूस देने की नाकाम कोशिश की गई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हौल से निकलने के बाद कुछ ठगा ठगा सा महसूस करते हुए कुछ रोचक कमेन्टस सुनने को मिले...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दोस्त सम्राट ने कहा कि इम्तियाज अली को रणबीर कपूर से माफी मांगनी चाहिये।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-SGokS8jjuBg/TsBLOL8gkYI/AAAAAAAAAtg/tuzgVeMRppo/s1600/Rockstar+2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक दोस्त का कहना था कि फिल्म के एक दृश्य में उल्टी को जितने क्रियेटिव तरीके से दिखाया गया था वो काबिले तारीफ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो अजनबी औरतों को उनके पास से गुजरते हुए कहते सुना....I loved ranbir's Passion for 'something'... वो समथिंग क्या था अगर फिल्म इस बात को बता पाने में कामयाब हो जाती तो शायद रौकस्टार आज के वक्त की बेहतरीन फिल्मों में से होती। पर अफसोस कि ये हो न सका। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म देखने के बाद जब वी मैट जैसी अच्छी और सरल फिल्म बनाने वाले इम्तियाज अली से इतना ही कहा जा सकता है कि नादान परिंदे घर आजा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर रौकस्टार देखने के बाद घर लौटे तो रणबीर और रहमान दो ही चीजें दिमाग में छाई थी। नेट से रौकस्टार के गानों की जिपफाईल डाउनलोड कर ली गई है। और रौकस्टार के गाने स्पीकर की उंची आवाज़ के ज़रिये इरशाद कामिल की लिखाई को सलाम करते कानों से दिल में कहीं गहरे उतर रहे हैं।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-605160908636679318?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/605160908636679318/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=605160908636679318' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/605160908636679318'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/605160908636679318'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='नादान परिंदे घर आजा.....'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-gNC8kaD4efk/TsBLdvugkQI/AAAAAAAAAto/34WHHpFRpHU/s72-c/Rockstar-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-3816235378661531923</id><published>2011-06-25T00:54:00.000-07:00</published><updated>2011-06-25T00:54:20.647-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दांये या बांये'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><title type='text'>दांये या बांये देखने के बाद</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;यहां मुम्बई में बैठे दायें या बायें देखते हुए एक कार थी जो पहाड़ के एक गांव कांडा के कलाकेन्द्र तक छोड़ आई। ये पूरा सफर बहुत ही आत्मीय था। चीजें जब आम्मीय होती हैं तो हम उनकी खामियों को अनदेखा कर देते हैं। बेला नेगी की दांयें या बांये देखने के बाद अनदेखियां करने का मन होता है।&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-pAniJOfK7gQ/TgWPnoJVneI/AAAAAAAAAr0/vtW92zYjIVI/s1600/2.png" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="176" src="http://3.bp.blogspot.com/-pAniJOfK7gQ/TgWPnoJVneI/AAAAAAAAAr0/vtW92zYjIVI/s320/2.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;एक समय था जब अपनी मां के साथ बागेश्वर के पास के उस कांडा गांव में जाना होता था। मैं थक जाता था। वो नहीं थकती थी। मां कहती थी कि बस बेटा अब थोड़ा और चलना है। और उस थोड़ा चलने के दौरान मैं मां के साथ मीलों चलता चला जाता। मांएं हमें थोड़ा चलना सिखाती हैं तभी तो हम बहुत चलना सीख पाते हैं। खैर इस बार दीपक डोबरियाल के साथ वहां जाना हुआ। तब असल में जाते हुए और अबकी इस फिल्म के जरिये जाते हुए जीजें बस उतनी ही फर्क थी कि तब वो सामने थी दूर दूर तक खुली और इस बार एक स्क्रीन में कैद, एक फिल्म की शक्ल में। उसी तरह की औरतें, कमर तोड़ काम करती हुई, सौल कठौल करती हुई। उसी तरह के आदमी, जुंआ खेलते, शराब पीते, चुगली करते हुए। उसी तरह के बूढे़ निराश हताश होते पहाड़ चिन्ता करते हुए। उसी तरह के बच्चे नासमझी में शैतानियां करते और समझदारियों में गांव के सपने पूरे करते हुए। और एक गधा जो अपने सर पे गांव के लिये कुछ नया और अलग करने का बोझ लादे आंखिर अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाता है। और मंजिल पाते ही वो कार उसके लिये बेकार हो जाती है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-O5ACmZFTFUw/TgWPpguL19I/AAAAAAAAAr4/4r-0p7qU1Ck/s1600/3.png" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="176" src="http://4.bp.blogspot.com/-O5ACmZFTFUw/TgWPpguL19I/AAAAAAAAAr4/4r-0p7qU1Ck/s320/3.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दांयें या बांयें का कथानक बहुत अलग नहीं है। पर रोचक है। वंडर कार, राजू चाचा, दो दूनी चार इन जैसी फिल्में पहले भी बन चुकी हैं जिनमें किसी न किसी प्रकार से कार अहम भूमिका निभाती दिखी है। लेकिन यहां इस फिल्म में परिस्थितियां उसकी भूमिका को कुछ अलग कर देती हैं। उत्तराखंड का एक ऐसा सुदूरवर्ती गांव जहां एक टूटी फूटी सड़क &amp;nbsp;आधी अधूरी पहुंचती हैं, उस गांव में बंबई से लौटा एक आदमी अचानक इसलिये हीरो हो जाता है क्योंकि उसे एक जिंगल प्रतियोगिता में एक बड़ी सी लाल कार उपहार में मिलती है। रमेश माझिला के गांव में कलाकेन्द्र खुलवाने के जिस सपने का सारे गांव वाले पहले मजाक उड़ाते थे अब कार आ जाने से उस सपने को थोड़ा थोड़़ा सपोर्ट मिलने लगा है। रमेश माझिला गांव के स्कूल के जिन बच्चों को पढ़ाता है उनमें से कुछ की आंखें कला केन्द्र के सपने से जुड़ जाती हैं। बच्चे जब जिद पे आते हैं तो जिदें घुटने टेकती पूरी हो ही जाती हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-uaG3vEMgRCY/TgWPv4xPNmI/AAAAAAAAAsE/cBWPVYq_vDw/s1600/6.png" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="176" src="http://4.bp.blogspot.com/-uaG3vEMgRCY/TgWPv4xPNmI/AAAAAAAAAsE/cBWPVYq_vDw/s320/6.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;फिल्म का पहला और तीसरा एक्ट देखने वाले को बांधे रखता है। पर दूसरे एक्ट में फिल्म लड़खड़ाती नज़र आती है। इस एक्ट में फिल्म छोटे छोटे वाकयों से पहाड़ को उकेरने की कोशिश करती है। लेकिन ये वाकये थोड़ा भागते से नज़र आते हैं। उनमें थोड़ा सा ठहराव की कमी नज़र आने लगती है और कुछ बनावटीपन भी। लेकिन फिल्म के साथ जो सबसे अच्छी बात है वो ये कि एक एक कैरेक्टर का मैनरिजम न केवल अलग से दिखाई देता है, बल्कि अपने अनौखेपन में दर्शकों पर छाप भी छोड़ता है। अगर आप पहाड़ के गांवों में गये हैं तो आपको ये पात्र असलियत के बहुत ही करीब मिलेंगे। उनके बोलने चालने का ढंग, उनका रहन सहर, उनकी नीयतें, सब कुछ ऐसी ही तो होती हैं। रमेश माझिला जो शहर तो गया पर उतना शहरी नहीं हो सका, उसकी मध्य वर्गीय मानसिकता वाली पत्नी हेमा जिसे गहने बेचकर ही सही अपने भाई को दिखाना है कि वो भी किसी से कम नहीं हैं, हेमा का भाई एक पहाड़ी जो शहर गया और फिर पहाड़ में रहने वालों को गंवार और तुच्छ समझने लगा। ओखल कूटती, घास काटती, अपनी मजबूरियों और दुखों के बीच भी चुप और खुश रहती औरतें। शराब में धुत रहने वाले जुआरी आदमी और लड़के, शरमाई शरमाई सी पर इच्छाओं से भरी लड़कियां, और वो बूढ़ा आदमी जिसे खड़िया की खान में हो रही खुदाई के चलते जल , जंगल और ज़मीन के खत्म हो जाने का डर है। खान माफिया और अवसरवादी पर असफल छोटी सोच वाले छुटभैयये नेता। पहाड़ के सच के बहुत करीब से लगते हैं ये लोग। बेला नेगी ने जिस तरह से उन्हें फिल्म में स्थापित कर दिया है वो एक कठिन और बेहतरीन काम लगता है। स्थानीय लोगों को फिल्म के पात्रों के रुप में शामिल करने का उनका फैसला समझदारी भरा लगता है, वरना शायद फिल्म इतनी रियलिटिक सी नहीं लगती।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-v0pJN7C6BsM/TgWPrj00bcI/AAAAAAAAAr8/RW8Avl4Da5A/s1600/4.png" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="176" src="http://4.bp.blogspot.com/-v0pJN7C6BsM/TgWPrj00bcI/AAAAAAAAAr8/RW8Avl4Da5A/s320/4.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;आंेकारा, गुलाल, जैसी फिल्मों में अपनी एक्टिंग से अलग मुकाम बनाने वाले दीपक डोबरियाल दांये या बांये में फिर अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाते हैं। यहां वो एक परफैक्ट गधे की भूमिका निभाते हैं जो गांव वाले लोगों को अपने बच्चों को गधा कहने से रोकता है इस बात की जानकारी के बिना कि यहां तो लोग उसे ही गधा समझ बैठे हैं। उनके व्यक्तिगत स्वाभाव का असर ही होगा शायद, कि वो फिल्मों में भी उतने ही सहज और सरल नज़र आते हैं जितने वो असल ज़िन्दगी में हैं। वर्सोवा के पास उनसे हुई एक छोटी सी मुलाकात में समझ आया कि दीपक असल जिन्दगी में भी फेक होने से बचते हैं इसीलिये नेक एक्ंििटग कर पाते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-rRGbI5-wqt8/TgWPyJKKniI/AAAAAAAAAsI/vxHbzfFs0DM/s1600/7.png" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="176" src="http://3.bp.blogspot.com/-rRGbI5-wqt8/TgWPyJKKniI/AAAAAAAAAsI/vxHbzfFs0DM/s320/7.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;फिल्म की शूटिंग भी पहाड़ में ही हुई है। इसलिये उसकी लोकेशन भी फिल्म को रियल होने के नजदीक लाती है। गांव के पाखे वाले दो मंजिला घर, नीले रंग की पुताई की हुई लकड़ी की खिड़कियां, घर के आगे एक छोटा सा पत्थरों के फर्श वाला आंगन, आंगन में बधी गाय भैंसे, एक ओखल। और गहरे नीले साफ आसमान के नीचे घने जंगलों के बीच दूर दूर छिंटके से घर।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगर आपने कभी मनोहर श्याम जोशी को पढ़ा हो तो ऐसा होने वाला हुआ बल, ऐसा कहां होने वाला ठैरा, रमेश की जगह रमेस दा टाईप के संवादों से आप अच्छी तरह वाकिफ होंगे। उन्होंने अपने क्याप, कसप, हरिया हरक्यूलिश की हैरानी जैसे उपन्यासों में पहाड़ियों के इस खास बोलने के लेहजे को खूब पकड़ा है। दांयें या बांये इस ठेठ पहाड़ी एक्सेन्ट के लिहाज से मनोहर श्याम जोशी की याद दिला देती है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-eiizVDK3J-U/TgWPtohhlSI/AAAAAAAAAsA/EdnuQeBpRvA/s1600/5.png" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="176" src="http://2.bp.blogspot.com/-eiizVDK3J-U/TgWPtohhlSI/AAAAAAAAAsA/EdnuQeBpRvA/s320/5.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;बजट की कमी फिल्म के लुक को काफी प्रभावित करती सी लगती है। यही फिल्म बड़े बजट और ज्यादा संसाधनों में बनती तो शायद और बेहतर हो पाती। पर पहले प्रयास के रुप में देखें तो बेला नेगी को बधाई जरुर मिलनी चाहिये। पहाड़ को मेन स्ट्रीम की फिल्मों में अक्सर एक आउटसाईडर के पौइन्ट औफ व्यू से ही दिखाया जाता रहा है। एक छुट्टी बिताने की खूबसूरत जगह की तरह। दांये या बांये मेरी समझ से ऐसी पहली फिल्म है जिसने पहाड़ को एक पहाड़ी की नज़र से देखा है।, उस खूबसूरत दुनियां में मौजूद अभावों पर गौर किया है, उसकी समस्याओं को समझा है और एक हद तक समाधान देने की कोशिश की है। शराब जो शहर महिलाओं का रिक्रिएशन होती है वही शराब पहाड़ की औरतों पर कितनी भारी पड़ जाती है, खनन माफियाओं के चंगुल में फंसे पहाड़ के जंगल कैसे संकट के दौर से गुजरने लगे हैं, बेकारी और बेरोजगारी कैसे गांवों से पलायन की वजह बन जाती है, फिल्म इन मुद्दों को बहुत मनोरंजक तरीके से उठाती है। रमेश माझिला के स्कूल में दिये गये भाषणों को छोड़ दे ंतो फिल्म कहीं प्रीची नहीं लगती। वो सिखाती नहीं है, आपसे बात करती है, पूरी पर्वतीय आत्मीयता के साथ।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उम्मीद है कि बेला नेगी जैसे कुछ लोग अपने दांये या बांये झांकते हुए पहाड़ को फिल्माकर समझने समझाने की आगे और कुछ बेहतर कोशिशें करेंगे। मौका लगा तो हम भी जरुर उन कोशिशों में भागीदार होंगे। उम्मीद तो है.....देखें.....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-3816235378661531923?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/3816235378661531923/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=3816235378661531923' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/3816235378661531923'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/3816235378661531923'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='दांये या बांये देखने के बाद'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-pAniJOfK7gQ/TgWPnoJVneI/AAAAAAAAAr0/vtW92zYjIVI/s72-c/2.png' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-2881125493517883242</id><published>2011-03-31T09:36:00.000-07:00</published><updated>2011-03-31T09:36:15.113-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लू वैवेट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><title type='text'>ब्लू वेल्वेट- माने मखमल के उस पार</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;परसों रात दो बजे जब फाईनली डिसाईड हो गया कि आज नीद नहीं ही आयेगी तो अपने फिल्मों के कलेक्शन पे गौर किया। रात काटने का ये एक बेहतरीन विकल्प मालूम हुआ। ब्लू वेल्वेट। डेविड लिंच की ये फिल्म किसी तरह छूट गई थी। सोचा देखी जाये। देखने के बाद लगा कि इसे देखने का इससे बेहतर वक्त शायद कोई और नहीं हो सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-nz_bbdWwSck/TZSrZNVpm-I/AAAAAAAAAp8/DOOBdwzMLCg/s1600/bluee+333.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-nz_bbdWwSck/TZSrZNVpm-I/AAAAAAAAAp8/DOOBdwzMLCg/s320/bluee+333.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;अगर आपने अल्फ्रेड हिचकौक की फिल्म साईको देखी हो और आपको उस जौनर की फिल्में पसंद हों तो तो ब्लू वेल्वेट आपके लिये ही बनी है। एक अजीब सा साईकोटिक संसार जहां जी रहे कैरेक्टर्स को उनकी विचित्र मेंटल स्टेट बेहद वियर्ड तरीके से बिहेव करने के लिये मजबूर कर देती है। वो आपके या हमारे जैसे लोगों की तरह मामूली बर्ताव नहीं करते। वो एक्स्ट्रीम वाली स्थिति है जहां कोई इसलिये इतना विचित्र हो जाता कि या तो वो निहायत मजबूर हो गया है या इसलिये कि वो निहायत कू्रर हो गया है। वर्ड सिनेमा में फिल्म नोआर एक पूरा दौर रहा है। उस दौर में ऐसी कई फिल्में बनी जिसके किरदार या गैंगस्टर थे या फिर साईकोटिक। या फिर दोनों ही। ये चरित्रों के भीतर के काले गहरे ग्रे शेडस उभारने वाली फिल्में थी। नेगेटिव करेक्टर्स इन फिल्मों में बड़ी अहमियत रखते थे। टैक्सी ड्राईवर, डबल इन्डेम्निटी, टच औफ इविल, सिटीजन केन, वर्टिगो, साईको जैसी कई फिल्में इस दौर में बनी। इन सारी फिल्मों के चरित्र कहीं न कहीं साईकोटिक थे। इन फिल्मों में सिम्बोलिजम बड़ी अहम भूमिका निभाता था। फेम फेटाल यानि नकारात्मक महिला किरदार इन फिल्मों में अहम भूमिका में रहती थी। डेविड लिंच की इस फिल्म को भी उसी स्रेणी में रखा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-SUERffEPUyY/TZSrZnRdTXI/AAAAAAAAAqA/RJT2U80jgNA/s1600/bluee+222222.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/-SUERffEPUyY/TZSrZnRdTXI/AAAAAAAAAqA/RJT2U80jgNA/s1600/bluee+222222.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-J9jxDDGNtS4/TZSrYmD5nOI/AAAAAAAAAp4/AolVzT28nwI/s1600/bluee+11.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;एक कौलेज स्टूडेंट जेफरी को ल्यूम्बर्टन नाम के एक छोटे से कस्बे के अपने घर के पास के खेतों में एक&amp;nbsp;आदमी का कान गिरा हुआ मिलता है। इसी खेत में कुछ समय पहले उसके पिता को एक एटेक आया था और वो बीमार हो गये थे। इस कान को लेकर वो एक डिटेक्टिव के पास जाता है ताकि इसके बारे में जांच पड़ताल की जा सके। दूसरे दिन डिटेक्टिव की बेटी सेंडी से उसकी मुलाकात होती है और वो उसको अपने पिता से मिलने वाली कुछ ख्ूाफिया जानकारियां देने का वादा करती है। वो उसे उसके पड़ौस में मौजूद एक घर के बारे में बताती है जहां एक विचित्र औरत रहती है। जैफरी सैंडी की मदद से उस औरत के बारे में पता लगाने का फैसला करता है। वो पेस्ट कंट्रोल वाला आदमी बनकर उसके घर में घुसता है लेकिन पहले दिन वो कुछ खास जानकारी हासिल नहीं कर पाता पर वहां से एक चाबी चुरा लेता है। दूसरे दिन वो चुपचाप उस कमरे में घुसता है। कुछ खोज ही रहा होता है कि उस घर में अकेले रहने वाली एक सिंगर डौर्थी अपने घर लौटती है। वो एक कबर्ड में छुप जाता है और उसे कपड़े बदलते हुए बिल्कुल नग्न अवस्था में देखता है। डौर्थी सोने को होती है कि उसे कबर्ड में हलचल सुनाई देती है। वो चाकू लेकर कबर्ड का दरवाजा खोलती है और जेफरी पकड़ा जाता है। वो जेफरी से पूछती है कि उसने क्या देखा। जेफरी बताता है। वो जेफरी से पूरे कपड़े उतारने के लिये कहती है और चाकू की नोक पर उसके साथ शारीरिक सम्बंध बनाती है। पर जेफरी को खुद का स्पर्श भी नहीं करने देती। तभी दरवाजे पर दस्तक होती है। वो जेफरी से कबर्ड में छुप जाने के लिए कहती है। वो दरवाजे के पीछे से एक आदमी को कमरे में आते देखता है। और वहां उसके सामने खुलती है एक बेहद विचित्र और डरावनी दुनिया। वो देखता है कि &amp;nbsp;डौर्थी नामकी ये खूबसूरत गायिका जो अब तक उसके साथ जबरदस्ती कर रही थी &amp;nbsp; निर्ममता की किस हद तक इस कमरे के अन्दर फ्रेंक नामके उस अन्डरवर्ड डौन से प्रताड़ित हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-J9jxDDGNtS4/TZSrYmD5nOI/AAAAAAAAAp4/AolVzT28nwI/s1600/bluee+11.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="207" src="http://4.bp.blogspot.com/-J9jxDDGNtS4/TZSrYmD5nOI/AAAAAAAAAp4/AolVzT28nwI/s320/bluee+11.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;फ्रेंक एक साईकोटिक करेक्टर है जिसे डौर्थी को एक खास तरह से प्रताड़ित करने में मज़ा आता है। अपने चेहरे पे मास्क लगाकर और डौर्थी के मुंह में कपड़ा ठूंसकर वो उसके साथ जबरदस्ती करता है। डौर्थी असहाय है। बिल्कुल लाचार। एकदम कमजोर। जेफरी ये सब देखके डौर्थी के लिये सहानुभूति से भर जाता है। जैसे ही फ्रेंक वापस जाता है जेफरी कबर्ड से बाहर निकलता है। वो बिल्कुल टूट चुकी सी डौर्थी को हमदर्दी देता है। डौर्थी को इस हमदर्दी की बहुत जरुरत है क्योंकि फ्रेंक उसके साथ एक जानवर सा व्यवहार करता है। जेफरी फिर इस घर में रोज आना शुरु करता है। वो रोज फ्रेंक को उसके साथ जानवरों सा व्यवहार करते देखता है। एक दिन फ्रेंक उसे देख लेता है और उसे पकड़कर अपने गुंडों के साथ अपने अड्डों पे ले जाता है। यहां जेफरी को पता चलता है कि फ्रेंक एक अन्डरवर्ड से जुड़ा शातिर अपराधी है। वो उसके बेहद असामान्य दोस्तों से रुबरु होता है। फ्रेंक अपने दोस्तों के सामने ही कार के अन्दर फिर अपने वहशियाना अंदाज़ में डौर्थी को प्रताड़ित करने लगता है। इस बार जेफरी उसका विरोध करता है। फ्रेंक अपने गुडों की मदद से उसको बुरी तरह पीटता है। वो बदहवाश हो जाता है। यहां सेंडी को पता लगता है कि जेफरी और डौर्थी के बीच किसी तरह का रिश्ता पनप रहा है। इस रिश्ते की गंध उसे अच्छी नहीं लगती। एक दिन सेंडी और जेफरी अपनी कार में कहीं जा रहे हैं। एक दूसरी कार उनका पीछा करती है। उससे कुछ लड़के बाहर निकलते हैं और एक महिला को जेफरी के सुपुर्द करते हैं। ये महिला डौर्थी है। जो बिल्कुल नग्न अवस्था में है। बिल्कुल बदहवास सी। उसके साथ फिर बुरी तरह से मारपीट की गई और उसे रास्ते में कहीं फेंक दिया गया। जेफरी को अपने पास पाते ही वो उससे लिपट जाती है। जैसे उसकी समीपता उसकी जिन्दगी की केवल और केवल उम्मीद हो। वो उसे लेकर सेंडी के घर में जाते हैं। और फिर उसी कान के एक क्लोजअप के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है जो कान जैफरी को फिल्म की शुरुआत में मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-OtqcwX1zMA4/TZSrZ-_SCzI/AAAAAAAAAqE/sti2pwFfJHw/s1600/Blue-Velvet_l.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-OtqcwX1zMA4/TZSrZ-_SCzI/AAAAAAAAAqE/sti2pwFfJHw/s320/Blue-Velvet_l.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;डेविड लिंच की इस फिल्म में न्यूडिटी तो है लेकिन उसे देखके एक अजीब सा सेंसेशन होता है। ऐसा सेंसेशन जो लस्ट के बिल्कुल करीब नहीं है। मानव स्वभाव के बेहद अंधेरे कोनों से ये फिल्म रुबरु कराती है। विकृत सी मनोवैज्ञानिक दुनिया में ले जाती है। एक खास किस्म का थ्रिल आपके अन्दर बहने लगता है। डेविड लिंच की ये फिल्म एब्सट्रेक्ट होने के बेहद करीब है। ऐसी फिल्मों को देखने के तुरंत बाद एक बेहद नकारात्मक किस्म का अहसास होने लगता है। उस खास किस्म की विकृत दुनिया के लिये घृणा पैदा होने लगती है। ऐसी फिल्में बेचैन करने लगती हैं। विश्व सिनेमा के एक पूरे दौर में ऐसी फिल्में बनी हैं। जिससे एक बात बेहद साफ हो जाती है कि हमारे आम जनजीवन के इर्द गिर्द या उसके बीच ही कहीं एक ऐसी विकृत दुनिया रहती है जहां पीड़ित करने और पीड़ा सहने की हदें पार होती हैं। फिल्म नोआर के दौर की ये फिल्में उसी दुनिया की उपज हैं।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-2881125493517883242?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/2881125493517883242/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=2881125493517883242' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/2881125493517883242'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/2881125493517883242'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html' title='ब्लू वेल्वेट- माने मखमल के उस पार'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-nz_bbdWwSck/TZSrZNVpm-I/AAAAAAAAAp8/DOOBdwzMLCg/s72-c/bluee+333.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-4509880111746608092</id><published>2011-03-26T08:10:00.000-07:00</published><updated>2011-03-26T08:10:56.716-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लैक स्वान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><title type='text'>ब्लैक स्वान को देखकर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh4.googleusercontent.com/-fFPbOjBlbIQ/TY3_p4YfOUI/AAAAAAAAAps/rECwem4oGKY/s1600/black+swan+film+poster%255B5%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="https://lh4.googleusercontent.com/-fFPbOjBlbIQ/TY3_p4YfOUI/AAAAAAAAAps/rECwem4oGKY/s320/black+swan+film+poster%255B5%255D.jpg" width="216" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमारा अपना काल्पनिक मानसिक संसार जब हमारी जिन्दगी में शामिल होने लगता है तो हमारा व्यवहार उसे ज़ाहिर कर देता है। इस रियल और इमेजनरी मेंटल वर्ड का मिक्सचर सिनेमा के जरिये कभी कभी एक जबरदस्त अनुभव बन जाता है। फिल्म देखते हुए तो आप फिल्म के साथ जीने ही लगते हैं फिल्म देखने के बाद भी आप कुछ देर उस दुनिया से बाहर नहीं निकलना चाहते। उस दुनियां में क्या, क्यों और कैसे हो रहा था आपको इन सवालों से उपजी उलझनें अपने में कहीं शामिल कर लेती हैं। आप उन उलझनों का हिस्सा हो जाते हैं। और खुद को सुलझाने की इस प्रोसेस में टाईम लगता है। ये वही टाईम है जो आपको उस फिल्म द्वारा रचे गये आपके खुद के मानसिक संसार से बाहर आने में लगता है। ऐसा हर फिल्म को देखते हुए नहीं होता। इससे पहले किस्लोवस्की की रेड, ब्लू, व्हाईट &amp;nbsp;टायोलोजी को देखकर ऐसा हुआ था। या फिर रोमान पोलान्स्की की बिटर मून और द नाईन्थ गेट ने कुछ ऐसा अनुभव कराया था। और भी कुछ फिल्में होंगी। अभी याद नहीं आ रही हैं। &lt;b&gt;ब्लैक स्वान&lt;/b&gt; के साथ एक बार फिर ऐसा हुआ।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh6.googleusercontent.com/-ADPhJC8xU6M/TY4ASL5rkpI/AAAAAAAAAp0/mRDNDPSgmjQ/s1600/Fashion_Black_Swan_342837969%255B4%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" src="https://lh6.googleusercontent.com/-ADPhJC8xU6M/TY4ASL5rkpI/AAAAAAAAAp0/mRDNDPSgmjQ/s320/Fashion_Black_Swan_342837969%255B4%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;एक बेली डांसर निना जिसे&lt;b&gt; स्वान लेक&lt;/b&gt; नाम के एक स्टेज शो में व्हाईट और ब्लैक स्वान की भूमिकाओं को एक साथ निभाना है। जो व्हाईट स्वान के रुप में बेहतरीन है लेकिन ब्लैक स्वान के रुप में उसे खुद को इम्प्रूव करना है। ऐसा ना करने पर वो स्टेज शो में लीड भूमिका में नहीं रह पायेगी। उसके विकल्प भी पहले से मौजूद हैं। लिली नाम की एक दूसरी डांसर उसकी प्रतिद्वंद्वी है। लेकिन निना के दिमाग में ये भूमिका अदा करने का जुनून हावी है। शो का डाईरेक्टर थौमस ये जानता है कि निना अच्छा कर सकती है। लेकिन उसमें उसे एक परफैक्सनिस्ट दिखाई देता है। और वो मानता है कि ग्रे शेड वाला कोई किरदार परफैक्सनिस्ट हो ही नहीे सकता। उसे फलेक्ज़िबल होना ही होगा। वो निना पर दबाव बनाता है। निना धीरे धीरे ब्लैक स्वान के किरदार को जीना शुरु करती है। ब्लैक स्वान उसकी जिन्दगी में गहरे तक शामिल होने लगता है। उसके साथ ऐसी घटनाएं होने लगती हैं जो असल में उसके साथ नहीं हो रही। वो विजुअल और आडिटरी हैल्यूसिनेशन की शिकार होने लगती है। उसे लगने लगता है कि लिली उसकी जगह लेने के लिये गहरी चालें चल रही है। वो लिली के साथ काल्पिनिक रुप से उन चालों में खुद को शामिल पाती है। इस तरह वो दो जिन्दगियां एक साथ जीने लगती है। एक जिसमें वो व्हाईट स्वान की तरह मासूम है और दूसरी जिसमें वो ब्लैक स्वान की तरह शातिर । निना पर हावी ब्लैक स्वान उससे लिली का खून करवा देता है। उसे लगता है कि वो लिली को मार चुकी है। पर असल में उसने कोई हत्या की ही नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh3.googleusercontent.com/-kRcSW47c6IE/TY4AR1VlWCI/AAAAAAAAApw/3Vgv1Iyq-QY/s1600/black-swan-trailer-17-8-10-kc_thumb%255B2%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="179" src="https://lh3.googleusercontent.com/-kRcSW47c6IE/TY4AR1VlWCI/AAAAAAAAApw/3Vgv1Iyq-QY/s320/black-swan-trailer-17-8-10-kc_thumb%255B2%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;फिल्म की खास बात यही है कि जिस डैल्यूजनल वे में निना घटनाओं को होते हुए देख रही है दर्शक होने के नाते हम भी उनको उसी तरह से देखने लगते हैं। उसी डैल्यूजनल वे में। हम भी उसके साथ उसी भुलावे और खास तरह की मानसिक टेंशन में जीने लगते हैं। हैन्ड हैल्ड कैमरा के शेकी मूंमेंट और लगातार बढ़ता म्यूजिक फिल्म में बड़ी अहम भूमिका निभाते हैं। कुल मिलाकर फिल्म आपको कुछ देर के लिये निना की दुनिया में पूरी तरह घुसकर उसे जीने के लिये मजबूर करती है। और पूरी फिल्म देखने के बाद आपको फिल्म द्वारा रची गई दुनिया से बाहर आने में जो कुछ समय लगता है उसे एक बेहतरीन सिनेमेटिक एक्सपीरियेंस तो आप कह ही सकते हैं। &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-4509880111746608092?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/4509880111746608092/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=4509880111746608092' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4509880111746608092'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4509880111746608092'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='ब्लैक स्वान को देखकर'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh4.googleusercontent.com/-fFPbOjBlbIQ/TY3_p4YfOUI/AAAAAAAAAps/rECwem4oGKY/s72-c/black+swan+film+poster%255B5%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-8758123297625981356</id><published>2011-02-08T23:32:00.000-08:00</published><updated>2011-02-08T23:32:58.154-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिलमें देखी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ये साली जिन्दगी'/><title type='text'>ये साली.... अच्छी थी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TVJCM-nP0yI/AAAAAAAAApY/ZNpT-leO0yQ/s1600/Yeh-Saali-Zindagi-Funrocker.Com-1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TVJCM-nP0yI/AAAAAAAAApY/ZNpT-leO0yQ/s320/Yeh-Saali-Zindagi-Funrocker.Com-1.jpg" width="221" /&gt;&lt;/a&gt;इन्टयूशन था कि साली अच्छी होगी। कई इन्टयूशन सच निकलते हैं। इस बार यही हुआ। ये साली जिन्दगी कुलमिलाकर एक अच्छी भली फिल्म थी। इसे देखते हुए ऐसा नहीं लगा कि कुछ रेगुलर देख रहे हैं। गन थी। धांय धांय थी। गेंग्स्टर्स थे। पर अभी रामू मार्का किसी डाईरेक्टर की जगह सुधीर मिश्रा थे। इसीलिये फिल्म थोड़ी अलग बन पड़ी। थोड़ी स्टाईलाईज्ड सी। अच्छी एडिटिंग निहायत रफ और रा कहे जा सकने वाले कैची डायलौग्स, इरफॅान की आम आदमी वाली खास आवाज में नेरेशन और कई परतों में बुना हुआ लेयर्ड सा नेरेटिव स्टाईल। ये सारी बातें फिल्म को आमतौर पर बनाई जाने वाली देसी बौलिवुडमार्का गैंगस्टर फिल्मों से अलग पायदान पर खड़ा करने में कामयाब हो सकी हैं। फिल्म के बारे में कई क्रिटिक्स ने कहा है कि एक अनकौम्प्लिकेटेड सी कहानी को कौम्प्लिकेटेड बनाकर दिखाया गया है जो एक हद तक सच है। फिल्म में कई इन्टरनल लौजिक्स काम करते हैं जिनको समझने के चक्कर में आंखिरी तक फिल्म बांधे रखती है। और जिन्दगी में ज्यादातर चीजें हमें अपनी कौम्प्लिकेटेड फौर्म में ही अच्छी लगती हैं। इससे उनका अपना रहस्य और उनके प्रति उत्सुकता बनी रहती है। एक प्रवाह में बहते चले जाना जब असल जिन्दगी में अच्छा नहीं लगता तो एक फिल्म से भी ऐसी उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। इस लिहाज से कान को उल्टा पकड़ने वाली आलोचकों की बात मेरे हिसाब से खारिज की जा सकती है। फिल्म में दो पैरलल लवस्टोरी एक साथ चलती हैं। दोनो ही प्रेमकहानियों में पैसा और पावर अन्त में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। इन दो अलग अलग प्रेम कहानियों में एक बात कौमन है कि दोनों ही आदमी अपने अपने प्रोफशन के बीच प्यार को ले आते हैं। और जहां प्यार प्रोफेशन के बीच आ जाता है चीजें अपने आप कौम्प्लेक्स हो जाती हैं। जैसा कि असल जिन्दगी में होता भी है। इरफान और चित्रांगदा की प्रेमकहानी जो पूरी तरह एकतरफा है। इरफान चिंत्रांगदा की मदद के लिये सबकुछ छोड़छाड़ के लौट आता है, ये जानते हुए कि उसके पूरे सेक्रिफाईस का हांसिल महज एक प्यार भरा थैंक्स होगा। पर दिल है कि मानता नहीं की तर्ज पर इरफान चिंत्रांगदा को एक ऐसे ट्रैप से बाहर निकालता है जिसमें वो उस दूसरे आदमी की वजह से फंसी है जिससे वो प्यार करती है। वो दूसरा आदमी एक बड़े मंत्री का होने वाला दामाद है जिसकी बेटी से इस दूसरे आदमी की शादी होने वाली है। जाहिराना तौर पर इस दूसरे आदमी के पास ज्यादा पैसा और पावर है। इस आदमी से चित्रांगदा की पहली मुलाकात तब होती है जब जिंत्रागदा उससे पहला झूठ बोलती है कि वो एक मीटिंग में है और उस वक्त इरफान उसे इस दूसरे आदमी की बाहों में पाता है। यहीं तय हो जाता है कि प्यार दरअसल नासमझ होता और खासकर तब जब वो एकतरफा हो तो वो बावड़ी पूछ ही हो जाता है। इरफान अन्त तक चिंत्रांगदा की मदद करता है और अन्त में उसके लिये अपना खून तक बहाता है। पूरी फिल्म में इस एकतरफा प्यार की मासूमियत को महसूस किया जा सकता है। लाल रंग में नहाई एक हरी भरी मासूमियत जिसके जख्म को आंखिर में मलहम मिल ही जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TVJCNw0cIRI/AAAAAAAAApc/WisxMRleKL4/s1600/yeh-sali-zindagi-wallpaper-5.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TVJCNw0cIRI/AAAAAAAAApc/WisxMRleKL4/s320/yeh-sali-zindagi-wallpaper-5.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;दूसरी प्रेमकहानी अरुणोदय की है। इस कहानी में पेंच की वजह बेहद व्यावसायिक है। एक आदमी जो गैंग्स्टर है, जो कब जेल में बंद हो जाये इसकी कोई गारंटी नहीं है, जिसकी बीवी आदिति इस वजह से असुरक्षित महसूस करती है और जिद करती है कि वो खून का खेल छोड़ दे। पर इस खून के खेल में पैसा है और पैसा जीने के लिये जरुरी। आंखिर में निम्नमध्यवर्गीय आम औरत की तरह उसकी प्रेमिका को भी पैसा जरुरी महसूस हो ही जाता है। उसे लगता है कि स्विस बैंक और बांकी जगह रखा पैसा उसका पति ले ही ले तो साला क्या हर्ज है। इन दोनों के बीच लव और लस्ट के बीच की सी कोई चीज है जो उन्हें जोड़े रखती है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दूसरी ओर सौरभ शुक्ला है जिसके लिये इरफान काम करता है लेकिन जिसे कभी समझ नहीं आता कि इरफान एक लड़की के चक्कर में कैसे अपना पूरा बिजनेस दांव पे लगा सकता है अपना ही लगाता तो ठीक था आंखिर में क्यों उसकी भी मट्टी पलीत कर देता है। पर इस क्यों का जवाब शायद कभी होता ही नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पूरी फिल्म का यूएसपी उसका नौनलीनियर स्टाईल है। पहले हाफ में कुछ कुछ देर में नये नये कैरेक्टर फिल्म में एंट्री करते हैं। लेकिन हर नये कैरेक्टर को कैप्शन देकर इन्ट्रोडयूस करवाने की जरुरत पड़ती है। हर नयी लोकेशन के बारे में बताने के लिये भी कैप्शन प्रयोग किये गये हैं। और जहां चीजें थोड़ा कमजोर पड़ने लगती हैं वहां नेरेशन से काम चला लिया गया है। दूसरे हाफ में आते आते एक पौईंट पर लगने लगता है कि यहां एक खास तरह की स्पून फीडिंग होने लगी है। फैक्ट्स ओवरफ्लो से होने लगते हैं। ऐसे में लगने लगता है कि फिल्म जो दिखाकर समझाने में सफल नहीं हो पा रही वो कहकर समझाने की कोशिश कर रही है। ये कोशिश कभी कभी नागवार गुजरने लगती है। लेकिन फिल्म के डायलौग इतने कैची हैं कि जैसे ही ओवरफ्लो औफ फैक्ट्स वाली स्थिति आती है, डायलौग आपको गुदगुदाने लगते हैं। इस तरह नयी नयी घटनाओं और तथ्यों के भारीपन को डायलौग्स का सेंस औफ ह्यूमर रिप्लेस सा कर देता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फिल्म में खूब सारी गालियां हैं लेकिन केवल गालियांे से एलेर्जी के चक्कर में फिल्म को छोड़ा नहीं जा सकता। फिल्म में जिन लोगों के इर्द गिर्द है वो असल जिन्दगी में भी होते तो ऐसे ही होते। ऐसे में इन गालियों और देसी स्लैंग की वजह से फिल्म को चीप नहीं कहा जा सकता हां उसके कैरेक्टर्स को आप चीप कहेंगे तो ये शायद फिल्म के लिये अच्छी बात ही होगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इरफान हमेशा की तरह अपनी एक्टिंग से फिल्म में अलग जगह पर खड़े नज़र आते हैं। लेकिन अरुणोदय उनकी प्रतिभा के आगे बिल्कुल ओवरशैडो नहीं होते। दोनों की ही एक्टिंग सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। सौरभ शुक्ला भी याद रखे जा सकते हैंे। चित्रांगदा बेहद सुन्दर लगी हैं। खासकर अपने ग्रे शेडस में। हल्की सी रोशनी में लिये गये उनके रिएक्शन शौट्स में वो सेड्यूस करने की हद तक खूबसूरत नजर आती हैं। लेकिन उनकी संवाद अदायगी उतनी प्रभावित नहीं करती। कई बार बिल्कुल आर्टिफिशियल सी लगने लगती है। पंकज कपूर फिल्म में पूरी तरह वेस्ट किये गये हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TVJCOTux_5I/AAAAAAAAApg/blVmUKqPFrg/s1600/ye-sali-zindgi.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TVJCOTux_5I/AAAAAAAAApg/blVmUKqPFrg/s320/ye-sali-zindgi.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;फिल्म की अच्छी बात ये है कि इरफान जब अपनी कहानी कह रहे होते र्हैं तो वो विलाप सी नहीं लगती। ऐसा नहीं लगता कि कोई इमोश्नल ड्रामा चल रहा है। वहां एक सटायर है। जो अपनी आईरनी में भी हंसाता है। शायद इसी वजह से फिल्म एक दिलजले और प्यार में हारे बेबस आदमी की कहानी होने से बच जाती है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जैसा की आजकल भतेरी फिल्मों के साथ होता है कि हम सोचते कुछ और वो होती कुछ और है लेकिन ये साली जिन्दगी ऐसी नहीं है। अगर सोच के जाएंगे कि कुछ अलग और हटके देखना है तो भले कहानी में कुछ खास नया ना मिले लेकिन कहानी दिखाने के तरीके में कुछ नया जरुर मिल जायेगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-8758123297625981356?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/8758123297625981356/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=8758123297625981356' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8758123297625981356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8758123297625981356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='ये साली.... अच्छी थी'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TVJCM-nP0yI/AAAAAAAAApY/ZNpT-leO0yQ/s72-c/Yeh-Saali-Zindagi-Funrocker.Com-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-1732886289137591669</id><published>2011-01-13T03:58:00.001-08:00</published><updated>2011-05-04T01:58:04.299-07:00</updated><title type='text'>रेत और रोमान पोलान्सकी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7hFrwWhiI/AAAAAAAAAo8/J3Qg_eRzA8k/s1600/Photo202.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7hFrwWhiI/AAAAAAAAAo8/J3Qg_eRzA8k/s320/Photo202.jpg" style="cursor: move;" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;बीते साल की आंखिरी सांसों के इर्द गिर्द महज महीना पुरानी बेरोजगारी की एक हल्की सी बू थी। रिज्यूमे को ईमेल के जरिये किसी किसी के इनबौक्स में धकेलने की प्रक्रिया थी। खालीपन का एक सतही अहसास था। फिर दिल्ली से मुम्बई पहुंच जाने का फैसला था। नई उम्मीदों और सचमुच का समंदर था। लहरें थी। वर्सोवा था। रोज शाम लाल सूरज का क्षितिज से नीचे उतरता एक असल दृश्य था। और समुद्र में पहले सुनहरा और फिर समुद्र के रंग का होता लहरों में कहीं डूब जाता आभासी सूरज था। दिन बीत रहे थे। नौकरी मिल&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;जायेगी इसका विश्वास था और थी रोमान पोलान्सकी की कुछ आठ दस फिल्में। दिन में ये फिल्में देखना और ढ़लती शाम के शामियाने में वर्सोवा को बिल्कुल फिल्मी सा निहायत सिनेमैटिक सा होते देखना। लाल सूरज के सुनहरे आभामंडल का सुनहरा प्रतिबिम्ब लहरों से गीली होती रेत पर पड़़ता। एक सूरज आकाश में वलय बनाता नीचे उतरता और दूसरा सागर में पीछे और पीछे चलता चला जाता। इस सब के बीच कभी कोई घुड़सवार उस सुनहरे रंग की रेत पर निशान छोड़ता गुजर जाता तो कभी कोई अपनी साईकिल के पहियों की एक लकीर सा बनाता उस रेत पर से गुजर जाता। दूसरे छोर पर कहीं मछुआरे अपनी नावों को खेने की तैयारी कर रहे होते और उनकी पत्नी उनसे कुछ बतिया रही होती, बच्चे पास ही में फुटबाल खेल रहे होते। दूर एक जहाज सूरज से बातें करता आकाश की विशालता के बीच अदना होता चला जाता। लोग अपने परिवार के साथ घोड़ा गाड़ी की सवारी करते। लहरों के बीच तस्वीरें खिंचाते। सूरज डूबने लगता। भीड़ छंटने लगती। अंधेरा आकाश के नीले रंग पर &amp;nbsp;अपनी धौंस जमाता उसे खदेड़ देता और खुद शहंसाह की तरह पसर जाता। समुद्र का पानी रेत के सूखेपन को बहाता आगे बह जाता। लहरें जोर लगाती और कुछ देर में किनारों पर छोटी छोटी चटटानों की शक्ल में रखे पत्थरों के पैर छूने की कोशिश करती। पत्थरों पर युगल एकान्त के पल बिता रहे होते। अपनी अपनी प्यार की हदों और रजामंदी की सीमा के मुताबिक बातों, स्पर्श और लहरों से उठती ठंडी हवा का सेवन कर रहे होते। हर एक पत्थर के पीछे एक युगल इस प्रक्रिया में लीन होता और जो पत्थर खाली होते वहां नये युगल या मेरी तरह के कुछ एकांकी लोग अपने अपने लिये जगह बनाते पत्थरों पर छपी रेत को साफ करते बैठ जाते। और लहरों को आते जाते देखते। मुझे हमेशा यही लगा कि लहरों में एक खास तरह का आकर्शण है। अगर डूबने का डर न होता तो मैं दूर तक इन लहरों का पीछा करते चला जाता। और यदि हो सकता तो पता कर आता कि वो कहां कैसे उपजती हैं। क्यों इतनी रहस्यमयी होती हैं। लेकिन क्योंकि तभी सामने दूसरे छोर पर पानी के उपर अपने शारीरिक अपशिष्ठ की धार का तर्पण करते लोग दिखाई देते। या फिर मोर की शक्ल में बैठ रेत पर पीली गंद मिलाते लोग दिखाई देते और लहरों के साथ जाने का खयाल इस गंद की दुर्गन्ध में कहीं दम तोड़ देता। यह देख पहला विचार उन लोगों के प्रति क्रोध का होता कि कितने बदतमीज किस्म के लोग हैं ये, टटटी पिशाब जैसे काम भी अपने घरों में नहीं कर सकते। लेकिन तभी समझ आता कि इनके घरों में अगर टोयलेट होता तो यहां गंद फैलाने की जरुरत शायद इन्हें नहीं पड़ती। मन एक आर्थिक विमर्श करने लगता। कि कैसे गरीबी का बदतमीजी से गहरा सम्बन्ध है। और किस तरह गरीब होना कितनी सहजता से क्रोध और घृणा का पात्र बना देता है। गरीबी के लिये एक नफरत होने लगती। और एक एक दिन की बेरोजगारी भी बुरी तरह खलने लगती।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7hqLW63wI/AAAAAAAAApE/DXUaP5Fc8io/s1600/Photo204.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7hqLW63wI/AAAAAAAAApE/DXUaP5Fc8io/s320/Photo204.jpg" style="cursor: move;" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जिस दिन मैं पहली बार वर्सोवा गया उस दिन से रोज मैं वर्सोवा जाने लगा हूं। वर्सोवा के प्रति मेरा चुम्बकीय आकर्षण खुद मेरी समझ की सीमा के परे जा रहा है। मुझे हर शाम अपने दिमाग में चुम्बकीय रेखाएं घूमती मालूम होती हैं। मेरे सेरेब्रम, मेरे वर्टिकल&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;कोर्टेक्स, मेरे नयूरोन्स में एक रासायनिक प्रक्रिया होने लगती है जिसका भौतिक प्रभाव मुझे वर्सोवा की तरफ खींच लाता है। वहां रोज मैं लहरों को आता जाता देखता हूं। रोज नये तरह के लोगों को खेलते, बात करते, प्यार करते, शराब पीते, मुस्कुराते, दौड़ते और रुक जाते देखता हूं। मुझे लगता है लोग मुझे नहीं देख रहे। उनके लिये मैं शून्य हंू। अदृश्य। मुझे लगने लगता है कि मैं हूं ही नहीं। समुद्र के विशाल किनारे पर मुझे अपना अस्तित्व नदारद होता महसूस होता है। शरीर से खून रेत बनकर बिखरने लगता है और लहरों से गीला होता वहां पहले से बिखरी रेत में मिल जाता है। मुझे लगता है कि रोज मैं अपने अस्तितव को रेत में बदलता यहां बिखर जाता हूं। मुझे बिखरी हुई रेत में अपने अंश नजर आने लगते हैं। शायद इसलिये उस रेत के लिये रोज मेरे अन्दर एक खास किस्म का लगाव पैदा होता चला जाता है। &amp;nbsp;और मेरे भीतर वो लगाव रोज जमा होता हुआ रेत के कण भर देता है। रेत के वही कण जो लगाव हैं जो मेरे अंश हैं रोज समुद्र के किनारे पानी की सतह पर बिखरते हैं और फिर कुछ ज्यादा मात्रा में दिन ब दिन मेरे अन्दर समाने लगते हैं। ऐसे जैसे मेरा शरीर मुटठी हो और मैं उस मुटठी में जमा रेत। हर बार वो मुटठी इस आशा में खुल रही हो कि रेत की कुछ ज्यादा मात्रा उस में समा जाय। इस तरह से मैं उस रेत से खुद को और ज्यादा मात्रा में अपने अन्दर भरता हूं। और खुद को अपने और करीब पाने लगता हूं। मुटठी खुलती है, मैं कुछ देर के लिये आजाद हो जाता हूं। मुटठी बंद होती है और आजादी के इस अहसास के साथ मैं मुटठी में बंद हो जाता हूं। अपने बासीपन को आजादी के ताजेपन से बदलकर मैं और ताजा हो जाता हूं। या पता नहीं क्या।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://static.guim.co.uk/sys-images/Film/Pix/pictures/2009/2/18/1234959165082/Roman-Polanski-at-the-200-001.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7heg8dZKI/AAAAAAAAApA/x63yfLl6Y4g/s1600/Photo250.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7heg8dZKI/AAAAAAAAApA/x63yfLl6Y4g/s320/Photo250.jpg" style="cursor: move;" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दिन के खाली समय में मुझे हर दिन नये चरित्र मेरे सामने मौजूद फ्रेम में जीते नजर आते हैं। उन चरित्रों के उपर खुद रोमान पोलान्स्की किसी आदमकद शक्ल में मडराते दिखते हैं। सारे चरित्रों को पोलान्स्की अपनी उंगलियों में एक डोर के जरिये बांधे दिखाई देते हैं। अपने भव्य रुप में। एक फिल्मकार के सृश्टिकर्ता हो जाने की यह घटना अभूतपूर्व लगने लगती है। पोलान्स्की अपने चरित्रों को, अपनी रचनाओं को अपनी उंगली पर नचा रहे हैं। वो नाच रहे हैं। उन चरित्रों की जिन्दगी जो गढ़ी हुई जिन्दगी है एक नाच बन जाती है। मैं &amp;nbsp;अपलक उस नाच को देखता हूं। वह नाच जो कई भावनाओं से सराबोर है। जिसमें पात्र हैं, उनके दुख हैं, सुख हैं, हंसी है, पीड़ा है, को्रध है, ईर्श्या है, वासना है, प्यार है, जिद है, जीवन है और मृत्यु भी। भावनाओं की परतें हैं, सतहें हैं। हर नयी कहानी में नये पात्र, नयी परतों में नयी भावनाओं की अलग अलग मात्रा लिये आते हैं और चले जाते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;, अपनी अपनी बात करते हैं, गुस्सा व्यक्त करते हैं, परेशानियां बताते हैं, प्यार जताते हैं। सारे पात्रों की अपनी दुनिया है, अपने साथी हैं, अपना जीवन है। और मैं उनके जीवन का&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;एकाकी दर्शक।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://static.guim.co.uk/sys-images/Film/Pix/pictures/2009/2/18/1234959165082/Roman-Polanski-at-the-200-001.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="192" src="http://static.guim.co.uk/sys-images/Film/Pix/pictures/2009/2/18/1234959165082/Roman-Polanski-at-the-200-001.jpg" style="cursor: move;" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;सीडी दर सीडी फिल्में बदल जाती हैं, जीवन बदल जाते हैं, समय, काल, स्थान, भाषा, रंग, रुप सब कुछ। हर प्लेबैक की शुरुआत नये लोगों से परिचय कराती है। मैं खुद को इन पात्रों में खोजने लगता हूं। मुझे कोई पात्र अपनी तरह नहीं लगता । इन पात्रों के आपसी संवाद में अपनी उपस्थिति मुझे नजर नहीं आती। लेकिन मैं एक मूक दर्शक भी नहीं रह पाता। धीरे धीरे ये पात्र बड़े अदृश्य तरीके से मेरे लहू का हिस्सा बनने लगते हैं। मेरे न्यूरोन्स में ये पात्र कब्जा करने लगते हैं। मेरे सामने नये चरित्र फिल्म के रुप में आते हैं और मेरे दिमाग में पुरानी फिल्मों और कुछ वास्तविक घटनाओं के चरित्र एक दूसरी फिल्म की तरह एक साथ जीने लगते हैं। शोर करने लगते हैं। मेरे दिमाग में चल रहीं उस समानान्तर फिल्म में कुछ भी स्पष्ठ और तय नहीं होता। मैं एक साथ कई तरह की जिन्दगियों का शरणदाता बन जाता हंू। मेरे दिमाग में गर्भवती रोजमेरी अपने पति से लड़ रही होती है। कि वो क्यों अब उससे पहले जैसा प्यार नहीं करता। मैं पति हो जाता हू। मुझे अपराधबोध होने लगता है कि एक सुन्दर लड़की जो मेरे साथ कई अन्तरंग और मधुर क्षणों की सहभागिनी रही है आज जब मेरी जिन्दगी में इतना बड़ा परिवर्तन लाने जा रही है तो मैं उसके प्रति लापरवाह हो गया हूं। मैं स्वार्थी हो गया हूं। मैं खुद को कोस ही रहा होता हूं और रोजमैरी अपना गुस्सा व्यक्त कर ही रही होती है कि द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बीच एक पियानिस्ट कहीं धमाके के धुंए के बीच से उभरता है। पियानो बजाने लगता है। ऐसे जैसे पियानो बजाना सांस लेना हो। और सांस लेने की लय एक गीत। पियानो की आवाज एक गीत बन जाती है और मैं उस गीत को अपने अंदर जीने लगता हूं। मेरी उंगलिया थिरकने लगती हैं। मैं आंखें बंद कर लेता हूं। पियानिस्ट हो जाता हूं। मैं इस लयबद्धता को जी ही रहा होता हूं कि एक लेखक मुझे अपनी कहानी सुनाने लगता है। कि किस तरह एक खूबसूरत लड़की से उसने पहले बेइन्तहां प्यार किया। फिर एक प्यार और वासना से भरी लम्बी जिन्दगी जी। कैसे उसकी देह के स्पर्श को जीते, महसूस करते और उसका आनन्द लेते हुए वो औरत उसके लिये आनन्दप्राप्ति का जरिया भर रह गई। उसे उपेक्षित समझते समझते एक दिन जब उसने उसे घर से निकाल दिया तो वो रोई, बिलखी लेकिन वो आदमी बेअसर पत्थर बना रहा। और एक दिन धोखा देकर उसे एक हवाई जहाज में अकेले छोड़ आया। कि कैसे एक दिन जब वह विकलांग हो गया तो वो वापस आई। और लम्बे समय तक हुए अपने उत्पीड़न का बदला लिया। उस आदमी की पीड़ा उस औरत कोे असीम सुख देने लगी। परपीड़ा से पैदा होता यह और्गेजम उसके लिये दैहिक सुख हो गया। मैं लहरों के इर्द गिर्द गोते खाते उस आदमी की कहानी को किसी जादुई असर से बंधा सुनता जाता हूं कि दो गोलियां चलती हैं। मैं देखता हूं कि पहले वो लड़की और फिर वो लेखक वहीं ढ़ेर हो जाते हैं। उनका खून उनके छलनी हुए दिमाग से निकलकर मेरे दिमाग की सतहों पर बहता मेरे खून से मिलने लगता है। मुझे अपने खून से उनकी गंध आने लगती है। अपने अंदर उनकी मौत बहती महसूस होती है। और लेखक अब भी मुझे उस लड़की के अभूतपूर्व सौन्दर्य की कहानी सुना रहा होता है। ये कहानी मेरे लहू में बहने लगती है, बह रही होती है कि इस बहाव को दिमाग के किसी मोड़ में एक अमेरिकन लड़की आकर रोक देती है, उस सुन्दर लड़की की टीशर्ट फटी हुई है और कुछ लड़के एक कार से दूर जाते नजर आते हैं। लड़की एक बियाबान में है। वहां एक हवेलीनुमा घर है। विचित्र किस्म की रहस्यमयता लिये घर। लड़की उत्सुकता से हवेली में घुसती है। उसे एक बूढा आदमी दिखाई देता है जिसकी भाषा लड़की के लिए एक अनसुनी भाषा है। लड़की उससे कुछ पूछना चाहती है वो ध्यान नहीं देता। कुछ ढ़ूंढ़ता सा कहीं गायब हो जाता है। पूरा घर सुनसान है, वहां दूर दूर तक किसी की आवाज़ नहीं है। लड़की एक कमरे में पहुंचती है। उसके हाथ में एक डायरी और एक पैंसिल है। जिसे घर में घुसते हुए एक कुत्ते ने झपटने की कोशिश की थी। वो पहले अपनी फटी टीशर्ट को उतारती है, फिर पूरी तरह निर्वस्त्र हो जाती है। थकी है। सामने बिस्तर है। सानेे लगती है। देखती है कि कमरे में एक छोटा सा छेद है वो उस छेद में अपनी पैंसिल घुसा देती है। और कम्बल ढ़ककर निश्चिंत होकर सो जाती है। कुछ देर में उस पैंसिल को दूसरे कमरे से खींच लिया जाता है। फिर कुछ नहीं होता। सुबह होती है। लड़की अपनी जींस पहनती है। देखती है कि उसकी टीशर्ट गायब है। आस पास ढूंढ़ती है। टीशर्ट कहीं नहीं मिलती। डरते डरते बिना कुछ पहने ही कमरे से बाहर निकलती है। बाहर गैलरी है, खाली सी। पास में उसे एक सफेद झीना सा कपड़ा मिलता है। उससे अपना उपरी हिस्सा ढ़क लेती है। बाहर आती है। वहां एक डायनिंग टेबल है। उसपर खाने के बरतन और किस्म किस्म की खाद्य सामग्री है। चाय है। पर कोई नहीं है। उसे भूख लगी है। एक कप में चाय उड़ेल ही रही होती है कि उसे पीछे एक हलचल सुनाई देती है। वहां कुर्सी पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा है। वो घबराती है। आदमी कुछ कहता है। उसे समझ नहीं आता। वो उसे चाय का कप ले जाकर देती है। वो ले लेता है। कुछ देर बाद वहां एक गेंद आकर गिरती है। उपर से कुछ लड़के गेंद का पीछा करते आते हैं और बारामदे में झांकते हैं। &amp;nbsp;अधेड़ आदमी तिलमिला उठता है। लड़के उसे चिढ़ाने लगते हैं। अब तक बिल्कुल खूसट और प्रभावशाली सा दिखने वाला वह इन्सान दयनीय लगने लगता है। लड़के इशारा करके लड़की को उपर बुलाते हैं और वापस चले जाते हैं। आगे कुछ विचित्र घटनाएं होती हैं। मसलन एक दृश्य में वह आदमी चीते की खाल पहनकर लड़की से कहता है कि वो उसे कोड़े से मारे। लड़की पहले हंसती है। उसे ये मजाक लगता है। लेकिन वो आदमी बाघ की ही तरह हिंसक हो जाता है। डरके मारे लड़की उसे कोड़े मारने लगती है। आदमी इस पीड़ा का आनन्द लेने लगता है। दूसरे दृश्य में लड़की को घर के पास समुद्री किनारे में एक बूढ़ा मिलता है और उससे कहता है कि जितनी जल्दी हो सके इस जगह को छोड़ दे। ये जगह वैश्याओं के लिये है। फिल्म को कहीं किसी ने एलिस इन वन्डरलैन्ड का ओवरसेक्सड वर्जन भी कहा है। मुझे लगता है कि मैं एक अजीब सी सेक्सुअल दुनिया का हिस्सा हो गया हूं। जहां एक अजीब तरह की स्वच्छन्दता है। और सेक्स के प्रति एक अजीब तरह की मानसिक बिमारी से ग्रसित लोग। अन्त में लड़की भागती हुई हवेली से निकलती है और अदृश्य हो जाती है। सामने जैसे कुछ उभरता है। एक आदमी झोला लटकाये मेरी ओर आता है, दरअसल वो मेरी ओर नहीं आ रहा बल्कि किसी किताब की खोज में जा रहा है। वो द नाईन्थ गेट के अंकों को खोजता, उनकी प्रामाणिकता को तलाशता अलग अलग लेखकों के पास पहुंचता है। इस प्रक्रिया में उसका सामना मौत से होता है। उसके कई दुश्मन हो जाते हैं। और एक दैवीय शक्ति एक लड़की की शक्ल में उसे बचा लेती है। मैं डिटैक्टिव हो जाता हूं। मुझे समझ नहीं आता कि वो लड़की क्यों मेरी मदद कर रही है। ये मेरे लिये एक रहस्य हो जाता है। रहस्य बढ़ता चला जाता है। एक आदमी जो नाईन्थ गेट के किसी एक अंक का लेखक है, जल रहा है। उसे भरोसा था कि वो जल नहीं सकता क्योंकि उसके पास एक खास किस्म की ताकत है। उसके साथ उसका ये विश्वास भी जलने लगता है। वो चीख रहा है। मुझे लगता है कि मेरा विश्वास भी उसी आग में जलने लगा है। मुझे समझ नहीं आता कि मेरा विश्वास आंखिर था किस पर। अपने अमरत्व पर, अपनी शक्ति पर या इस बात पर कि मेरे दिमाग के अन्दर चल रहे इस चारित्रिक और एक किस्म के फिल्मी महाभारत के बीच मैं खुद को बचा भी पाउंगा कि नहीं। कि पोलान्सकी अपने चरित्रों के साथ कहीं मुझे भी तो अपनी उंगली पर नहीं नचाने लगेंगे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7iIqMrqJI/AAAAAAAAApM/gu_7jPwXC1U/s1600/Photo244.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7iIqMrqJI/AAAAAAAAApM/gu_7jPwXC1U/s320/Photo244.jpg" style="cursor: move;" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;&amp;nbsp;मैं फिर किसी बाहरी शक्ति के प्रभाव से वर्सोवा की तरफ चल पड़ता हूं। वहां फिर एक शाम है। एक सूरज है। रेत पर सूरज की मध्धम होती आंच का चांदीपन है। रेत की सतह पर समुद्र की लहरों की सबसे कम शक्ति वाली महीन परत पारे की तरह चमकती लौट रही है। घोड़े दौड़ रहे हैं। एक छोटी मासूम सी बच्ची अपने लिए रेत का घर बना रही है। उसका नन्हा सा भाई उस घर को तोड़ रहा है। लड़की उससे झगड़ रही है। वो लड़की को चिढ़ा रहा है। एक बड़ा आदमी जो शायद उनका पिता है उन्हें डांट रहा है और अलग कर रहा है। उन्हें कुछ समझा रहा है। फिर तीनों मिलकर घर बनाने लगते हैं। बच्चे कितनी आसानी से मान जाते हैं। एक लहर आती है। तेज लहर। वो घर को तोड़ देती है। तीनों भीग जाते हैं। खिलखिलाते हैं हंसते हैं। उनकी हंसी रेत में बिखर जाती है। रेत और सुनहली हो जाती है। सुनहली रेत मेरे अन्दर समा जाती है। लहू बनकर मुझमें तैरने लगती है। वो दो बच्चे और उनका सम्भावित पिता मेरे दिमाग में समा जाते हैं। रोमान पोलान्सकी के पात्रों के साथ घुल मिल जाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7h1xfE1BI/AAAAAAAAApI/6Jk2FIOkHHY/s1600/Photo214.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7h1xfE1BI/AAAAAAAAApI/6Jk2FIOkHHY/s320/Photo214.jpg" style="cursor: move;" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010';"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 21px;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Kruti Dev 010'; line-height: 21px;"&gt;&amp;nbsp;मुझे लगता है कि हर नई घटना रेत है। इस तरह मैं जिस भी घटना को अपने भीतर जमा करता हूं वो घटना रेत हो जाती है। और मेरे उन्हें याद करने का समय समुद्र है। इस समुद्र में लहरें रेत को बहाती ले आती हैं। मैं बहाव में बहता चला जाता हंू। समय हो जाता हूं। मेरे अन्दर रेत जमा होने की असीम सम्भावनाएं और अपार गुंजाईश है। इस तरह मैं समय हूं और समुद्र भी।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-1732886289137591669?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/1732886289137591669/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=1732886289137591669' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/1732886289137591669'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/1732886289137591669'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='रेत और रोमान पोलान्सकी'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TS7hFrwWhiI/AAAAAAAAAo8/J3Qg_eRzA8k/s72-c/Photo202.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-8170485861709903493</id><published>2010-11-11T03:56:00.000-08:00</published><updated>2010-11-11T04:09:10.801-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमाथैक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्मों पर'/><title type='text'>सिनेमाथैक पर ईदियां.....</title><content type='html'>&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe49BJ7JI/AAAAAAAAAnc/lQV4fqnqUlo/s1600/cinematheck+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe49BJ7JI/AAAAAAAAAnc/lQV4fqnqUlo/s320/cinematheck+3.jpg" style="cursor: move;" width="226" /&gt;&lt;/a&gt;कश्मीर को इस पूरे दौर में एक ऐसे प्रान्त के रुप में देखा, समझा और महसूस किया गया है जो किसी देश से जुड़ने और अलग हो जाने के बीच ऐसे पिस रहा है जैसे दो पाटों के बीच कोई परम्परा पिस रही हो। जैसे अलग होने और अपना साबित करने के बीच की ये लड़ाई अपने राजनैतिक, धार्मिक और भौगोलिक कारणों के वजहकर कभी खत्म ही नहीं होगी। चलती रहेगी। इस लड़ाई पर हर तरह के लोग अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते। लेकिन इन हर तरह के लोगों में ऐसे लागों की तादात ज्यादा है जो उस जददोजहद को बाहर से देख रहे हैं। उसे जी नहीं रहे। इस जददोजहद के बीच सब अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग जो वहां की जिन्दगी जी रहे हैं उनके अपने भीतर कोने हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TNvU-FAHiKI/AAAAAAAAAok/YX2QZErTCz0/s1600/cinema+2.bmp" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.facebook.com/topic.php?uid=124856854204506&amp;amp;topic=297"&gt;&amp;nbsp;इस बार के सिनेमाथैक के सैशन&lt;/a&gt;&amp;nbsp;में प्रदर्शित इरफान, अमन और अफरोज की एक फिल्म ईदियां इन भीतर कोनों की एक बेहद अंतरंग झलक हमारे सामने पेश करती है। इरफान कश्मीरी हैं और उनके बांकी दो साथी उनके साथ कश्मीर जाकर उन भीतर कोनों की झलक लेकर आये और उन्होंनो मिलकर ईदियां बनाई। तीनों की डिप्लोमा फिल्म ईदियां 19 मिनटों में एक ऐसी मां की कहानी कहने की कोशिश करती है जिसका बेटा अचानक एक दिन गायब हो गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TNvU-FAHiKI/AAAAAAAAAok/YX2QZErTCz0/s1600/cinema+2.bmp" imageanchor="1" style="clear: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="211" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TNvU-FAHiKI/AAAAAAAAAok/YX2QZErTCz0/s320/cinema+2.bmp" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;Irfan and Aman sharing views on their film&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;और कभी लौटा नहीं। वो जिन्दा भी है कि नहीं मां ये नहीं जानती। उसकी एक बहन है जो अपने भाई को बहुत याद&amp;nbsp;करती है, उसे पत्र लिखकर अपनी परेशानियां कहती है। कि मां ने आज उसे डांटा। कि वो कब वापस आ रहे हैं। वो बहन नहीं जानती&amp;nbsp;कि भाई के साथ क्या हुआ है पर उसे उम्मीद है कि वो लौटेगा जरुर। फिल्मकार कहते हैं कि कश्मीर में हजारों ऐसी मांएं और बहने हैं। जो शायद कश्मीर को उतने विस्तृत संदर्भ में नहीं देखती जितने अरुन्धती राय सरीखे इन्टलेक्चुअल्स या फिर राजनेता। फिल्म कश्मीर के हालातों पर अपनी कोई &amp;nbsp;बड़ी राय नहीं रखती या कोई समाधान ही परोसती है। लेकिन कोशिश करती है कि कम से कम ये बता पाये कि कश्मीर की समस्या का कोई हल निकल जाना क्यों जरुरी है। ईदियां कई फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जा रही है।&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TNvU53gqqxI/AAAAAAAAAog/ILE7XFwXWhU/s1600/cinema+1.bmp" imageanchor="1" style="clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="218" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TNvU53gqqxI/AAAAAAAAAog/ILE7XFwXWhU/s320/cinema+1.bmp" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;फिल्म की खास बात ये है कि आप उसे देखकर ये नहीं बता सकते कि वो दिल्ली के किसी जामिया नाम की यूनिवर्सिटी के कमरों में फिल्माई गई है। फिल्म के सेट से कश्मीर में होने का भ्रम बर्करार रहता है जो कि एक स्टूडेंट फिल्म के लिये काबिले तारीफ है। फिल्म के मुख्य कलाकार बच्चे कश्मीर से दिल्ली अभिनय करने के लिये बुलाये गये। एम के रैना ने अच्छी कहानी होने की वजह से फिल्म में काम करने के लिए हामी भरी। कश्मीर के कई पारम्परिक बरतन फिल्म की प्रासांगिकता में इजाफा किये देते हैं। और इस तरह ईदियां अपनी जटिल विडम्बनाओं से जूझते कश्मीर के बीच जी रहे एक छोटे से परिवार की छोटी सी कहानी लगभग जस्टिफाईड तरीके से कह जाती है। हांलाकि फिल्म की अपनी तकनीकी कमियां भी हैं। जिनकी चर्चा सिनेमाथैक के सैशन में भी की गई। पर इन कमियों के बावजूद फिल्म एक विचार के स्तर पर अपनी बात कह जाती है।&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TNvU1n6EBeI/AAAAAAAAAoc/mgWPmoF6IMQ/s1600/cinema+3.bmp" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="219" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TNvU1n6EBeI/AAAAAAAAAoc/mgWPmoF6IMQ/s320/cinema+3.bmp" style="cursor: move;" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;सिनेमाथैक के इस सैशन में कविता पाठ भी किया गया जिसमें सैलेन्द्र साहू, उमेश पंत ने अपनी कविताएं पढ़ी&amp;nbsp;और उसके बाद महेश, जुबैर और सैयद मेहदी ने अपनी अपनी फोटोग्राफी का प्रदर्शन भी किया। सिनेमाथैक के आयोजकों को अगले सैशन्स में लोगों की उपस्थिति बढ़ने की उम्मीद है। आयोजकों में से एक राजू बिस्वास का कहना है कि वो लोग जो दिल्ली से जुड़ी अपनी तस्वीरों का प्रदर्शन करना चाहते हैं&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.facebook.com/group.php?gid=124856854204506"&gt;सिनेमाथैक&lt;/a&gt;&amp;nbsp;से सम्पर्क करें। आगामी सैशन्स में इन तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाये जाने की योजना है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-8170485861709903493?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/8170485861709903493/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=8170485861709903493' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8170485861709903493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8170485861709903493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='सिनेमाथैक पर ईदियां.....'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe49BJ7JI/AAAAAAAAAnc/lQV4fqnqUlo/s72-c/cinematheck+3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-5952557157237437956</id><published>2010-09-27T11:32:00.001-07:00</published><updated>2010-09-27T11:32:33.412-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमाथैक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी सोच'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्क्रीनिंग'/><title type='text'>आओ आओ फिल्में देखो....</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe49BJ7JI/AAAAAAAAAnc/lQV4fqnqUlo/s1600/cinematheck+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe49BJ7JI/AAAAAAAAAnc/lQV4fqnqUlo/s320/cinematheck+3.jpg" width="226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;यहां हर रविवार को कुछ नई फिल्में स्क्रीन हो रही हैं। कुछ नये चेहरे उन फिल्मों पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ नये घर वैन्यू में शामिल हो रहे हैं। कुछ नई यादें आगे के लिये जुड़ रही हैं। नई बातें और एक नई सोच। हर बार एक तरह का नयापन। सिनेमाथैक ने अपनी स्क्रीनिंग की तीसरी पारी पूरी की।&lt;a href="http://www.facebook.com/profile.php?id=670350261&amp;amp;ref=ts"&gt; इशिता&lt;/a&gt; हर स्क्रीनिंग के बाद उसपर अपनी एक ताजा &lt;a href="http://www.facebook.com/board.php?uid=124856854204506"&gt;रिपोर्ट&lt;/a&gt; फेसबुक के &lt;a href="http://www.facebook.com/group.php?gid=124856854204506"&gt;सिनेमाथैक ग्रुप&lt;/a&gt; पे पोस्ट कर देती हैं। वो ध्यान से सुनती हैं कि क्या बोला, सुना और विष्लेशित किया जा रहा है। &lt;a href="http://www.facebook.com/profile.php?id=593771242&amp;amp;ref=ts"&gt;मेहदी &lt;/a&gt;बिना नागा किये हर बार स्क्रीनिंग के कुछ &lt;a href="http://www.facebook.com/group.php?gid=124856854204506&amp;amp;v=app_2392950137"&gt;वीडियो&lt;/a&gt; नाईकोन के डीएलएलआर पे दर्ज करा देते हैं और&lt;a href="http://www.facebook.com/Anonymusius?ref=ts"&gt; दीक्षित&lt;/a&gt; स्क्रीनिंग के क्षणों को सिंगल फ्रेम्स के स्टिल्स में उकेर देते हैं। &lt;a href="http://www.facebook.com/profile.php?id=100000000337105&amp;amp;ref=ts"&gt;राजू&lt;/a&gt; और &lt;a href="http://www.facebook.com/profile.php?id=1579331688&amp;amp;ref=ts"&gt;सम्राट&lt;/a&gt; हर आने वाले को कार्यक्रम का परिचय देते हैं, उनके आने के लिये उन्हें धन्यवाद देते हैं और अगली बार आने का न्यौता भी। एक रजिस्टर है जिसमें हर आने वाले का नाम, पता और ईमेल आईडी लिख लिया जाता है। अब आगे सोचा है कि फिल्म स्क्रीनिंग और उसपर थोड़ी चर्चा के बाद सिनेमा के कुछ टमर््स उन्हें समझा दिये जांयें जिनके लिये ये काले अक्षर की तरह हैं। वरना हर बार जब फिल्ममकार अपने लांग शौटस और क्लोज अप्स की चर्चा कर रहा होता है, वो बता रहा होता है कि वो थ्री पौईंट लाईटिंग क्यों नहीं करना चाहता था, या सिनेमेटोग्राफी के दौरान उसके दिमाग में क्या चल रहा था तो कईयों को ये सब एलियन भाषा के शब्द लगते हैं। सोच ये है कि ले मैन टर्म्स में सिनेमा की शब्दावलियों को भी आने वाले और इन्हें न जानने वाले सिनेप्रेमियों को बताया जाये। &amp;nbsp;माने ये कि आप आयेंगे फिल्म देखेंगे और खाली पौपकोर्न खाके लौट नहीं जायेंगे बल्कि कुछ फिल्म के बारे में कहेंगे भी और थोड़ा बहुत सीख भी जायेंगे।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe9gPnthI/AAAAAAAAAnk/hq-1mLotXus/s1600/cinemathech+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe9gPnthI/AAAAAAAAAnk/hq-1mLotXus/s320/cinemathech+2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;आयोजकों की मंसा तो कुछ ऐसी ही है। लगातार फिल्म देखने के दौरान थेाड़ी वैराईटी की जरुरत भी ग्रुप ने महसूस की तो सोचा कि क्यों ना जो लोग यहां आते हैं उनकी कुछ छिपी हुई प्रतिभाओं के लिये सिनेमाथैक एक छोटा सा मंच भी बन जाये। इनमें कई लोग फोटोग्राफी कर लेते हैं, पेंटिंग बना लेते हैं या फिर अच्छी कविताएं लिख लेते हैं। तो क्यों ना साथ मिलकर उनकी इस प्रतिभा को देख सुन भी लिया जाये। इस बार से ऐसा होने लगा है। इस तीसरी स्क्रीनिंग में एक &lt;a href="http://www.facebook.com/photo.php?fbid=10150255283070262&amp;amp;set=o.124856854204506&amp;amp;pid=14813059&amp;amp;id=670350261"&gt;पेटिंग एक्जिबिशन&lt;/a&gt; लगाई गई। जो आये उन्होंने देखा और सराहा। ये सब जो यहां आ रहे हैं युवा हैं। फिल्में देखने का माहौल बनाने में जुटे युवा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;परसों ही अनुराग कश्यप &lt;a href="http://naisoch.blogspot.com/2010/09/2.html"&gt;बहसतलब &lt;/a&gt;के दौरान कह रहे थे कि हमें अपने स्तर पर स्क्रीनिंग के कार्यक्रम करने चाहिये ताकि फिल्मों के प्रति लोगों में रुझान पैदा हो। यहां बात उन फिल्मों की हो रही है जो बहुत छोटे बजट की हैं या फिर स्टूडेन्ट फिल्में हैं जिन्हें बन जाने के&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe7Lfmr_I/AAAAAAAAAng/bnmq5HrtM6U/s1600/cinematheck.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe7Lfmr_I/AAAAAAAAAng/bnmq5HrtM6U/s320/cinematheck.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;बाद उनकी चर्चा तो दूर शायद ही कोई देखता है। ऐसे में अगर सिनेमाथैक जैसा प्रयास लगातार आगे बढ़ता है, उसे सराहा जाता है , और उसके फलक को और विस्तार देने में मदद की जाती है तो निश्चित तौर पर एक सिने संस्कृति पनपने में ये एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। कम से कम बहसतलब में जुटे बड़े बड़े फिल्मकारों की बड़ी बड़ी और कई हद तक सार्थक बातों के समानान्तर एक छोटी सी व्यावहारिक शुरुआत के रुप में इसे देखा जा सकता है। और एक सम्भवना के रुप में भी कि ये छोटी शुरुआत धीरे धीरे बड़ी होगी और इसके युवापन में और परिपक्वता आयेगी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-5952557157237437956?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/5952557157237437956/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=5952557157237437956' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/5952557157237437956'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/5952557157237437956'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html' title='आओ आओ फिल्में देखो....'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TKDe49BJ7JI/AAAAAAAAAnc/lQV4fqnqUlo/s72-c/cinematheck+3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-1517420803415681186</id><published>2010-09-25T00:27:00.000-07:00</published><updated>2010-09-25T00:27:23.487-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बहसतलब- भाग 2'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा'/><title type='text'>सिने सफर मुख्तसर -भाग 2</title><content type='html'>बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर &lt;b&gt;अविनाश &lt;/b&gt;ने खुद कुछ कहने के बाद &lt;b&gt;वरुण ग्रोवर&lt;/b&gt; को दे दी। वरुण ग्रोवर &amp;nbsp;ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त प्रयोग हो रहे हैं। फिल्म की पब्लिसिटी के लिये फिल्म की हिरोईन मसलन मनीसा काईराला के मर्डर की अफवाह तक फैलाने से गुरेज नहीं किया जाता। मल्टीप्लेक्स छोटी यानी कम बजट की फिल्मों का दुश्मन है। ये एक तरह का अलग देश है। वहां महंगाई का अपना अलग अर्थशाष्त्र है। फिल्मों के लिये एक खास तरह का माईन्डसेट और आडंबर&amp;nbsp;पनप रहा है। और इस वजह से पाईरेसी भी एक मीडियम बन गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक 80 से ज्यादा वृत्तचित्र बना चुके&lt;b&gt; अनवर जमाल&lt;/b&gt; कहते हैं कि बाविुड शब्द को लेकर मेरी पहली आपत्ति है। सिनेमा का सम्बंध अगर ओरिजनैलिटी से है तो उसे बालिवुड जैसे किसी चोले की जरुरत ही नहीं है। अगर सिनेमा को उत्तर भारत के समाज से जोड़कर देखें तो उसके बाजार को समझा जा सकता है। डोक्यूमेंटी फिल्मों में भी स्तर की बात करें तो कम से कम सवा दो हजार फिल्में ऐसी हैं जिन्हें मल्टीप्लेक्स में दिखाया जा सकता है। साल की डेढ़ दो सौ फिक्शन फिल्में ऐसी बनती हैं जिन्हें कोई आमिरखान नहीं मिलता और प्रमोशन के अभाव में वो चर्चा में आ नहीं पाती। समस्या ये है कि सिनेमा अब पैशन की जगह पैसे से ज्यादा जुड़ गया है। भारतीय सिनेमा के फाईनेंसिंग मौडल की बात करें तो मुम्बई की फिल्म इन्डस्टी विश्व के डवलप्मेंट सेक्टर में दश्मलव से भी कम हिस्सा रखती है। मेरा अपना फंड जुटाने का तरीका ये है कि मैं मुददे से जुड़े हुए विशयों पर काम कर रहे एनजीओ से फंड जेनरेट करता हूं। अगर बाजार को अपना अस्तित्व बनाये रखना है तो उसमें एकरुपता जरुरी है। लेकिन इसके विपरीत फिल्मों का बाजार इसलिये कम है क्योंकि उनका नेरेटिव केवल मध्यवर्ग पर केन्द्रित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;संजय झा मस्तान &lt;/b&gt;ने बताया कि मेरी दो फिल्मों को लेकर मेरे अनुभव अलग अलग हैं। जहां स्टिंग्स को लेकर मेरा बाजार का अनुभव अच्छा नहीं रहा वहीं मुम्बई चकाचक को रिलीज करने में मुझे अब तक इन्तजार ही करना पड़ रहा है। उसे कभी राजनीतिक एंगल देकर रोका गया तो कभी उसके नाम को लेकर कहा गया कि वो मुम्बई से बाहर नहीं चलेगी। ऐसे में हर फिल्म को बाजार में लाने की अपनी अलग कहानी निकलकर आती है। इसका कोई निश्चित आर्थिक माडल नहीं है लेकिन इतना जरुर है &amp;nbsp;िकइस तरह बाजार से संघर्ष करना आसान नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अजय ब्रहमात्मज&lt;/b&gt; ने संजय द्वारा दबे दबे स्वरों में कही जा रही कहानी को बिल्कुल खोलकर सामने रख दिया। उन्होंने सच बताते हुए कहा कि मुम्बई चकाचक के पीछे की कहानी ये है कि उसे निर्माता ने एक मल्टीनेश्नल कम्पनी को बेच दिया। लेकिन तभी इस कम्पनी को महाराष्टा सरकार का एक बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया जहां से करोड़ों रुपये निर्माता को मिल रहे थे। ऐसे में यदि वो फिल्म को रिलीज करती तो सम्भव था कि उसका रानैतिक एंगल समस्याएं खड़ी करता। जो सरकार को गवारा नहीं होता। ऐसे में कम्पनी ने किया ये कि उस फिल्म को वापस निर्माता को दे दिया । निर्माता ने निर्देशक से कहा कि आप ही इसे रखो और रिलीज करो। इस तरह कहानी ये है कि निर्देशक की मेहनत की बाजार में कोई कद्र नहीं है। लेकिन बाजार से भागने पर काम नहीं चलेगा। उसे समझना होगा। आचकल एक बच्चा फिल्म के बारे में सबसे पहले ये सोचता है कि ये चलेगी कि नहीं। यही सोच दर्शकों से लेकर निर्माता तक पैठ रखती है। जबकि कम से कम दर्शकों को इस बात से मतलब नहीं होना चाहिये कि फिल्म चलेगी कि नहीं। ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उन्हें फिल्म कैसी लगी। आजका पूरा फिल्म कल्चर कुद जेबों में सिमटकर रह गया है। यही जेबे निर्धारण कर रही हैं कि फिल्म का क्या होना चाहिये। लेकिन फिल्म के बाजार को समझना है तो उसे भेदना होगा। ये बाजार आपको अपमानित करेगा। आपको दुर्दुरायेगा। जिसे इस क्षेत्र में आना है उसे ये शुरुआती हकीकत समझनी ही होगी। दरअसल लोगों में विरोध करने की प्रवृत्ति नहीं है। अगर फिल्म आपको पसंद नहीं आती तो क्यों उसका बायकौट नहीं करते। यदि ये बर्ताव करना लोगों ने सीख लिया तो उन्हें वही दिखाया जायेगा जो वो देखना चाीते हैं। पूरा उत्तर भारत अपनी आवाज को लेकर सिनेमा में क्यों दखल नहीं देता। क्यों सिनेमा को दक्षिण भारतीय दुनिया से खींचकर उत्तर भारत की तरफ नहीं मोड़ता। क्यों ऐसा है कि देश में 800 से कम मल्टीप्लेक्सों में बैठकर फिल्में देखने वाले 16 लाख लोगों के आधार पर ये बात निर्धारित हो जाती है कि 100 करोड़ से ज्यादा लोगों को क्या दिखाया जाये ।हमें ये बातें एक दर्शक होने के नाते समझनी होंगी और इन पर सवाल करने होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जयदीप&lt;/b&gt; ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि मेरी अपनी फिल्म जो कि 95 लाख रुपये में बनी, उसकी एडिटिंग भी नहीं हुई थी कि निर्माता ने उसे 1.5 करोड़ रुपये में बेच दिया था। सेटेलाईट राईट पर आने वाला खर्च वसूल हो जाने की शर्त पर निर्माता फिल्मों को रिलीज होने से पहले ही बेच देते हैं। क्योंकि वो फिल्म से अपना लाभंाश कमा चुके होते हैं तो ऐसे में उनका फिल्म से इटेस्ट लूज हो जाता है। हमारी इन्डस्टी में फिल्मों को लेकर एक बज बन जता है। हल्ला रिलीज होने के तुरंत बाद उसपर काफी नकारात्मक समीक्षाएं समाचार पत्रों ने छापी। कहा कि फिल्म अच्छी नहीं है। हैरानी की बात ये थी कि अलग अलग समीक्षक द्वारा लिखे गयी समीक्षओं की भाषा में कई समानताएं थी। लेकिन कुछ दिनों बाद जब अनुराग ने इस फिल्म की सकारात्मक समीक्षा लिखी तो उसके बाद कहीं कोई नकारात्मक समीक्षा छपी ही नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनुराग कश्यप&lt;/b&gt; ने फिल्मों के बाजार पर अपनी बात रखते हुए कहा कि दक्षिण भारतीय फिल्मों का बाजार इसलिये इतना बड़ा है क्योंकि वे अपनी कहानियों पर फिल्में बनाते हैं और वहां के लोग उसे पसंद करते हैं। हमें अपनी फिल्म देखने की आदतें बदलने की जरुरत है। हमें अपनी फिल्में रिलीज करने के लिये एक सही मौडल तलाशने की जरुरत है। लोग फिल्मों के लिये बड़े बड़े डिस्टिब्यूटर तलाशते हैं लेकिन मैने खुद लोगों के पास जा जाकर अपनी फिल्में बांटी हैं। हमें अपनी फिल्म को स्क्रीन करने के लिये खुद भी प्रयास करने की जरुरत है। हमारी फिल्में विदेशों में इसलिये कारोबार नहीं करती क्योंकि वहां के बाजार और हमारे बीच कुछ बिचौलिये हैं जिन्हें केवल मुनाफे से मतलब है इस बात से नहीं कि ज्यादा से ज्यादा लोग फिल्म देखें। मेरा बिजनेस मौडल ये है कि हर देश में मेरे अपने लोग मौजूद हैं जो फिल्म की पब्लिसिटी करते हैं। मेरे सम्पर्क हर किसी से अच्छे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आउटलुक की फिल्म समीक्षक &lt;b&gt;नम्रता जोशी&lt;/b&gt; ने इस बात को लेकर तल्खी जताई कि आजकल फिल्मों की रिलीज से पहले व्यक्तिगत स्तर पर स्क्रीनिंग होने लगी है। निर्माता निर्देशक और सिनेमाहाल के मालिक उन लोगों को व्यक्तिगत तौर पे फिल्में दिखाते हैं जहां से अच्छी समीक्षाओं की गारंटी मिले। ये एक तरह की राजनीति है जो फिल्म समीक्षकों की ईमानदारी पे सवाल खड़े करती है। कौर्पोरेटाईजेशन और मल्टीप्लेक्साईजेशन फिल्मों का सबसे बड़ा दुश्मन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे सत्र में &lt;b&gt;सिनेमा के भविष्य &lt;/b&gt;को लेकर बातें रखी गई। सत्र की शुरुआत करते हुए &lt;b&gt;रविकान्त&lt;/b&gt; ने कहा वैकल्पिकता को किसी परिभाषा में नहीं गढ़ा जा सकता। हर रचनात्मक चीज वैकल्पिक है। मुख्यधारा के सिनेमा में भी एक वैकल्पिक रचनात्मकता है। मुझे मसाला फिल्मों में भी वैकल्पिकता नजर आती है। फौर्मूला फिल्में भी दरअसल फौर्मूले को तोड़कर ही बनायी जाती हैं। इन फिल्मों हर व्यक्ति अपने लिये एक कोना तलाश लेता है। बल्कि इन्टरनेट जैसी तकनीक ने इसे कोने से निकालकर ग्लोबल कर दिया है। रत्नाकर त्रिपाठी ने अपने एक लेख में कहा है कि भोजपुरी सिनेमा भी अब ग्लोबल हो रहा है। वो अपना सीमित संसार छोड़कर विस्तार पा रहा है। और इसमें अभी और संवेदनशीलता पैदा होगी। वास्तव में वैकल्पिकता की उर्जा हर तरह के सिनेमा को देखने और परखने से ही प्राप्त की जा सकती है। रचनात्मकता के कई धरातल हैं इसीलिये किसी भी फिल्म को गैर रचनात्मक कहके सिनेमा ने तमाम संघर्ष करके जो प्रयोग किये हैं उन्हें हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। हम ये पहले से ही तय करने लगते हैं कि लोगों को क्या दिखाया जाना चाहिये ।हम सोचते हैं कि जो हम दिखा रहे हैं उससे दर्शक में बदलाव होगा लेकिन इस तरह सोचकर हम दर्शक के अपने विवेक को नकार रहे होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रवेश भारद्वाज &lt;/b&gt;ने कम बजट की फिल्मों को लेकर कहा कि जैसा साहित्य में भी होता है कि किसी लेखक की किताब 1100 की संख्या में छपती है तो किसी की 40000 की संख्या में। यही सिनेमा में भी होता है। पर इससे कम संख्या में छपने वाले का साहित्य निचले दर्जे का नहीं हो जाता। ऐसे ही हमें कम बजट वाली फिल्मों को सम्मान की नजर से देखना चाहिये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनसत्ता के संपादक &lt;b&gt;ओम थानवी&lt;/b&gt; ने कहा कि हमारे समय में सिनेमा देखने जाना खराब होने की निशानी माना जाता था। पर अब ऐसा नही है। आज हर चीज को कामेडी और मसाले में ढ़ालने के प्रयास फिल्मों में होने लगे हैं। यहां तक कि बलात्कार तक को कामेडी बनाकर दिखा दिया जाता है। और इसे बाजार कहा जाता है। ये हालात खतरनाक हैं। सार्थक सिनेमा के अवकाश की तलाश मुख्य धारा में की जानी चाहिये। आज के सिनेमा में हिन्दी भ्रष्ट हो रही है। भाषा एक जिम्मेदारी की मांग भी करती है। इस बात का ध्यान फिल्मों में रखा जाना चाहिये। पिकासो ने एकबार कहा था कि अपनी नकल करने से दूसरे की नकल करना बेहतर है। हमारी फिल्मों में कंटेंट के स्तर पर विविधता नहीं आ रही। तकनीकें इतनी प्रभावी हो गई हैं कि कला सिनेमा से गायब हो रही दिखती है। अच्छी फिल्में सोचने का मौका देती हैं। ठहरने की जगह देती हैं। आज सम्पादन के जरिये फिल्मों को ऐसा बना दिया जाता है कि वो सोचने का मौका ही नहीं देती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विनोद अनुपम &lt;/b&gt;ने कहा कि सिनेमा के लिये विकल्प नहीं तलाशा जा सकता। जैसे देश की एक राजधानी है वैसे ही फिल्मों का एक केन्द्र मुम्बई है। इसे चुनौती दिये जाने की कोई जरुरत ही नहीं है। सिनेमा के छोटे केन्द्र इसलिये विकसित नहीं हो रहे कि उनका कोई बाजार ही नहीं है। भोजपुरी फिल्में बिहार से नहीं बल्कि मुम्बई से बन रही हैं। लेकिन उनका कंटेंट बिहार से ही है। इस भ्रम में रहना ठीक नहीं है कि भोजपुरी का कोई बड़ा बाजार है। ये वहां के तीन मुख्य कलाकरों द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अनवर जमाल&lt;/b&gt; ने कहा कि हमारे देश में पिछले दशकों में थियेटर की संख्या में पतन हुआ है। 90 के दशक में देश में 19 हजार के आसपास थियेटर हुआ करते थे। लेकिन आज महज 5 6 हजार थियेटर ही पूरे देश में हैं। अगर हमें सिनेमा में विकल्पों की तलाश करनी है तो वो हमारे सामाजिक और राजनैतिक जुड़ाव से निकल कर आयेंगे। वैकल्पिक उर्जा उस परिवेश से आयेगी जिससे हम जुड़े हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चंद्र प्रकाश द्विवेदी &lt;/b&gt;ने चुटकी लेते हुए कहा कि मार्केटिंग की सच्चाई कुछ और है। वहां महत्वाकांक्षाओं के घोड़े दौड़ रहे हैं और यहां अनुभवों के गधे दौड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अरविन्द&lt;/b&gt; ने हस्तक्ष्ेाप के सिलसिले को शुरु करते हुए कहा कि सार्थक सिनेमा के दर्शक बिखरे हुए हैं। जब तक उनमें नेटवर्किंग नहीं होगी तब तक चीजें नहीं सुधरने वाली। उन्होंने सार्थक सिनेमा और कम बजट के सिनेमा के लिये उम्मीद जगाते हुए इसको बढ़ावा देने के कुछ तरीके सुझाये। उन्होने कहा कि सबसे पहले हमें अपनी फिल्म 35 एमएम पर बनाने और बड़े हाल्स में स्क्रीनिंग करने की जिद छोड़नी होगी। डिजिटन मीडिया ने फिल्म निर्माण को सस्ता बनाया है। आजकल सेटेलाईट के जरिये स्क्रीनिंग सस्ते में हो सकती है। फिल्म के डिस्टिब्यूशन के लिये कुछ वैबसाईटस हैं जो डीवीडी बेचने काम करती हैं और आपको सेयर देती हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर भारत को छोड़कर दक्षिण भारतीय प्रदेशों में राज्य सरकार की ओर से फिल्म लैब खोले गये हैं। इन्हें राज्य सरकार फंड करती है। यहां भी ऐसा होना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विनीत &lt;/b&gt;ने कुछ सवाल खड़े करते हुए कहा कि असल सवाल ये है कि विकल्प को किसी इवोल्यूशन की तरह देखना चाहिये या इसे एक अलग स्टीम माना जाना चाहिये। क्या केवल सिनेमा को सस्ता बना देने से ही विकल्प तैयार हो जायेंगे। असली मुददा है जागरुकता के भाव का खत्म हो जाना। विकल्प इस बात से पैदा होते हैं कि समसामयिक हालातों को लेकर आप कितना रिएक्ट करते हैं। आधुनिकता के घिसे पिटे मुददों को सिनेमा पर लादने की कोशिश नहीं होनी चाहिये। सिनेमा कोई वैक्यूम से पैदा होने वाली चीज नहीं है। ये कोई संतई का काम भी नहीं है। हमें सिनेमा को देखने के अपने कारण तलाशने चाहिये। आजकल किसी भी पौपुलर चीज का विरोध करना एक फैशन बनता जा रहा है। सिनेमा हमारे टैंशन से उपजना चाहिये। हमें ये तय करना चाहिये कि हम किसके लिये विकल्प चाहते हैं। अपने लिये या दूसरे के लिये। सिनेमा को सोच और टैंशन कस्तर पर रिसीव करना जरुरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में अविनाश ने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिये सभी आगन्तुकों सहित मुख्य जनतंत्र के सम्पादक समरेन्द्र और यात्रा बुक्स के सत्यनानंद निरुपम का आभार व्यक्त किया। कार्यम का समापन सत्यानंद निरुपम ने किया।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-1517420803415681186?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/1517420803415681186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=1517420803415681186' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/1517420803415681186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/1517420803415681186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/09/2.html' title='सिने सफर मुख्तसर -भाग 2'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-4654932387448560327</id><published>2010-09-25T00:06:00.000-07:00</published><updated>2010-09-25T23:47:29.996-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बहसतलब'/><title type='text'>सिने सफर मुख्तसर- भाग 1</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मोहल्ला लाईव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स द्वारा आयोजित  बहसतलब का पहला दिन कुछ सार्थक बहसों के नाम रहा ।&lt;b&gt; अविनाश दास&lt;/b&gt; ने कार्यक्रम की रुपरेखा रखी और फिर मिहिर पान्डया के संचालन में कार्यक्रम ने रफतार पकड़नी शुरु की। अभी गाड़ी स्लो पेस में थी। सफर शुरु हुआ ही था। सिनेजगत की उपरी सतहों से शुरु होकर उसकी गहराईयों में उतरता एक बातचीत का सफर जिसमें एक साथ परदे के पीछे अपनी भूमिका अदा करने वाले निर्देशक भी थे, परदे के दूसरी ओर उनकी फिल्मों में अपनी जिन्दगी का अक्स तलाशते दर्शक भी थे और परदे पर उस पूरे सिने संसार की परिभाषाओं को अपने विश्लेषण से गढ़ते मीडियाकर्मी भी। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzTeqpq11I/AAAAAAAAAmk/8sdpmWLb_ZI/s1600/Ajay.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzTeqpq11I/AAAAAAAAAmk/8sdpmWLb_ZI/s1600/Ajay.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बात &lt;b&gt;अजय ब्रहमात्मज&lt;/b&gt; ने शुरु की। उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा के साथ एक बड़ी दिक्कत ये है कि हिन्दी की फिल्मों का विमर्श अंग्रेजी में होता है जिससे एक बड़ा पाठक और दर्शक वर्ग इस विमर्श के अहाते से स्वतह बहिस्कृत हो जाता है। ये सिनेमा में एक तरह से भाषाई शेंध मारने जैसी बात है। हमारे देश में संस्कारों की बात अन्य क्षेत्रों में भले होती हो पर सिने संस्कार का यहां एक भारी अभाव है। सिनेमा जगत में और उससे जुड़े मीडिया में स्टार एक महत्वपूर्ण फिनोमिना की तरह है जिसकी चर्चा और पब्लिसिटी करने का दबाव सिने और मीडियाकर्मियों पर लगातार बना रहता है। यह एक गम्भीर समस्या है कि जो बात मुम्बई में कुछ गिनेचुने और खास लोगों के बीच तय की जाती है उसका प्रचार प्रसार करना एक तरह की मजबूरी हो जाता है। उन्होंने कहा कि बेहसतलब का ये प्रयास सलीके से पड़ा एक ठोस कदम है। और खास बात ये है कि यहां हिन्दी में सवालों को सुनकर अंग्रेजी में जवाब देने वाले लोग नही हैं। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzToTL_INI/AAAAAAAAAmo/JTGwdrRlXFw/s1600/anurag.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzToTL_INI/AAAAAAAAAmo/JTGwdrRlXFw/s1600/anurag.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम के इस सैशन का असल मुददा ये था कि &lt;b&gt;बालिवुड की कंटेंट फक्टी की लगाम किसके हाथ में होनी चाहिये&lt;/b&gt;। इस विषय पर सबसे पहले &lt;b&gt;अनुराग कश्यप &lt;/b&gt;ने अपनी बात रखी। अनुराग ने कहा कि वो खुद यही मानते हैं कि अन्ततह चाहे कुछ भी हो लेकिन मूलतह कंटेट का निर्धारण खुद निर्देशक के हाथ में ही होता है। फिर उस कंटेंट की मूल आत्मा कितनी जिन्दा रह पायेगी ये इस बात पे निर्भर करता है कि प्रोडयूसर का पेट कितना कमजोर या मजबूत है माने ये कि अगर प्रोडयूसर के पास ठीक ठाक पैसा है तो आपका मूल तत्व ज्यादा सफर नहीं करेगा और यदि वो कम पैसे वाला है तो तय मानिये कंटेट क्या से क्या हो जायेगा और आप देखते रह जायेंगे। ये बात मान लेनी चाहिये कि सिनेमा एक खर्चीला आर्ट फौर्म है जो किसी दूसरे के पैसे से बनता है। यहां निर्देशक के फिल्मनिर्माण के बीते हुए कल से निर्धारित होता है कि उसे आगे काम मिलेगा भी कि नहीं। अगर वो फिल्म में लगे पैसे की रिकवरी का माददा रखता है तो ही उसे अगले प्रोजेक्ट के लिये पैसा मिलेगा वरना नहीं। इन साफ सुथरे आर्थिक समीकरणों से राम गोपाल वर्मा जैसे निर्देशकों को फायदा मिलते हमने देखा है। एक और बात जो  ये निर्धारित करती है कि आपका मूल कंटेट कितना बदलेगा वो ये कि आपकी फिल्म का बचट क्या है। अगर बजट कम है तो सम्भव है आपको अपने मन का काम करने दिया जाये लेकिन अगर फिल्म बड़े बजट की है तो कंटेट की कमान आपके हाथ से फिसलना तय है। फिल्मों में कंटेट का स्तर गिरने की एक अन्दरुनी वजह और है। वो है इन्टरमिसन। जैसे ही फिल्म मध्यान्तर तक पहुंचती है दर्शक को एक हाई पाईट चाहिये होता है। वरना वो मध्यान्तर के बाद फिल्म क्यों देखना चाहेगा। ऐसे में फिल्म में जरुरी हो जाता है कि दो हाई पाईंट रखे जांयें।  और इस चक्कर में कंटेंट से समझौता करना पड़ता है। दिक्कत यही है कि सिनेमा एक व्यापार है कोई आर्ट फौर्म नहीं। ऐसा नही है कि केवल भारत में फिल्मों के लिये पैसे की दिक्कत हो। विदेशों में भी ये दिक्कत है लेकिन वहां लोग सब्सिडी, ग्रांट आदि जुटाकर फिल्में बना लेते हैं। हमें यथार्थ को स्वीकारना होगा। अब 5 साल की गारंटी वाला कल्चर नहीं रहा बल्कि 1 साल की वारंटी का दौर है। आज फिल्म देखना इवेंट नहीं है। अगर अपने मन की फिल्में बनानी हैं तो हमें तरीके तलाशने होंगे। मैने कई फिल्मों की स्क्रिप्ट झूठ बोलकर पास करवाई हैं। ऐसा नहीं है कि निर्माता बिल्कुल पैसा लगाने को तैयार ही नहीं हैं लेकिन उन्हें कन्विन्स करने की जरुरत है। मुझे बिहार बिहार के रुरल अन्डरवर्ड पर फिल्म बनाने के लिये 16 करोड़ रुपये मिल रहे हैं। उड़ान फिल्म से मैने बिल्कुल पैसा नहीं कमाया। लेकिन एक निर्देशक के रुप में मुझे तय करना होगा कि या तो मुझे पैसा कमाना है या मुझे अच्छी फिल्म बनानी है। आज फिल्म को सस्टेन रहने के लिये समय नहीं मिल रहा। अगर हमें चीजों से लड़ना है तो बदलाव को समझना होगा। नई तकनीक को समझना होगा। मोबाईल फिल्मिंग के दौर में महज 3 3 मिनट की फिल्मों के लिये मुझे इतना पैसा मिल रहा है जितना मैने अपनी फुल लेंथ फिल्मों से नहीं कमाया। ऐसे में मैं ये नहीं कह सकता कि सम्भवनाएं कम हो गई हैं या खत्म हो रही हैं। बस अवसर को समझना जरुरी है। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzUA0A1jNI/AAAAAAAAAmw/WKeLoi-2kSc/s1600/jaydeep.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzUA0A1jNI/AAAAAAAAAmw/WKeLoi-2kSc/s320/jaydeep.jpg" width="234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बात आगे बढ़ी। &lt;b&gt;जयदीप वर्मा&lt;/b&gt; को माईक मिला। जयदीप वर्मा यानी 2008 में आई फिल्म हल्ला के निर्देशक। हाल ही में बिग सिनेमा द्वारा देश के महानगरों में पहली बार रिलीज की गई &amp;nbsp;डौक्यूमेंटी लिविंग होम&amp;nbsp;के निर्देशक। डौक्यूमेंटी इंडियन आशन बैंड पर बनी थी। जयदीप ने बड़ी नकारात्मक शुरुआत करते हुए कहा कि यह दौर भारतीय सिनेमा का सबसे खराब दौर है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में फिल्मों की कहानियों में कोई विविधता नही दिखाई देती ये हैरान करने वाली बात है। हमारी फिल्मों की कमान तो विर्माताओं के हाथ में है लेकिन फिल्म के कंटेट के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारियां तय नहीं है। अच्छा होता कि निर्माताओं को भी अच्छी बुरी फिल्मों पर पुरस्कार या आलोचना के दायरे में रखा जाता ताकि उनकी नीयत कुछ तो बदलती। कभी एनएफडीसी जैसे संस्थान जो कभी फिल्में बनाने में रुचि दिखाते थे उनकी अब न फिल्मों में रुचि ही है न ही उस विभाग में इतनी काबिलियत। ये दौर एक तरह का इन्टलैक्चुअल कोलोनाईजेशन का दौर है हम इस साम्राज्यवादी किस्म की सभ्यता में अपने प्रोडक्ट को इन्फीरियर समझते हैं इसलिये हम बाहरी फिल्मों की नकल करते है और हमारी कहानियां फिल्मों में नहीं आ पाती। हालत ये है कि जिनके पास फिल्में फंड करने के लिये पैसा है वो अच्छे कंटेंट पर हंसते हैं। हमारी फिल्में स्टाईल के बूते बनने और चलने लगी हैं कंटेंट कहीं गुम सा है और इसी वजह से स्टोरी टैलिंग की बात परिदृश्य से गायब हो गई सी लगती है। ये एक ऐसी पढ़ी है जो कि अपनी पिछली सभी पीढ़ियों से ज्यादा मूर्ख है। उपभोक्ता उत्पाद की प्रवृत्ति फिल्मों में घुस गई है। ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहन देने की प्रवृत्ति घटी है जो अच्छी हैं पर छिपी हुई हैं। विष्लेशकों और लेखक पत्रकारों का सहयोग इसके लिये बहुत जरुरी है। अक्सर फिल्मों की समीक्षाओं में देखा जाता है कि समीक्षक फिल्म को नीचा दिखाने में पूरी मेहनत झोंक देते हैं। जो लोग मेहनत करके फिल्में बनाते हैं उन्हें इज्जत दी जानी चाहिये। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzVA09IBqI/AAAAAAAAAm0/O7nkN45QUeI/s1600/Anusha.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="220" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzVA09IBqI/AAAAAAAAAm0/O7nkN45QUeI/s320/Anusha.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बहस के सिलसिले में अब बारी थी पीपली लाईव की निर्देशक&lt;b&gt; अनूशा रिजवी&lt;/b&gt; की। अनूशा ने शुरु में ही सवाल किया कि अगर कोई निर्माता फिल्म बनाने में रिस्क नहीं लेना चाहता तो फिल्म का स्वामित्व उसके हाथ में क्यों हो। फिल्मों की लोकप्रियता को लेकर किये जाने वाले शोध की असलियत ये हैगिनी चुनी दस बारह कम्पनियां चार पांच बड़े शहरों में अपने सर्वे कराती हैं और उससे ही ये निर्धारित कर लिया जाता है कि कौन सी फिल्म चलेगी कौन सी नहीं। दूसरी बात ये की निर्देशकों के पीआर से फिल्मों का कंटेंट निर्धारित किया जाने लगा है। &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzVNDcr5XI/AAAAAAAAAm4/UOpUUDoR_AQ/s1600/mahmood.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzVNDcr5XI/AAAAAAAAAm4/UOpUUDoR_AQ/s1600/mahmood.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अनूशा के बाद &lt;b&gt;महमूद फारुकी &lt;/b&gt;ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हम इस मायने में भाग्यशाली हैं कि हमें अन्य फिल्मकारों की तरह अपनी फिल्म बनाने के लिये निर्माताओं के चक्कर नही काटने पड़े। इस मायने में पीपली लाईव की यात्रा अन्य फिल्मकारों की यात्रा से अलक और कम कष्टप्रद है। कला की समस्याएं पिछले तीस सालों से वहीं की वहीं हैं। दरअसल सिनेमा विजुअल मीडिया का एक छोटा सा हिस्सा है। ऐसे में फिल्म की सफलता केवल इस बात से निर्भर नहीं होनी चाहिये कि वो थियेटर में कितने दिनों तक चलती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzTxPyn68I/AAAAAAAAAms/lVMjQEJoKUA/s1600/sudir.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzTxPyn68I/AAAAAAAAAms/lVMjQEJoKUA/s1600/sudir.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बहस की अगली कड़ी बने &lt;b&gt;सुधीर मिस्र&lt;/b&gt; जिन्होंने हजारों ख्वाहिसें ऐसी और खोया खाया चांद जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के लिये फिल्म इन्डस्टी में ज्यादा समस्याएं हैं जिनका कन्टेंट कम लोगों को प्रभावित करता है। मुझे एक निर्माता ने सलाह दी थी कि मैं अपने चाहने वालों से निजात पा लूं। अगर फिल्मों के लिये लोगों में इज्जत खत्म हो रही है तो केवल इस वजह से कि हमने ऐसी फिल्में बनाई ही नहीं जिनकी इज्जत की जा सके। फिल्म के कंटेंट की लगाम अपने हाथ में लेना एक निर्देशक की जिम्मेदारी होनी चाहिये। इसके लिये उसे लड़ना पड़ेगा। वरना फिल्म ना बनाने के बहाने बहुत हो सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzVpk2itjI/AAAAAAAAAm8/zu8xADne09U/s1600/atul_tiwari.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzVpk2itjI/AAAAAAAAAm8/zu8xADne09U/s1600/atul_tiwari.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;निर्देशकों के अपने अनुभवों के बाद अब बारी थी हस्तक्षेप की। हस्तक्षेप के सिलसिले की शुरुआत करते हुए &lt;b&gt;अतुल तिवारी&lt;/b&gt; ने कहा कि भारतीय सिनेमा कोई मोनोलिथ नही है इसके कई रुप हैं। जिसदिन कन्टेन्ट की लगाम दर्शकों के हाथ में चली जायेगी उस दिन मुन्नी सचमुच बदनाम हो जायेगी। कोर्पोरेट का संसार जिसके हाथ में कंटेंट की लगाम चले जाने की बात उठती रही है वो एक ऐसी दुनिया है जिसका अपना कोई चेहरा ही नहीं है। ऐसे में उसकी जिम्मेदारी कैसे तय की जा सकती है। सिनेमा अन्य आर्ट फोर्म की तरह नही है जिसकी लगाम किसी एक व्यक्ति के हाथ में हो सकती हो। कभी सिनेमा एक परिवार हुआ करता था। अब वो घर नही रहा बल्कि बाजार हो गया है। माल मल्टीप्लेक्स के इस समय की मूल परेशानी यही है कि भूखे नंगों की फिल्में दिखाई गई तो उन्हें देखकर कोई समोसा नही खा सकेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzWHA64oMI/AAAAAAAAAnA/iwqCOIjHuy8/s1600/Bhupen-Singh.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzWHA64oMI/AAAAAAAAAnA/iwqCOIjHuy8/s1600/Bhupen-Singh.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;हस्तक्षेप की दूसरी कड़ी में&lt;b&gt; भूपेन &lt;/b&gt;ने अपना हस्तक्षेप दर्ज करते हुए कहा कि फिल्मों में पूंजी लगाने वालों के विकल्प की जरुरत है। सरकार के उपर फिल्मों पर पैसा लगाने का दबाव होना चाहिये। सरकार से इसके लिये मांग की जानी चाहिये। मैने सईद मिर्जा का एक इन्टरव्यू किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि शहरों में फिल्में दिखाने की कोई सरकारी व्यवस्था भी होनी चाहिये। ये बात तय की जानी चाहिये कि फिल्म किस स्तर की संवेदनशीलता की फिल्म है। फिल्में बनाने वालों में उच्च जातियां, हिन्दू और उंचे वर्ग के लोग हावी हैं इसलिये हर तबके की कहानियां वहां नही आ पाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzWIwTIcXI/AAAAAAAAAnE/EPL2R8RMSKA/s1600/ravish+kumar.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzWIwTIcXI/AAAAAAAAAnE/EPL2R8RMSKA/s1600/ravish+kumar.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;बहस के क्रम में अपनी बात रखते हुए एनडीटीवी के&lt;b&gt; रवीश कुमार &lt;/b&gt;ने कहा कि ऐसा नहीं है कि स्थानीय सिनेमा पर पैसा नहीं लग रहा। बात इतनी सी है कि वहां हमारी नजर नहीं पहुंच रही। लेकिन मेनस्टीम सिनेमा में ऐसी फिल्में नहीं बन रही जिसमें हमारा जीवन हो। एक दर्शक के व्यक्तित्व में कई तरह के दर्शक छिपे होते हैं। वह एक साथ बहुत तरह की चीजें देखना चाहता है। ऐसे में सफलता की गारंटी तभी मिल सकती है जब कोई फिल्म उस एक दर्शक की बहुत किस्म की चाहतों में से अधिकतम को संतुष्ट कर सके। कौर्पोरेट का दबाव इसलिये फिल्मों में बढ़़ा है क्योंकि फिल्मों की पकड़ दर्शकों के बीच कमजोर हुई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzWeT_kJ_I/AAAAAAAAAnI/fUyIfL68-Nk/s1600/shesh-narayan-singh.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzWeT_kJ_I/AAAAAAAAAnI/fUyIfL68-Nk/s1600/shesh-narayan-singh.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;पत्रकार और स्तम्भकार&lt;b&gt; शेष नारायण सिंह&lt;/b&gt; के सवाल कि पिंजर जैसी फिल्म क्यों तूफान नहीं मचा पाई पर अनुराग ने कहा कि क्योंकि दर्शकों ने इसे देखा ही नही। मेरी कोई फिल्म आजतक सुपरहिट नहीं गई फिर भी मैं अपना अस्तित्व बर्करार रख पाया हूं तो केवल इसलिये कि हमें जिन्दा रखने के लिये टेलीवीजन जैसे माध्यम हैं जो समय समय पर हमारी फिल्मों को दिखाते हैं। सुधीर ने इसके जवाब में कहा कुछ फिल्में दर्शकों के साथ धीरे धीरे रिस्ता बनाती हैं। पिंजर पर इतने समय बाद आज भी सवाल किये जाते हैं तो केवल इसलिये क्योंकि उसका दर्शकों के साथ एक गहरा रिस्ता है। ऐसी फिल्में ही कालजयी होती हैं। जरुरी नहीं है कि उनको तात्कालिक रुझान मिले। पर वो समय के साथ दर्शकों में अपनी पैठ बना लेती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहसतलब के दूसरे सत्र में फिल्मों में स्त्री पुरुष सम्बन्धों पर चर्चा हुई। इसी सत्र में बात यह भी आई कि फिल्मों में प्यार की अभिव्यक्ति के लिये क्यों हमें अंग्रेजी की मदद लेनी पड़ती है। हिन्दी की गालियों क्यों में अश्लील मालूम होती हैं जबकि अंग्रेजी की गालियों में वो अश्लीलता नजर नहीं आती। इस सत्र में सुधीर मिस्र ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आदमी और औरत के रिश्ते के बारे में मैं यही कह सकता हूं कि वो होना चाहिये। हिन्दुस्तानी सिनेमा में इस रिश्ते के लिये अच्छा स्कोप दिखता है। क्योंकि यहां वो रिश्ता मुमकिन है। उसकी अहमियत है। इस रिश्ते को गुरुदत्त, गुलजार, राजखोसला आदि फिल्मकारों ने बड़ी खूबसूरती के साथ दिखाया है। हिन्दुस्तानी सिनेमा के स्वरुप में इसके लिये काफी जगह है। फिल्मी गाने इस जगह को बखूबी भरते मालूम होते हैं। वहां इस रिश्ते में एक ठहराव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzaEAYdwUI/AAAAAAAAAnQ/M4xYIZVQ-_g/s1600/vinod+anupam.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzaEAYdwUI/AAAAAAAAAnQ/M4xYIZVQ-_g/s1600/vinod+anupam.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;विनोद अनुपम&lt;/b&gt; ने कहा कि आज फिल्मों में मुख्य बात यही सामने आती है कि स्त्री कितनी स्वतंत्र और पुरुष कितना अराजक है। उन दोनों के बीच बस एक ही तरह के रिश्ते की बात फिल्मों में आती है। फिल्मों से देवर भाभी, मां बेटा, भाई बहन जैसे रिश्ते गायब हो गये हैं। कोई भी रिश्ता अराजक तब होता है जब हम अकेले हो जाते हैं। अब हमें इन रिश्तों के बारे में ये तय करना है कि इस तरह के रिश्तों पर नियंत्रण की जरुरत है या हम इस अराजकता का सम्मान करने के लिये तैयार हैं। जादू है नशा है जैसे मशहूर गीत के रचयिता&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzW0nmfpCI/AAAAAAAAAnM/tRR5tPUAZpc/s1600/neelesh-mishra.gif" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzW0nmfpCI/AAAAAAAAAnM/tRR5tPUAZpc/s1600/neelesh-mishra.gif" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नीलेश मिस्र&lt;/b&gt; ने कहा कि टीवी पर स्त्री पुरुष सम्बंध और फिल्मों में दिखाये जाने वाले स्त्री पुरुष सम्बंध दोनों में किन्हीं दो ब्रहमांडों का सा अन्तर है। और इनमें टीवी पर दिखाये जाने वाले सम्बंध वास्तविकता के ज्यादा नजदीक हैं। फिल्मों में असली लोग हमारा रिफ्रेंस नहीं रहे हैं। हम अपने रिश्तों में कहीं अकेले और फलतह बहुत डेस्पिरेट हुए जा रहे हैं। इस क्रम में मराठी फिल्मकार दिनेश &amp;nbsp;ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि मेरे आसपास की दुनिया अकेले पड़ते लोगों की दुनिया है। हमारे पास प्यार को व्यक्त करने के लिये अपनी भाषा नहीं है। हम क्यों इतने सुसंस्कारित हैं कि प्यार जैसी भावना तक को सही से व्यक्त नहीं कर पाते। हम अपने कपड़ों के भीतर छिपी सच्चाई के लिये क्यों इने छिपे हुए हैं। मुझे लगता है कि प्यार की अभिव्यक्ति के प्रति पनपे इस पलायनवाद से बाहर आने की जरुरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-4654932387448560327?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/4654932387448560327/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=4654932387448560327' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4654932387448560327'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4654932387448560327'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/09/1.html' title='सिने सफर मुख्तसर- भाग 1'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TJzTeqpq11I/AAAAAAAAAmk/8sdpmWLb_ZI/s72-c/Ajay.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-2966649577411903011</id><published>2010-09-12T01:31:00.000-07:00</published><updated>2010-09-12T01:32:09.062-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमाथैक'/><title type='text'>एक शुरुआत थोड़ी फिल्मी सी.....</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एक बंद संकरी गली और बत्ती गुल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx60FCSetI/AAAAAAAAAl8/YEtRd1tX860/s1600/cinema+5.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 384px; height: 255px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx60FCSetI/AAAAAAAAAl8/YEtRd1tX860/s320/cinema+5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515918678745578194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंद संकरी गली के भीतर जहां शाम के चार बजे एक खास किस्म का अंधेरा रैंग रहा था। पहुंचते ही कुछ पसीने से नहाई हुई शक्लें किसी चीज का इन्तजार करती दिखाई दी। मैं पहुचा और तय था कि इन्तजार किसी और चीज का था। यार पिछले दो घंटे से लाईट नहीं है। वहां पहुंचने तक तय हो चुका था कि वैन्यू अब चेंज करना होगा। बिना लाईट के स्क्रीनिंग सम्भव नही थी। सिनेमाथैक। इसी नाम से भरतनगर के सराय जुलैना के एक किराये के कमरे में आज कुछ फिल्में दिखाई जानी थी। सोच थी कि जामिया के एमसीआरसी के कुछ छात्रों की फिल्में स्क्रीन कर ली जायेंगी और इसी बहाने उसपे कुछ चर्चा भी हो जायेगी। पर लाईट। वाह लाईट आ गई। किसी ने कहा और सब ये देखकर खुश हो लिये कि सचमुच लाइट आ गई। उम्मीद नहीं थी कि उस छोटे से कमरे की चारपाई में पैर रखने की जगह नहीं रहेगी। आस पास की कुर्सियां धर ली जायेंगी लोग फर्श पर अपनी तशरीफें टिकाकर फिल्म देखेंगे और कुछ बदनसीब ऐसे भी बच जायेंगे जिन्हें दरवाजे से झांक झांककर फिल्में देखनी पड़ें़गी। पर ऐसा हुआ। दो फिल्में दिखाई गई और एक आडियोविजुअल और साथ में हर फिल्म के बाद हुई उसके अच्छे बुरे पहलुओं पर एक गर्मागर्म कही जा सकने वाली बहस। लगभग तीस लोगों के इन फिल्म प्रेमियों के समूह में कुछ थे जिनकी फिल्म दिखाई गई। जिन्हें कठघरे में खड़ा होना पड़ा। अपनी फिल्म पर हो रही क्रिटीसिजम और अच्छी बुरी बातों पर जवाबदेही तय करनी पड़ी। कुछ जो इन फिल्मों के कलाकार थे। कोई हीरो कोई हिरोईन कोई विलेन। जिन्हें शायद इस पूरी प्रक्रिया के दौरान स्टार वाली फीलिंग आती रही हो। पर अपनी कलाकार वाली प्रतिभा का भरपूर प्रयोग कर वो इसे न झलकाने में कामयाब होते दिखे। कुछ जो फिल्में बनाने सम्बन्धी पाठयक्रम के हिस्सेदार होने के नाते वहां आये और जमे रहे। कुछ जिन्होंने फिल्में तो देखी पर उनके तकनीकी पक्ष को लेकर उनका कोई खास विमर्श और इसकी जरुरत दोनों ही महसूस न होने के बावजूद उनके ज़ेहन में कई सवाल थे जो बाहर आये बिना नहीं रहे। लौंग शाट, क्लोजअप जैसी शब्दावलियों से खास सम्बंध न होने के बावजूद उनमें ये सब जानने की लालसा दिखी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गुरुदत्त वाली प्यासा, फुल सर्कल और फिर चाहना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6YcoPR0I/AAAAAAAAAlc/3ux1MgcyRuc/s1600/cinema+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 384px; height: 255px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6YcoPR0I/AAAAAAAAAlc/3ux1MgcyRuc/s320/cinema+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515918204042430274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;स्क्रीनिंग की शुरुआती फिल्म यानी गुरुदत्त वाली प्यासा। एक सीडी की दुकान, छोटा सा शहर और एक युवा प्रेमकहानी। रोहित वत्स, कदीर अहमद, हिना चुग और मेरी उर्फ उमेश पंत की इस फिल्म पर सबसे पहले चर्चा हुई। लोगों ने कहा फिल्म अच्छी है, और अच्छी हो सकती थी। फंलां सीक्वेन्स कमजोर दिखा और फलां सबसे बेहतर। ये शाट ऐसे क्यों लिया और इस शाट में कैमरा मूमेंट ऐसा क्यों रखा गया। फंलां कैरेक्टर थोड़ी और अच्छी एक्टिंग करता तो मजा आ जाता। इन सब बातों के बीच गुरुदत्त होते तो क्या इस बात से खुश नहीं होते कि कल के छोकरे उन्हें ट्रिब्यूट देते हुए फिल्म बना रहे हैं और नालायक देखो तो कैसे फिल्मों पर बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं। शायद उन्हें सीखने की इस प्रक्रिया से अपना नाम जुड़ना पसंद आता। प्यासा और कागज के फूल को इस फिल्म का हिस्सा बनते देखना अच्छा लगता। और शायद मैं छोटे मुंह कोई बड़ी सी बात अपने फिल्मी से जोश में आकर कह रहा हूं। शायद नहीं भी। उदयन की फुल सर्कल और दीक्षित दास, साहू की चाहना अगली दो फिल्में थी जो लगभग तीन घंटे की इस फिल्म देखने की प्रक्रिया का अंग बनी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बिना बैग्राउन्ड का फिल्मकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx66B4qlmI/AAAAAAAAAmE/6B2VPBJa50Q/s1600/cinema+6.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 384px; height: 255px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx66B4qlmI/AAAAAAAAAmE/6B2VPBJa50Q/s320/cinema+6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515918780979123810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ये एक बहुट छोटा सा प्रयास था। लेकिन इसमें कई संकेत छिपे मालूम हुए। मसलन वहां एक फिल्मकार ऐसा भी मौजूद था जिसने पहले कभी फिल्म बनाने सम्बन्धी प्रशिक्षण तो नहीं लिया पर इतना हौसला दिखाया कि एक पीडी 170 उठाकर अपने ही दोस्तों से अभिनय कराकर एक दिखाने लायक फिल्म बनाने में कामयाब हो गया। माने ये कि फिल्म बनाना कोई विशेषज्ञता का काम नहीं रहा बस इतना जिगरा जरुर चाहिये कि एक इनीशियेटिव लिया जा सके। हम कुछ लोगों के बीच अब वो यानि उदयन बिस्वास एक डाईरेक्टर था जो केवल इसलिये भी तालियां बटोर ले गया कि उसने कोई बैग्राउन्ड न होने के बावजूद पहल की और एक फिल्म बनाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फिल्मी फलक के विस्तार की उम्मीद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6gabIidI/AAAAAAAAAlk/c6O57w2olAM/s1600/cinema+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 384px; height: 255px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6gabIidI/AAAAAAAAAlk/c6O57w2olAM/s320/cinema+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515918340889545170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिनेमाथेक की शुरुआत करने वालों में से एक राजू कहते हैं कि वो चाहते हैं कि हर हफ्ते कोई न कोई फिल्म स्क्रीन की जाये जो हमी लोगों के बीच किसी ने बनाई हो। बनाने वाला वहां मौजूद हो ताकि कुछ उससे सीखा जा सके और कुछ उसे भी अपनी कमी और अच्छाईयां मालूम हो सकें। ज्यादातर स्डूडेन्ट फिल्म इसी विडम्बना के सांथ कहीं किसी बर्न सीडी की चकरी में दुबक के रह जाती हैं कि बनने के बाद उसे मुश्किल से कोई देखता या उसपे चर्चा करता है। और फिर दिल्ली के फिल्म स्कूलों में छात्रों की बनी फिल्में स्क्रीन होने और फिर उनपर चर्चा किये जाने की परंपरा ही शायद अब नहीं रही। एफटीआईआई या मुम्बई के फिल्म स्कूलों का आलम कुछ और हो सकता है पर एमसीआरसी के साथ इस मामले में कई दिक्कतें हैं। पहली ये कि वहां छात्र जैसे तैसे फिल्म बनाते तो हैं पर उसके लिये उन्हें उचित निर्देशन नहीं मिल पाता। फैकल्टी का मुम्बई के मेन स्ट्रीम सिनेमा से कोई सम्बंध नहीं होता। मुम्बई से कोई विजिटिंग फैकल्टी यहां आती नहीं या इतने प्रयास ही नही किये जाते कि कोई आना चाहे। ऐसे में छात्र वही बनाते हैं जो उन्हें समझ आता है। वो जैसा भी होता है उनके अपने प्रयासों का नतीजा होता है। और वो इतने भर से संतोष कर लेते हैं कि उन्हें कम से कम मंहंगी फिल्मी तकनीक की सामाग्री ही सही मुहैय्या हो पाई। वो एसआरथ्री से जूझे, बोलैक्स से खेले, नागरा में रिकौर्ड कर पाये और 16 एमएम की फिल्म को एक्सपोज करने का एडवेन्चर उन्हें नसीब हुआ। और कुछ अदद डाली या क्रेन शाट उनकी फिल्म के खाते में जुड़ पाये। बांकि कलाकार, शूटिंग, कास्टयूम, लोकेशन किसी चीज से फैकल्टी का कोई सम्बंध नहीं। आप जुटा पाये तो बेहतर। ना जुटा पाये तो फिर डुबाईये अपनी फिल्म की लुटिया। सीमित फुटेज, सीमित समय और एक बहुत सीमित अहाता जिसके भीतर आपको बीस से पच्चीस मिनट की अपनी फिल्म शूट करनी होगी। खैर ये तो हुआ बहाने से एक विषयान्तर । इस पर कभी और कहा ही जायेगा पूरे विस्तार से। वापस सिनेमाथैक पर लौटें तो सिनेमा पर और खासकर अपने बनाये हुए सिनेमा पर चर्चा करने की इस पहल से उम्मीदें नजर आती हैं। आगे योजना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे जोड़ा जाये। ऐसे लोग जो सिनेमा बनाते हों, समझते हों, समझना चाहते हों और इस पूरी प्रक्रिया से जुड़ना चाहते हों। उम्मीद यही है कि इसका फलक कमरे के अहाते से बाहर आयेगा। स्क्रीनिंग में इतने लोग जुटेंगे कि एक हाल भर में चर्चा हो पाये। स्क्रीनिंग के लिये हाल मुहैरूया कराने की पहल कहीं से होगी। और ये छोटा सा मंच धीरे धीरे एक बड़ा रुप लेगा। और परंपरा से अलग फिल्म कैसे बने और क्यों बने ये भी आपकी और हमारी शाम की चाय के दौरान चर्चा का विषय बनेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आप भी आयें और फिल्में देखें, सुनें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6n38xY0I/AAAAAAAAAls/SxmadYdrmew/s1600/cinema+3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 384px; height: 255px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6n38xY0I/AAAAAAAAAls/SxmadYdrmew/s320/cinema+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515918469074346818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप भी अगर चाहें तो हमारे इस प्रयास से जुड़ सकते हैं। कुछ नहीं बस फिल्में देखते हुए साथ में थोड़ी बातें सातें हो जांयेंगी। बहाने से अपन जान लेंगे कि हम आप फिल्मों के बारे में आंखिर क्या सोचते हैं। कभी हो पायेगा तो एक आध फिल्म ही बना लेंगे साथ मिलकर। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6s6yPTKI/AAAAAAAAAl0/EG4WLQ6haqI/s1600/cinema+4.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 384px; height: 255px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx6s6yPTKI/AAAAAAAAAl0/EG4WLQ6haqI/s320/cinema+4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515918555734822050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्क्रीनिंग पर इशिता तिवारी की रिपोर्ट पढ़ने के लिये&lt;a href="http://www.facebook.com/topic.php?uid=124856854204506&amp;topic=209"&gt; यहां&lt;/a&gt; क्लिक करें&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.facebook.com/?ref=logo#!/group.php?gid=124856854204506"&gt;सिनेमाथेक&lt;/a&gt; के बारे में और जानने और हमसे जुड़ने के लिये माउस पे एक छोटी सी थपकी दें &lt;a href="http://www.facebook.com/?ref=logo#!/group.php?gid=124856854204506&amp;v=info"&gt;यहां&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-2966649577411903011?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/2966649577411903011/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=2966649577411903011' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/2966649577411903011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/2966649577411903011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='&lt;span style=&quot;font-weight:bold;&quot;&gt;एक शुरुआत थोड़ी फिल्मी सी.....&lt;/span&gt;'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TIx60FCSetI/AAAAAAAAAl8/YEtRd1tX860/s72-c/cinema+5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-8954089486897349566</id><published>2010-07-17T10:23:00.000-07:00</published><updated>2011-05-04T01:31:56.030-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा पर'/><title type='text'>सिनेमा पर एक जरुरी लेख</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;अभी अभी इस लेख पर नजर पड़ी। प्रमोद जी के इस लेख को पढ़ लेने के बाद भारतीय सिनेमा के भीतर जो खालीपन है उसकी परतें खुलकर सामने आ जाती हैं। यहां एक खालीपन है  ये पता चलता है, क्यों है ये समझ आने लगता है। वो अपने इस लेख में भारत से बाहर की फिल्मों का ब्यौरा देते हैं, बल्कि यूं कहें कि उनको देखते हुए उपजे अपने भावों  &lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 15.8333px;"&gt;वो &lt;/span&gt;शाब्दिक अभिव्यक्ति देते हैं। हमारी फिल्में और उनकी फिल्में, क्यों अलग हैं इस पर बात करते हैं। एक प्रवाह में पूरा लेख पढेंगे तो कुछ देर सिनेमा क्यों बने इस पर जरुर सोचेंगे। रुचिकर लेख है, विचारोत्तेजक तो है ही, रुचि हो तो पढ़ें ना हो तो मन बनाकर देखें, पछताएंगे नहीं। &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;h3 class="post-title entry-title" style="font: normal normal bold 160%/normal Verdana, sans-serif; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #2d6e89;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; letter-spacing: -1px;"&gt;&lt;a href="http://cilema.blogspot.com/2010/07/blog-post.html"&gt;cinema-सिलेमा&lt;/a&gt; से साभार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;h3 class="post-title entry-title" style="color: #2d6e89; font: normal normal bold 160%/normal Verdana, sans-serif; letter-spacing: -1px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif; font-size: small;"&gt;&lt;a href="http://cilema.blogspot.com/2010/07/blog-post.html" style="color: #2d6e89;"&gt;सिनेमा का गल्‍प..&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;div class="post-header"&gt;&lt;div class="post-header-line-1"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="post-body entry-content"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;क्‍यों जाने भी दें यारो?..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;h3 style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;/h3&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD785-wPqDI/AAAAAAAAExw/Z4JpxdivZDA/s1600/Gunga_Jumna1_1.jpg" style="color: #2d6e89;"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5494106668466677810" src="http://3.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD785-wPqDI/AAAAAAAAExw/Z4JpxdivZDA/s200/Gunga_Jumna1_1.jpg" style="border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; cursor: pointer; float: left; height: 200px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; margin-right: 10px; margin-top: 0px; width: 200px;" /&gt;&lt;/a&gt;क्‍या होता है सिनेमा? &lt;/b&gt;पता नहीं क्‍या होता है. छुटपन में सुना करते बहुत सारे घर बरबाद कर देता है. बच्‍चों का मन तो बरबाद करता ही है. बच्‍चे थे जब बाबूजी अपनी लहीम-शहीम देह सामने फैलाकर, बंदूक की तरह तर्जनी तानकर हुंकारते, ‘जाओ देखने सिनेमा, बेल्‍ट से चाम उधेड़ देंगे!’ चाम उधड़वाने का बड़ा खौफ़ होता, मगर उससे भी ज्यादा मोह खुले आसमान के नीचे 16 एमएम के प्रोजेक्‍शन में साधना, बबीता और आशा पारेख को ईस्‍टमैनकलर में देख लेने का होता. उन्हीं को नहीं जॉय मुखर्जी और शम्‍मी कपूर के फ़ि‍ल्‍मों के राजेंदर नाथ को, मुकरी, सुंदर, धुमाल, मोहन चोटी को देखने का भी होता. शंकर जयकिशन और ओपी नय्यर के गानों के पीछे सब कुछ लुटा देने का होता. मोह. जबकि उस उम्र में पास लुटाने को कुछ था नहीं. इस उम्र में भी नहीं है. तो वही. पता नहीं क्‍या होता है सिनेमा कि जीवन में इतने धक्‍के खाने के बाद अब भी ‘आनन्‍द’ के राजेश खन्‍ना को देखकर मन भावुक होने लगता है, जबकि बहुत संभावना है स्‍वयं राजेश खन्‍ना भी अब खुद को देखकर भावुक न होते होंगे.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;सिनेमा सोचते ही ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0059246/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;गाइड&lt;/a&gt;’ के पीलापन लिए उस पोस्‍टर का ख़याल आता जिसमें देवानंद के बंधे हाथों वहीदा रहमान का सिर गिरा हुआ है, और वह प्‍यार की आपसी समझदारी का चरम लगती, इतना अतिंद्रीय कि मन डूबता सा लगे. डूबकर फिर धीमे गुनगुनाने लगे, &lt;i&gt;‘लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा, आके मेरे हाथों में, हाथ न ये छूटेगा, ओ मेरे जीवनसाथी, तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं..’&lt;/i&gt; कितने तो रंग होते सिनेमा के. इतने कि बचपन के हाथों पकड़ में न आते. ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0061842/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;जुएलथीफ़&lt;/a&gt;’ का वह सीन याद आता है? भरी महफ़ि‍ल में अशोक कुमार हल्‍ला मचाते कि झूठ बोलता है ये आदमी, नहीं बोल रहा तो सबके सामने दिखाए कि इसके पैर में छह उंगलियां नहीं हैं? फिर देवानंद दिखाने को धीमे-धीमे अपने जूते की तस्‍में खोलते, फिर मोज़े पर हाथ जाता, देवानंद का टेंस चेहरा दिखता, महफ़ि‍ल के लोगों के रियेक्‍शन शॉट्स, अशोक कुमार की तनी भौंहें, फिर कैमरा मोज़े पर, धीमे-धीमे नीचे को सरकता, आह, उस तनावबिंधे कसी कटिंग में लगता देवानंद के पैर में पता नहीं कितनी उंगलियां होंगी मगर हम देखनेवालों का हार्ट फेल ज़रूर हो जाएगा! जैसे ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Teesri_Kasam" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;तीसरी कसम&lt;/a&gt;’ के क्‍लाइमैक्‍स में वहीदा के रेल पर चढ़ने और हीरामन के उस मार्मिक क्षण ऐन मौके न पहुंच पाने के खौफ़ में कलेजा लपकता मुंह को आता. एक टीस छूटी रह जाती मन में और फिर कितने-कितने दिन मन के भीतर एक गांठ खोलती और बांधती रहती. फिर ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pakeezah" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;पाक़ीज़ा&lt;/a&gt;’ का वह दृश्‍य.. &lt;i&gt;कौन दृश्‍य.. आदमी कितने दृश्‍यों की बात करे&lt;/i&gt;&lt;i&gt;?&lt;/i&gt; और बात करने के बाद भी कह पाएगा जिसकी उसने सिनेमाघर के अंधेरों में उन क्षणों अनुभूति की? &lt;i&gt;ठाड़े रहियो ओ बांके यार&lt;/i&gt;, कहां, चैन से ठाड़े रहने की कोई जगह बची है इस दुनिया में?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;i&gt;चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो&lt;/i&gt;.. भाग जायें? छोड़ दें सबकुछ? &lt;i&gt;और उसके बाद&lt;/i&gt;&lt;i&gt;?&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;पता नहीं सिनेमा क्‍या होता है. सचमुच.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;मगर यह सब बहुत पहले के सिनेमा की बातें हैं. टीवी, डिजिटल प्‍लेटफॉर्म, इंटरनेट से पहले की.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;इटली के तवियानी भाइयों की 1977 की एक फ़ि‍ल्‍म है, ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0076517/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;पादरे पदरोने&lt;/a&gt;’, क्रूरता और अशिक्षा की रोटी पर बड़ा हो रहा एक गड़रिया बच्‍चा. दरअसल किशोर. सार्दिनीया के उजाड़ मैदानों में अपने भेड़ों के पीछे, कुछ उनकी तरह ही बदहवास और अचकचाया हुआ. रास्‍ता भूले दो मुसाफ़ि‍र उसी मैदान से गुजर रहे हैं. एक के हाथ में खड़खड़ाती साइकिल, दूसरा कंधे से लटकाये अपना अकॉर्डियन बजाता जा रहा है. उस बाजे के स्‍वर में, उस धुन में, कुछ ऐसी सम्‍मोहनी है कि गड़रिया किशोर तीरबींधा अपनी जगह जड़ हो जाता है. जड़ माने, जड़. कुछ पलों बाद चेतना लौटती है तो दूर सुन रहे बाजे के जादू में मंत्रमुग्‍ध पागलों की तरह फिर उसके पीछे भागा-भागा जाता है. अपने दर्शक को संगीत के जादू में, प्रत्‍यक्ष की उस इंटेंस अनुभूति में बांध लेने, बींध देने की यह अनूठी ताकत, यही है सिनेमा. जिन्‍होंने फ्रेंच फ़ि‍ल्‍मकार फ्रांसुआ त्रूफो की ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/400_blows" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;400 ब्‍लोज़&lt;/a&gt;’ देखी है उन्‍हें खूब याद होगा फ़ि‍ल्‍म के आखिर का वह लंबा सीक्‍वेंस जब बच्‍चा आंतुआं कैद से भागकर ज़्यां कोंस्‍तांतिन के कभी न भूलनेवाले संगीत की संगत में समुंदर की तरफ दौड़ता है, जीवन के सब तरह के कैदों को धता बताती मुक्ति का जो वह निर्बंध, मार्मिक, आह्लादकारी ऑर्केस्‍ट्रेशन है वह मन के पोर-पोर खोलकर उसे आत्‍मा के सब सारे उमंगों में रंग देता है! यह ताक़त है सिनेमा की. और हमेशा से रही है, चार्ली चैप्लिन के दिनों से, और जब तक लोग सिनेमाघरों के अंधेरे में बैठकर फ़ि‍ल्‍में देखते रहेंगे तब तक रहेगी.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;i&gt;मगर रहेगी?&lt;/i&gt;&lt;i&gt; क्‍यों रहेगी?&lt;/i&gt; ‘गाइड’ के राजू को रोजी़ की मोहब्‍बत तक न बचा सकी, फिर आज की रोज़ी तो आईपीएल के अपने स्‍टॉक की चिंता में रहती है, किसी राजू और राहुल के मोहब्‍बत को बचाने की नहीं, फिर किस मोहब्‍बत के आसरे सिनेमा अपने सपनों को संजोये रखने की ताक़त के सपने देखेगा? &lt;i&gt;देख पाएगा&lt;/i&gt;&lt;i&gt;?&lt;/i&gt; दिबाकर बनर्जी के ‘लव सैक्‍स और धोखा’ में कैसा भी मोहब्‍बत बचता है? माथे में ऐंठता गुरुदत्‍त के ‘प्‍यासा’ का पुराना गाना बजता है- &lt;i&gt;ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है&lt;/i&gt;&lt;i&gt;!&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;अच्‍छाई के दिन गए. जीवन में नहीं बचा तो फिर सिनेमा में क्‍या खाकर बचता. जो बचा है वह पैसा खाकर, या खाने के मोह में बचा है. बॉक्‍स ऑफिस के अच्‍छे दिनों की चिंता बची है, अच्‍छे दिनों की अच्‍छाई की कहां बची है, क्‍योंकि आदर्शों को तो बहुत पहले खाकर हजम कर लिया गया. और ऐसा नहीं है कि कुंदन शाह के ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jaane_Bhi_Do_Yaaron_(2007_film)" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;जाने भी दो यारो&lt;/a&gt;’ में पहली बार हुआ कि सतीश शाह केक की शक्‍ल में आदर्शों को खाते दीखे, तीसेक साल पहले गुरुदत्‍त ऑलरेडी उन आदर्शों को फुटबाल की तरह हवा में लात खाता देख गए थे. समझदार निर्माता और बेवकूफ़ दर्शक ही होता है जो मोहल्‍ले के लफाड़ी किसी मुन्‍ना भाई की झप्पियों से आश्‍वस्‍त होकर मुस्‍कराने लगता है, या चिरगिल्‍ले सरलीकरणों के इडियोटिक समाधानों का जोशीला राष्‍ट्रीय पर्व मनाने, &lt;i&gt;ऑल इज़ वेल&lt;/i&gt; को राष्‍ट्रीय गान बनाने, बजाने लगता है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;कहने का मतलब हम सभी जानते हैं &lt;i&gt;‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना’&lt;/i&gt; गाने का मतलब नहीं. जीवन से अच्‍छाई के गए दिन फिर लौट कर नहीं आते. सिनेमा के झूठ की शक्‍ल में भी नहीं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;झूठ कह रहा हूं. बुरे दिनों की कहानियां अच्‍छे अंत के नोट पर खत्‍म होती ही हैं. अच्‍छे दिन सिनेमा की झूठ की शक्‍ल में लौटते ही हैं. बार-बार लौटते हैं. न लौटें तो मुख्‍यधारा के हिंदी सिनेमा के लौटने की फिर कोई जगह न बचे. श्री 420 से शुरू होकर मिस्‍टर 840 तक हीरो का अच्‍छाई पर अंत लौटाये लिये लाना ही हिंदी फ़ि‍ल्‍म में समाज को संदेश है. &lt;i&gt;अच्‍छे रुमानी भले लोगों का इंटरवल तक किसी बुरे वक़्त के दलदल में उलझ जाना, मगर फिर अंत तक अच्‍छे कमल-दल की तरह कीचड़ से बाहर निकल आना &lt;/i&gt;के झूठे सपने बेचने की ही हिंदी सिनेमा खाता है. एक लातखाये मुल्‍क में दर्शकों के लिए भी सहूलियत की पुरानी आदत हो गई है. कि लातखाये जीवन में शाहरुख और आमिर के न्‍यूयॉर्क या मुंबई की जीत को वह बिलासपुर और वैशाली के अपने मनहारे जीवन पर सुपरइंपोज़ करके किसी खोखली खुशहाली के सपनों की उम्‍मीद में सोये रहें. &lt;i&gt;जीवन में कैसे अच्‍छा होगा&lt;/i&gt; से मुंह चुराते, &lt;i&gt;सिनेमा में अच्‍छा हो जाएगा&lt;/i&gt; को गुनगुनाते सिनेमा में जागे और जीवन में उनींदे रहें.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;जबकि सिनेमा, सिनेमा में सोया रहेगा. वह बुरे दिनों के इकहरे, सस्‍ते अंत के सपने खोज लाएगा, बुरे दिनों की समझदार पड़ताल में उतरने की कोशिश से बचेगा. उसके लिए &lt;i&gt;कितने रास्‍तों&lt;/i&gt; का आख्‍यान बुनना, कैसी भी जटिलता में पसरना, मुश्किल होगा. क्‍योंकि अपनी लोकोपकारी (पढ़ें पॉपुलिस्‍ट) प्रकृति में वह राज खोसला के ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0064241/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;दो रास्‍ते&lt;/a&gt;’ के बने-बनाये पिटे रास्‍ते पर चलना ज़्यादा प्रीफर करेगा, जिसमें लोग, लोग नहीं, कंस और कृष्‍ण के अतिवादी रंगत में होंगे. अच्‍छे (बलराज साहनी) और बुरे (प्रेम चोपड़ा) की दो धुरियां होंगी और नायक जो है, हमेशा अच्‍छे के पक्ष में खड़ा दीखेगा और फ़ि‍ल्‍म का अंत हमेशा &lt;i&gt;‘बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी’&lt;/i&gt; के खुशहाल ठुमकों के पीछे अपने को दीप्ति दे लेगी. मतलब राय के बांग्‍ला ‘अरेण्‍येर दिन रात्री’ से परिवेश व जीवन के अंतर्संबंधों की व्‍याख्‍या तो वह नहीं ही सीखेगा, गुरुदत्‍त के ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pyaasa" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;प्‍यासा&lt;/a&gt;’ की पारिवारिक और प्रेम (माला सिन्‍हा) की भावपूर्ण समीक्षा को भी अपनी अपनी समझ की परम्‍परा में जोड़ने से बचा ले जाएगा. ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0064935/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;सारा आकाश&lt;/a&gt;’ और ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0158092/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;पिया का घर&lt;/a&gt;’ की टीसभरी सफ़र पर निकलनेवाले बासु चटर्जी को चित चुराने और कुछ खट्टा कुछ मीठा बनानेवाले लाइट एंटरटेनर में बदल देगा. मतलब हिंदी सिनेमा में बुरे दिनों का एंटरटेनमेंट बना रहेगा, अच्‍छे दिनों को पहचानने की समझदारी की उसमें जगह नहीं बनेगी.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD78Mcg4f_I/AAAAAAAAExo/vWR0mbJR1ZE/s1600/3monkeys.jpg" style="color: #2d6e89;"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5494105886181326834" src="http://2.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD78Mcg4f_I/AAAAAAAAExo/vWR0mbJR1ZE/s200/3monkeys.jpg" style="border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; cursor: pointer; float: left; height: 200px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; margin-right: 10px; margin-top: 0px; width: 140px;" /&gt;&lt;/a&gt;एक कैमरामैन मित्र मुझसे कहता है इतने वर्षों बाद भी हम वही रामायण वाली कहानी ही कह रहे हैं. रावण को धूल चटाकर रामबाबू सीताबाई के संग अयोध्‍या लौटे टाइप. मैं खीझकर कहता हूं कुछ महाभारत वाला तत्‍व भी होगा. मित्र कहता है होगा ही, लेकिन महाभारत की जटिलता हम सीधे मन के टेढ़ों लोगों के लिए अपच पैदा करती है, तो वहां से भी उठाई चीज़ भी भाई लोग रामायण के सांचे में ढालकर ही सुनायेंगे!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;एक बड़ा तबका है, बुद्धिभरा तबका भी है, जो हिंदी सिनेमा के हमारी अति विशिष्‍ट भारतीय शैली के कसीदे गाता है. माने &lt;i&gt;हमें दुनिया से कुछ सीखने की ज़रूरत नहीं, हम दुनिया को सीखा देंगे&lt;/i&gt; वाला गाना. पिटे हुए मुल्‍कों में ऐसा अहंकारी राग गानेवाले हमेशा ऐंठे हुए कुछ कैरिकेचर टाइप होते हैं. वे यह तक नहीं मानते कि पिटे हुए हैं. बिना बात रहते-रहते &lt;i&gt;हम तब से लगे हैं जब दुनिया कहीं नहीं थी&lt;/i&gt; जैसा डायलॉग बोलने लगते हैं. दम भर सांस लेकर फिर &lt;i&gt;हमीं ने दुनिया को सबसे पहले चेतना, विमान, म्‍यूजिकल और सपना देखने के अरमान दिये&lt;/i&gt;, फिर &lt;i&gt;आप भूलो मत&lt;/i&gt;&lt;i&gt;!&lt;/i&gt; टाइप चुनौती. ऐसे अति विशिष्‍टी अहम को फिर कहां कुछ सीखने की ज़रूरत है? भले सिनेमा में अगले हफ़्ते ‘मस्‍ती: पार्ट टू’ और ‘गोलमाल: पार्ट थ्री’ चढ़ रही हो!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;सही भी है दुनिया हमसे सीखे, इरान ने आखिर हिंदी फ़ि‍ल्‍में देख-देखकर ही अपने यहां सिनेमा की नींव डाली, और नब्‍बे के बाद से घूम-घूमकर दुनिया भर के फ़ि‍ल्‍म समारोहों में इनाम पर इनाम बटोर रही है, तो इरान को फ़ि‍ल्‍म बनाना हमने सीखाया नहीं? अच्‍छा है इनाम बटोर रही है लेकिन हम भी तो पैसा बटोर रहे हैं. और ईनाम भी बटोरा है. डैनी बॉयल का बटोरना और हमारा एक ही बात है. आशुकृपा और कृपादृष्टि तो अंतत: हमारी ही है. जो लंबी यात्रायें की हैं हिंदी सिनेमा ने वह तुम्‍हारा मलिन मन कहां से देखेगा? कितना बटोरा है इसका कोई अंदाज़ है? शक्ति सामंत और मनमोहन देसाई के ज़माने में रुपल्लियों में बटोरते थे, अब करण जौहर और चोपड़ाओं के दौर में डॉलर और यूरो में बटोर रहे हैं. समूची दुनिया का भट्टा बैठ जाएगा मगर आप सुन लो, हमारा बॉलीवुड फिर भी बैठेगा नहीं, राज करेगा, &lt;i&gt;यू गेट ईट&lt;/i&gt;&lt;i&gt;?&lt;/i&gt;&lt;i&gt; वी आर लाइक दिस ऑनली!&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;पश्चिम में भी कुछ तिलकुट इंटैलेक्‍चुअल टाइप हैं, पीछे कोरस में स्‍माइल देकर गाते हैं, &lt;i&gt;नथिंग गोन्‍ना चेंज द वर्ल्‍ड, दे आर लाइक दिस ऑनली&lt;/i&gt;&lt;i&gt;!&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;ये मैं कहां किन ओझाइयों, ओछाइयों में उलझता, गिरता गया हूं? सिनेमा को इतने ओछे स्‍तर तक उतारते लाने की कोई वज़ह है? जो सलीका और तमीज़ सिनेमा से पाया, उसे इस बेमतलब, पैसातलब नज़रिये के सियाह धुंओं में बिसरा दें? इसी दिन के लिए देखा था व्‍ही शांताराम की ‘माणुस’ और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mehboob_Khan" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;महबूब ख़ान&lt;/a&gt; की ‘रोटी’, ‘अंदाज़’, ‘अमर’ ? केदार शर्मा की ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0141441/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;जोगन&lt;/a&gt;’? उलझी दुनिया को पढ़ने की वह सुलझी नज़र भूल गया? यही दिन देखने के लिए दिलीप साहब ने ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0054910/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;गंगा जमुना&lt;/a&gt;’ लिखी, पैसे लगाये, नितिन बाबू ने जान झोंककर फ़ि‍ल्‍म खड़ी की? ‘बसंत क्‍या कहेगा’ की कहानियां लिखनेवाले बलराज साहनी ने सलीम मिर्जा़ का सबकुछ एक लंबी सांस खींचकर बरदाश्‍त करते जाने वाला ज़ि‍न्‍दा किरदार निभाया (‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Garam_Hawa" style="color: #2d6e89;"&gt;गर्म हवा&lt;/a&gt;’)?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;जीवन में प्रेम हमेशा ज़रूरी नहीं मिले, एक शादी मिल जाती है और उसे निभाना पड़ता है. खुद मैं कितने वर्षों निभाता रहा, चार साल की उम्र रही होगी जब से देखता रहा हिंदी फ़ि‍ल्‍में. ‘हरे कांच की चूड़ि‍यां’, ‘काजल’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘बीस साल बाद’, ‘प्‍यार का मौसम’, ‘सावन की घटा’, ‘जब प्‍यार किसी से होता है’, ‘दस लाख’, ‘साथी’, ‘शागिर्द’, ‘एक सपेरा एक लुटेरा’, ‘तुम हसीं मैं जवां’. कुमकुम की ‘गंगा की लहरें’ और आईएस जौहर की फ़ि‍ल्‍में और राजेश खन्ना का ‘बंडलबाज’ तक देखी. छुटपन के आवारा भटकन के जो भी हाथ चढ़ता, सब बराबर के श्रद्धाभाव से देखता. परदे पर हरकत करती, घूमती तस्‍वीरों को फटी आंखों तकने में कोई अपूर्व रोमांच, कोई जादुई अनुभूति मिलती होगी जभी स्‍कूली पढ़ाई के दौरान एक दौर था पड़ोस की तमिल सोसायटी के माहवारी सोशल ड्रामा और कॉमेडी फ़ि‍ल्‍मों की स्क्रिनिंग में भी भागा पहुंच जाता. मतलब तमिल का बिना एक शब्‍द समझे नागेश, जेमिनी, शिवाजी गणेशन की करीब सौ फ़ि‍ल्‍में तो उस बचपन में ज़रूर ही देखी होंगी. कहां जानता था कुछ वर्षों बाद विश्‍वविद्यालय की फ़ि‍ल्‍म सोसायटी की चार सालों की संगत में समांतर सिनेमा की भी सीमायें और बोझिलता गिनाने लगूंगा? हॉलीवुड के जॉन फोर्ड और इलिया कज़ान और फ्रांकेनहाइमर ही नहीं, यूरोप से बाहर, अर्जेंटिना, जापान, कोरिया कहां-कहां तक नज़रें फैलाने लगूंगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;जीवन में जिस तरह के लोगों की संगत बनती है कोई वज़ह होती है कि क्‍यों बनती है. इनमें मन रमता है तो वह दूसरा क्‍यों फूटी आंखों नहीं जमता. मुमताज़ को, बबीता और साधना को चाहती होगी पूरी एक दुनिया, लेकिन कोई एक दीवाना मन किसी एक रेहाना सुल्‍तान में जाकर अटक जाता होगा. करनेवाले संजय, शशी कपूर की चिकनाइयों का ज़ि‍क्र करते होंगे, न करनेवाला शेख़ मुख़्तार को अच्‍छा बताता होगा. राजेंदर और प्रदीप कुमार की दुनिया में जयंत, मोतीलाल, बलराज साहनी का होना गिनाता होगा. कोई वज़ह होती है दुनिया का हर एक्‍टर ऑस्‍कर पाने में अपने पूरे जीवन की कमाई, काम की गिनाई देखता है, हमारी हिंदी इंडस्‍ट्री के भी ऐसे अमीर हैं जो ऑस्‍कर की हल्‍की गुहार पर सब काम छोड़े भागे-भागे हॉलीवुड जाते हैं, मगर फिर कोई मारलन ब्रांडो भी होता है जो ऑस्‍कर पुरस्‍कारों को आलू का बोरा बताता है, गोद में आई को बेपरवाही से ठुकराता है. कोई वज़ह होती है लोग जो होते हैं वैसा क्‍यों होते हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;कोई वज़ह होती होगी अपने यहां हीरोगिरी की हवा छोड़ने वाले ढेरों एक्‍टर मिलते हैं, कोई जॉर्ज क्‍लूनी या शान पेन नहीं होता जो सिर्फ़ अपने स्‍टारडम की ही नहीं खाता, समय और अपने समाज के बारे में साफ़ नज़रिया भी बनाता हो. इव्‍स मोंतों जैसी कोई शख्‍सीयत नहीं मिलती जिसके चेहरे की हर लकीर, हर भाव बताते कि बंदे ने सख्त, एक समूची ज़िंदगी जी है. दुनिया में डिज़ाइनर कपड़ा पहनने आए थे और टीवी के लिए सजीली मुस्‍की मुस्कराने की अदाकारियां मिलती हैं, परदा अभिनय की भव्‍यता और मन जीवन की उस समझ के आगे नत हो जाए, एक्‍टिंग की जेरार् देपारर्द्यू वाली वह ऊंचाई नहीं मिलती. मारचेल्‍लो मास्‍त्रोयान्‍नी की तरह मन लुभाना ढेरों जानते हैं, मगर विस्‍कोंती की ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0050782/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;सफ़ेद रातें&lt;/a&gt;’ और फ़ेल्‍लीनी की ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Eight_and_a_half" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;आठ और आधे&lt;/a&gt;’ की महीन वल्‍नेरिबिलिटी में रुपहले परदे को जीवन से भर सकें का ककहरा अभी तलक नहीं पहचानते. बहुत सारी लड़कियां होंगी कमाल का नाचती हैं, लेकिन जुलियेट बिनोश की तरह कुर्सी पर बैठे-बैठे संवाद बोलना नहीं जानतीं, एडिथ पियाफ़ को परदे पर मारियों कोतियार की तरह भरपूर आत्‍मा से गा सकें (‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0450188/" style="color: #2d6e89;"&gt;ल वियों रोज़&lt;/a&gt;’), अभिनय और जीवन के उस विहंगम संसार को दूर-दूर तक नहीं पहचानतीं. कोई तो वज़ह होती है कि सबकुछ वैसा क्‍यों होता है जैसा वह होता है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;अपने यहां एक्‍टर चार पैसे कमाकर एक दुबई में और दूसरा अमरीका में फ्लैट खरीदने के पैसे जोड़ता है, दूसरी ओर चिरगिल्‍ली भूमिकाओं की ज़रा सी कमाई को जॉन कसेवेट्स ऐसी अज़ीज़ फ़ि‍ल्‍मों को बनाने, बुनने में झोंकता है जो फ़ि‍ल्‍म नहीं, लगता है हमसे जीवन की अंतरतम, अंतरंग गुफ़्तगू कर रही हों. तुर्की का स्‍टार अभिनेता यीलमाज़ गुने अपने विचारों के लिए जेल जाता है, जेल में रहकर फ़ि‍ल्‍में बनाता है, हमारे यहां स्‍टार होते हैं, राजनीति में वह भी जाते हैं, कभी दूर तो कभी अमर सिंह को पास बुलाते हैं. कोई वज़ह होती होगी कि अपने यहां फ़ि‍ल्‍मों से जुड़े लोगों को हम जो इज़्ज़त देते हैं, क्‍यों देते हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;रोज़ इतने डायरेक्‍टर पैदा होते रहते हैं, &lt;b&gt;एक सच्‍चा दिबाकर बनर्जी पैदा होता है&lt;/b&gt;, बाकी के कच्‍चे दरज़ी जाने क्‍या सिलाई सीलते रहते हैं, &lt;i&gt;क्‍या वज़ह होती है&lt;/i&gt;&lt;i&gt;?&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;आख़ि‍र क्‍या वज़ह है हिंदी सिनेमा के अरमान इतने फिसड्डी, इतने दो कौड़ी के हैं? ऐसा क्‍यों होता है कि ‘रंग दे बसंती’ के कलरफुल फ्लाइट के ठीक अगले कदम वह ‘दिल्‍ली 6’ के दिशाहारे मैदान में जाकर ढेर हो जाता है? सिनेमा की अपनी आंतरिक है या यह हिंदी संसार के सपना देख पाने की कूवत के भयावह दलिद्दर की दास्‍तान है? क्‍योंकि ऐसे ही नहीं होगा कि पूरी आधी सदी में एक ‘प‍रती परिकथा’, एक ‘आधा गांव’ के साहित्‍य और आधे ‘राग दरबारी’ के एंटरटेनमेंट के दम पर एक पूरा समाज अपनी ठकुर सुहाती गाता, ऐंठ के गुमान में इतराता होगा? उसकी अपनी ज़बान में अंतर्राष्‍ट्रीय तो क्‍या राष्‍ट्रीय ख्‍याति का भी कोई अर्थशास्‍त्री, इतिहासकार, समाजशास्‍त्री क्‍यों नहीं की सोचता वह कभी नहीं लजाता? इसलिए कि लोगों को वही सरकार मिलती है जितना पाने के वह काबिल होते हैं? हिंदी का साहित्‍यकार भी हमें उतना ही साहित्‍य देता है जितने की राजा राममोहन राय लाइब्रेरी खरीदी कर सके? सौ लोग लेखक को लेखक मानकर पहचानने लगें, साहित्‍य अकादमी रचना-पाठ के लिए उसे बुला सके, शिमला या बीकानेर की कोई कृशकाय कन्‍या एक भटके, आह्लादकारी क्षणों में लेखक की तारीफ़ में तीन पत्र लिख मारे कि फिर लेखक उसे पटा सके, आगे का अपना चिरकुट जीवन खुशी-खुशी चला सके?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;चंद तिलकुट पुरस्‍कार और इससे ज़्यादा हिंदी का लेखक यूं भी कहां कुछ चा‍हता है? प्रूस्‍त और बोदेलेयर बनने के तो उसके अरमान नहीं ही होते, वॉल्‍टर बेन्‍यामिन बनने का तो वह अपने दु:स्‍वप्‍न में भी नहीं सोचता, फिर हिंदी सिनेमा ही ऐसी क्‍यों बौड़म हो कि अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारे?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;साहित्‍य को तो साहित्‍यकार के यार लोग ही हैं जो अपने सिर लिए रहते हैं, हिंदी सिनेमा की दिलदारी का तो व्‍यापक विस्‍तार भी है, देश में ही नहीं, समुंदरों पार भी है. बिना कुछ किये, दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे का हलकान गा-गाकर ही वह सफल बनी हुई है, तो ख्‍वामख्‍वाह अपनी सफलता का फॉर्मूला वह क्‍यों बिगाड़े? चौदह सौ लोगों के बीच के हिंदी साहित्‍य तक ने जब रिस्‍क नहीं लिया तो चालीस करोड़ों के बीच घूमनेवाला हिंदी सिनेमा किस सामाजिकता की गरज में अपना बना-बनाया धंधा खराब करे? &lt;i&gt;कोई तुक है&lt;/i&gt;&lt;i&gt;?&lt;/i&gt; नहीं है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;सवाल पूछनेवाले अलबत्‍ता पूछ सकते हैं इतना किस बात का रोना? क्‍या ऐसा नहीं है कि हाल के वर्षों में हिंदी सिनेमा ने अनुराग कश्‍यप और विशाल भारद्वाज जैसे फ़ि‍ल्‍मकार दिए हैं? सही है अनुराग की फ़ि‍ल्‍में हताशाओं व जुगुप्‍साओं के मेलों में भटकती फिरती हैं मगर उतना ही यह भी सही है कि ‘देव डी’ का अभय देओल इकहरा काठ का पुतला नहीं लगता, कमरे की अराजकता के बीच लाल अंडरवेयर में हम उसे सिर खुजाता देखते हैं, निस्‍संग, जीवन की नाउम्‍मीदी से वह किस कदर पका हुआ है के भाव हमेशा उसकी उपस्थिति को रेसोनेट करते हैं. वैसे ही उतना यह भी सही है कि विशाल बंबइया स्‍टारों के फेर में भले पड़े रहें, मिज़ों सेन सजाना जानते हैं, कहानी अपने को ठीक से भले न कह पाये, फ़ि‍ल्‍म की पैकेजिंग की कला है उनके पास, असमंजस के धुएं में फ़ि‍ल्‍म गहरे अर्थ दे रहा है की गलतफ़हमी भी बनी रहती है, मगर इससे ज़्यादा फिर कोई एक हिंदी फ़ि‍ल्‍मकार से फिर क्‍या चाहता है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;बहुत पहले की बात है, कुछ वर्षों के लिए मुझे इटली में रहने का सुअवसर मिला था. रफ़्ता-रफ़्ता इतालवी ज़बान पकड़ में आ गई थी, मगर लोग तब भी पकड़ में आने से रह जाते. समाज जो नज़रों के आगे रोज़ दीखता, वह समझ नहीं आता, गो &lt;a href="http://archive.sensesofcinema.com/contents/directors/02/fellini.html" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;फ़ेल्‍लीनी&lt;/a&gt; साहब की फ़ि‍ल्‍में खूब समझ आतीं, उनके ही रास्‍ते फिर समाज को समझने और उससे स्‍नेहिल संबंध बनाने की कुंजी भी मिलती रहती. अपने हिंदी सिनेमा की संगत में जबकि मामला ठीक इसके उल्‍टा होता है. देश और लोग बाज मर्तबा, लगता है बहुत सारे स्‍तरों पर, परतों में समझ आते हैं, लेकिन बचपन की पुरानी दीवानगी के बावजूद अब भी हिंदी फ़ि‍ल्‍म में उतरते ही लगता है यहां जाने किस दुनिया की बात हो रही है. और जिस भी दुनिया की हो रही है उसका हमारे रोज़-बरोज़ की वास्‍तविकता से कोई संबंध नहीं. समय और समाज को समझने की कुंजी तो वह किसी सूरत में नहीं बनती. यहीं यह सवाल भी निकलता है कि फ़ि‍ल्‍मों से, इन जनरल, हमारी अपेक्षाएं क्‍या हैं? जीवन से, सिनेमा के रागात्‍मक, कलात्‍मक अनुभव से हम उम्‍मीदें क्‍या पालते हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;सिनेमा यथार्थ नहीं. फ़ेल्‍लीनी की फ़ि‍ल्‍में यथार्थ नहीं, सिनेमा के अंधेरों में हमारे अवचेतन से खेलता वह कोई सपनीला जादू है जिसके भीतर उतरकर, कुछ घंटों के लिए हम अपने यथार्थ से एक नए तरह के संवाद में जाते हैं, और उस यथार्थ को समृद्ध करने की एक नयी ताक़त लिए सिनेमाघर से बाहर आते हैं, &lt;i&gt;ऐसा कुछ&lt;/i&gt;&lt;i&gt;?&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;स्‍पेन के होसे लुईस गेरीन की 2007 की अपेक्षाकृत गुमनाम सी फ़ि‍ल्‍म है, ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0809425/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;इन द सिटी ऑफ़ सिल्‍वी&lt;/a&gt;’, चौरासी मिनट की फ़ि‍ल्‍म में कुल जमा पांच-सात मिनट के संवाद होंगे, बाकी जो है नौजवान पर्यटक नायक की नज़रों- कुछ वर्षों पहले घटित किसी मीठी मुलाक़ात की महीन याद की दुबारा ‘खोज’ के बहाने अजाने शहर में भटकने, ‘देखने’ का अंतरंग भावलोक है. कैमरे की आंख से जगह विशेष में लोगों का यह उनकी आन्‍तरिकता में ‘दिखना’; कामनाओं, अनुभूति, जुगुप्‍साओं की यह दबी-छुपी ताकझांक खास सिनेमाई रसानुभव है और वह किसी अन्‍य कला-माध्‍यम से सब्‍स्‍टि‍ट्यूट नहीं हो सकता था.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;अमरीकी निर्देशक रॉबर्ट ऑल्‍टमैन की एक म्‍यूज़ि‍कल है, 1975 में बनी थी, ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Nashville_(film)" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;नैशविल&lt;/a&gt;’. राष्‍ट्रपति के चुनाव अभियान वाला मौसम है, नैशविल के छोटे शहर में राजनीतिक गहमा-गहमी के दिन हैं. कंट्री और गॉस्‍पल संगीत से जुड़े लोगों की दुनिया में ज़रा समय को घूमती (159 मिनट की अवधि) इस फ़ि‍ल्‍म में तकरीबन 24 मुख्‍य किरदार हैं, चूंकि गवैयों की दुनिया है सो घंटे भर का वक़्र्त उनके परफ़ॉरमेंस व गाने का है, जाने कितनी सारी स्‍टोरीलाइन है. ऑवरलैपिंग संवादों का साउंडट्रैक है और फ़ि‍ल्‍म इतने सारे स्‍तरों पर चलती है कि कभी भरम होता है आप फ़ि‍ल्‍म नहीं देख रहे, बाल्‍जाक का उपन्‍यास पढ़ रहे हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;अर्थशून्‍य जीवन में प्रेम चला आये तो वह ऐसी ही सघन नाटकीय अपेक्षाओं की लड़ी बुनने लगता है. फिर सरल सिनेमा के देश में तरल वाचन की प्रत्‍याशाएं जीवन को खामख्‍वाह मुश्किल बनाने लगती हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD77-PhtTjI/AAAAAAAAExg/1hi_JbDnGT8/s1600/the+secret+of+the+grain.jpg" style="color: #2d6e89;"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5494105642176958002" src="http://2.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD77-PhtTjI/AAAAAAAAExg/1hi_JbDnGT8/s200/the+secret+of+the+grain.jpg" style="border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; cursor: pointer; float: left; height: 200px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; margin-right: 10px; margin-top: 0px; width: 146px;" /&gt;&lt;/a&gt;सवाल फिर वही है सिनेमा से हमारी अपेक्षाएं क्‍या हैं? क्‍या चाहते हैं? स्‍वयं सिनेमा हमसे क्‍या चाहता है? महज़ क्‍या ‘कूल’ हैं की एक बार और आश्‍वस्ति चाहते हैं? या ज़रा और उदार, महात्‍वाकांक्षी होकर इच्‍छाओं, कामनाओं के एक सघन ऐंद्रिक अनुभव से गुज़रना भर चाहते हैं? और सिनेमा? अपने अंधेरों-उजालों के जादू में बांधकर जीवन जैसा ही कुछ दीखते किस यथार्थ के पीछे अवचेतन की कैसी यात्राओं पर हमें वह लिए जाना चाहती है? सिनेमाघर से बाहर के जटिल यथार्थ को समझने में वह किसी भी तरह से हमारी मदद करती है? लेकिन हम &lt;i&gt;‘प्‍यार बांटते चलो’&lt;/i&gt; गाना चाहते हैं, किसने कहा जटिल यथार्थ का बाजा सुनना चाहते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;1974 की जॉन कैसेवेट्स की अमरीकी फ़ि‍ल्‍म है, ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/A_Woman_Under_the_Influence" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;ए वुमन अंडर द इन्‍फ्लुयेंस&lt;/a&gt;’. बिना किसी भावुकता के प्रेम और परिवार की ही अंतर्कथा ही है, और बहुत धीमे-धीमे बहुत गहरे धंसती चलती है. बहुत सारे तारे हैं और सब ज़मीन पर ही गिरे हैं मगर फ़ि‍ल्‍मकार उसका रंगीन पोस्‍टर सजाने की ज़रूरत नहीं महसूस करता, जीवन की ज़रा और मार्मिक समझदारी हम आपस में शेयर कर सकें, जैसे कभी कोई मार्मिक नाट्य-मंचन कर ले जाता है, फ़ि‍ल्‍म वैसी ही कुछ हमसे अपेक्षा करती है, और प्रेम व परिवार की अपनी समझ में हम थोड़ा और अमीर होकर फ़ि‍ल्‍म से बाहर आते हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;कुछ वैसी ही अर्जेंटिना के पाब्‍लो त्रापेरो की फ़ि‍ल्‍म है, ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0359254/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;फमिलिया रोदांते&lt;/a&gt;’ (रोलिंग फैमिली, 2004), सुदूर देहात में किसी बिसराये रिश्‍तेदार के यहां शादी का न्‍यौता है जहां पहुंचने के लिए एक बुढ़ि‍या अपने सब बेटी, बेटा इकट्ठा करती है, और एक खड़खड़ि‍या खस्‍ताहाल वैन में पूरा कुनबा सुदूर देहात के सफ़र पर निकलता है. हमारे लिए वह सफ़र अपने समय और पारिवारी बुनावट को समझने की मार्मिक कथा बनती है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;अर्जेंटिना की ही एक अन्‍य महिला निर्देशक, लुक्रेसिया मारतेल की 2001 की फ़ि‍ल्‍म है, ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0240419/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;ला सियेनागा&lt;/a&gt;’, या जापान के मिवा निशिकावा की 2009 की फ़ि‍ल्‍म, ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt1257557/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;डियर डॉक्‍टर&lt;/a&gt;’, जो ऊपरी तौर पर नितांत साधारण सी दिखती- परिवार, परिवेश और उस समाज की कथा भर लगे, मगर फिर बड़े धीरज और करीने से हमारे आगे उसके भीतरी गांठों को एक-एक करके खोलती चले. आपस में बांटी गई संगत की यह समझ भी सिनेमा की अपनी विशिष्‍ट ताक़त है, खेद कि हिंदी सिनेमा के पास नहीं है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;पांचवे दशक के आखिर तक (और कुछ-कुछ छठवें दशक के शुरुआती दौर में भी खिंचे जाते हुए) रही थी हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की अपनी एक सामाजिकता, सौद्देश्‍यता. उसके बाद लगता है, शनै-शनै देश ने जैसे जान लिया कि आज़ादी का ठीक मतलब जो भी है, जीवन की खुशहाली के लिए बहुत नहीं है, और आदर्शवादी सपनों की जैसे-जैसे हवा निकलती गई, वैसे-वैसे हिंदी सिनेमा कैमरे से अपने परिवेश की पड़ताल करने की बजाय शंकर जयकिशन व ओपी नय्यर के संगीत पर सवार पहाड़ोन्‍मुखी होता गया. नितिन बोस, केदार शर्मा, व्‍ही शांताराम, बाबू महबूब ख़ान, बिमल रॉय पीछे छूटते गए. शम्‍मी कपूर, जॉय मुखर्जी, विश्‍वजीत का पहाड़ी वादियों में जीप पर घूमना और स्‍की पर फिसलना चालू हो गया. पीछे-पीछे बाबू राजेशजी खन्‍ना आए तो उन्‍हें &lt;i&gt;‘मेरे सपनों की रानी’&lt;/i&gt; गवाने के लिए शक्ति‍ सामंत श्रीनगर की बजाय दार्जिलिंग लिवाये गए. गनीमत है अमिताभ तक ड्रामा फिर पहाड़ से हटकर वापस बंबई और नज़दीक के मैदानों में लौटा, लेकिन वह ज़मीन पर लौटी है के नाटकीय सलीम-जावेद वाले डायलॉगबाजी में भले लौटी, कायदे से ज़मीन पर कहां लौटती? सुपरहीरो और सुपर ड्रामा की दुनिया थी, अंतत: ‘मेरे अंगने में तुम्‍हारा क्‍या काम है’ ही गाती, समाज को अपने साथ कहां, किधर लेकर जाती? कहीं नहीं गई. नब्‍बे के दशक में, &lt;i&gt;‘हम आपके हैं कौन’&lt;/i&gt; के बाद से बड़ी तसल्‍ली से शादी के वीडियो छापने लगी. दुनिया आंख फाड़-फाड़ कर देखती रही हिंदुस्‍तानी शादियां क्‍या अनूठी चीज़ हैं, हिंदुस्‍तानी परिवार कैसी लाजवाब संस्‍था है. फिर जैसे इतना प्रहसन काफ़ी न हो, आगे शादियां और अनूठे पारिवारिक प्रसंग भी सीधे लंदन और न्‍यूयॉर्क में ट्रांसपोर्ट कर दिये गए. दलिद्दर देश के कंगले रुपल्‍ली से हाथ झाड़कर सीधे डॉलर और स्‍टर्लिंग से हाथ जोड़ लिया गया.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;भावुकता के उद्रेक में मैंने अतिशयता की थोड़ी ज़्यादा भोंडी तस्‍वीर खींच दी होगी, मगर कमोबेश आजा़दी के बाद के पांच दशक हिंदी सिनेमा जिन रास्‍तों चली कुछ इसी तरह का उसका स्‍थूल वनलाइनर समअप है. अब इस समअप में समाज को देखने की सचमुच कहां गुंजाइश निकलती है? काफी नहीं है कि अभी भी बीच-बीच में ऐसी फ़ि‍ल्‍में बन जा रही हैं जिसकी शूटिंग जोहानसबर्ग और ज्‍युरिख़ की बजाय हिंदुस्‍तान में ही कहीं हो जाती है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;सच्‍चाई है हिंदी सिनेमा का दरअसल अपना कोई समाज है नहीं. पंजाबी, राजस्‍थानी, बंबई सबकी मिलाजुली पॉटपूरी है, कोई एक ऐसा भूगोल नहीं जिसे केंद्र में करके कहानी घूम रही है. अब चूंकि जब केंद्र ही नहीं है तो फ़ि‍ल्‍म फ़ोकस कहां होगी? बेचारी नहीं हो पाती और यहां और उसके बाद वहां फुदकती रहती है. बीच में जब असमंजस बढ़ जाता है और बात भूल जाती है कि फ़ि‍ल्‍म की कहानी दरअसल थी किसके बारे में तो एक गाना और कॉ‍मेडी का सीन डल जाता है. उसके बाद भी बना रहे, असमंजस, तो पूरी यूनिट घबराकर विदेश चली जाती है, कि शायद विदेशी लोकेल फ़ि‍ल्‍म में अर्थवत्‍ता फूंक सकें!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD77kxQW9aI/AAAAAAAAExY/NEnU36FuWx8/s1600/Darko_Bajic_balkanska.jpg" style="color: #2d6e89;"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5494105204554397090" src="http://2.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD77kxQW9aI/AAAAAAAAExY/NEnU36FuWx8/s200/Darko_Bajic_balkanska.jpg" style="border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; cursor: pointer; float: left; height: 200px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; margin-right: 10px; margin-top: 0px; width: 136px;" /&gt;&lt;/a&gt;कोई वज़ह होगी, मगर जो भी है सोचनेवालों को सोचना चाहिए कि ऐसा क्‍यों है कि अमरीकी फ़ि‍ल्‍मों की नकल से थके हुए हमारी हिंदी सिनेमा के दरजी नयेपन की गरज में, फिर चोरी के लिए फ्रांस तो कभी हॉंगकांग और ताइवान की तरफ़ नज़र दौड़ाते हैं, क्‍यों दौड़ाते हैं? इरान, कोरिया, चीन ही नहीं, बांग्‍लादेश और वियतनाम तक अपने परिवेश की कथा बुनकर मार्मिक फ़ि‍ल्‍में खड़ी कर लेते हैं, बस यह हिंदी सिनेमा का ही निर्देशक है जो लगातार अपनी जी हुई सच्‍चाइयों से मुंह चुराता, दिल्‍ली का होकर गुजरात और मुंबई का बंगाली बच्‍चा फिर राजस्‍थान अपनी शूटिंग सजाने जाता है. ऐसा क्‍यों है कि लोग वही कहानी कहते जो जीवन में उन्‍होंने जीया है? इसलिए कि उनके पास ज़िंदगी है लेकिन उसके जीये की कहानी नहीं? मम्‍मीजी की गोद में वे अमिताभ और रेखा का नाचना और श्रीदेवी का फुदकना देखते हुए बड़े हुए? फ़ि‍ल्‍म बनाना चाहते हैं और बनाते रहेंगे इसलिए नहीं कि कहानियां कहने को हैं, बल्कि इसलिए कि ए‍क पिटे हुए समाज में ऐश और स्‍टारडम के नशे में जीने की वही एक इकलौती जगह दिखती है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;हिंदी का हर निर्देशक दो फ़ि‍ल्‍में बनाने के बाद तीसरी बड़े स्‍टार के साथ बनाना चाहता है, क्‍यों बनाना चाहता है, भई? इसलिए कि फ़ि‍ल्‍म को एक्‍सपोज़र मिल जाता है, बाज़ार बनाने में आसानी हो जाती है. तो वही बात है. बाद में बाज़ार और निर्देशक के निजी जीवन की बेहतरी ही बनती रहती है, फ़ि‍ल्‍म की बेहतरी का सवाल पीछे कहीं पृष्‍ठभूमि में छूट जाता है. दिक़्क़त वही है, अपने यहां लोगों के मन में चिंता फ़ि‍ल्‍मों की बेहतरी से ज़्यादा जीवन को सेट कर लेने की है. जैसे हिंदी साहित्‍यकार की चिंता अपने साहित्‍य से ज़्यादा साहित्‍य अकादमी से अपने संबंधों की है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;जून्‍हो बॉंग की 2003 की एक कोरियन फ़ि‍ल्‍म है ‘&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0353969/" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;मेमरीज़ ऑफ़ मर्डर&lt;/a&gt;’. जो दर्शक रामगोपाल वर्मा की ‘सत्‍या’, ‘कंपनी’ और ‘सरकार’ देखकर दांत में हाथ डालते रहे हैं, उन्‍हें ज़रूर देखनी चाहिए. एक कस्‍बाई शहर में एक के बाद एक हत्‍यायें हुई हैं और स्‍थानीय पुलिस हत्‍यारे की पहचान में माथा फोड़ रही है. मगर उसमें कोई हिरोइकपना या नाटकीयता नहीं. पुलिस की नौकरी में लगे किरदारों की अपने जीवन के टंटे हैं, केस की जटिलता में थकते अधिकारी एक कमज़ोर, अर्द्ध-विक्षिप्‍त को फांसकर उसे हत्‍यारे की तरह पेश करने की कोशिश करते हैं, मगर मामला फिर और उलझता जाता है. राजधानी सेओल से मामले की तफ़तीश को आया अपेक्षाकृत ज़्यादा शिक्षित एक दूसरा अफ़सर अचानक समझता है उसकी खोज रंग लाई, असल हत्‍यारे की उसने पहचान कर ली है, मगर वहां जीवन का एक अन्‍य घाव खुलता है, असल हत्‍यारे की पहचान नहीं होती. असल हत्‍यारे की पहचान फ़ि‍ल्‍म के आखिर तक नहीं होती, और हमारे मन में कड़वा सा कोई स्‍वाद छूटा रह जाता है, जैसा बहुधा जीवन में होता है, मसले सॉल्‍व नहीं होते, हमेशा कथार्सिस की मुक्ति नहीं होती.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;एक दूसरी फ़ि‍ल्‍म है, हिंदी में है, अभी तक अनरिलीज़्ड, &lt;b&gt;बेला नेगी&lt;/b&gt; की उनकी पहली, ‘&lt;a href="http://cilema.blogspot.com/2010/03/blog-post_18.html" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;दायें या बायें&lt;/a&gt;’. उत्‍तराखंड की दुनिया में खुलती है. नायक मुंबई से अपने गांव लौटा है. मगर वह औसत नायकों की तरह का नायक नहीं, उसके जिज्ञासु बेटा है, शहराती अरमानों वाली बीवी है, टीवी देख-देखकर अपना सपना बुनती साली है, कंधे के झोले में कलेजा लिये घूमता बचपन का यार है, गांव का पूरा उबड़-खाबड़ जाने कितने परतों में खुल रहा, बदलता संसार है, और फ़ि‍ल्‍म नायक के बहाने इन सबकी कहानियों में उतरती है. इकहरी कथा कहने की जगह मल्‍टीपल लेवल पर नैरेटिव खोलती चलती है. वह सब आसानी से करती लिये जाती है जो कांख-कांखकर भी कोई बड़ा बंबइया फ़ि‍ल्‍म निर्देशक नहीं कर पाता, और ठहरकर सोचिए तो सोचते हुए यह बात भी सन्‍न करती है कि समझदारी भरा यह काम एक लड़की की पहली फ़ि‍ल्‍म है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD766qkRvNI/AAAAAAAAExQ/5l_cZ1oyDa0/s1600/zhangke.jpg" style="color: #2d6e89;"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5494104481204387026" src="http://4.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD766qkRvNI/AAAAAAAAExQ/5l_cZ1oyDa0/s200/zhangke.jpg" style="border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; cursor: pointer; float: left; height: 200px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; margin-right: 10px; margin-top: 0px; width: 141px;" /&gt;&lt;/a&gt;कहने का मतलब अपने परिवेश को केंद्र में रखकर फ़ि‍ल्‍में बन सकती हैं. और कलात्‍मक फ़ि‍ल्‍मों का दुखड़ा रोती, बिना देह पर उनका जामा डाले बन सकती हैं. &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dibakar_Banerjee" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;दिबाकर बनर्जी&lt;/a&gt; की अब तक की बनाई तीनों फ़ि‍ल्‍में इसका अच्‍छा उदाहरण हैं कि धौंस और धमक में बन सकती हैं. एक के बाद एक क्रियेटिव उछालें ले सकती हैं. समाज की सच्‍चाइयों को सांड़ के सींग पर उठाकर चौतरफ़ा चक्‍कर घुमवा सकती हैं. हां, उसके लिए अपने समाज के प्रति वैसी ही करुणा, समझ और दिल की उछाल चाहिए. जिगरा. चाहिए. दिबाकर ने दिखा दिया है कि यह सब हो तो समाज में अच्‍छे सिनेमा की जगह है. इस पतित समय में भी. &lt;i&gt;हिंदी सिनेमा के गिरे संसार में भी&lt;/i&gt;&lt;i&gt;!&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;‘खोसला का घोंसला’ में ही कहीं-कहीं प्रियदर्शन टाइप फिल्‍मी तत्‍व हैं, मगर पहली फ़ि‍ल्‍म के नर्वस असमंजस के लिए उन्‍हें नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए, दूसरी, ‘ओये लकी, लकी ओये’ से दिबाकर जैसे अपना सुर साधने लगते हैं. अपने बचपन की जानी-पहचानी दिल्‍लीवाली दुनिया के पोर-पोर की उनको पहचान है, उसके चिथड़े वह सिरे से सजाते चलते हैं. सब घर में ठेल लेने की कामनाओं में, भूख की बदहाली और आत्‍मा की तंगहाली एक चोर की नहीं, समूचे समाज की कहानी होने लगती है. उस चोरमन समाज के बीच घूमते हुए दिखता है कि चोरी पर जी रहा फ़ि‍ल्‍म का नायक ही इकलौता रिडेम्प्टिव कैरेक्‍टर है. बाकी जो तथाकथित शरीफ़, धुले हुए हैं वह इस मूल्‍यहीन, पतित संसार के सबसे बड़े अधम हैं. वह दुनिया उदास करती है, मगर अपने समय और समाज की समझ में हमें ज़रा बड़ा भी कर जाती है. समांतर सिनेमा की तरह सिनेमाघर से हम डिप्रैस हुए बाहर नहीं निकलते.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;दिबाकर की तीसरी फ़ि‍ल्‍म, ‘लव, सैक्‍स और धोखा’ में कहीं और ज़्यादा क्रियेटिव छलांग है, अबकी वह अपेक्षाकृत पहचाने अभय देओल जैसे किसी स्‍टार चेहरे के फेर में भी नहीं पड़ती. दरअसल पारंपरिक तरीके से किसी को नायकत्‍व देती भी नहीं. समाज के नंगे हमाम में कैमरा लेकर उतरती है, जहां पारंपरिक कैमरावर्क की पॉलिशिंग और कंफर्ट तक नहीं है, और मनोरंजक तो कुछ भी नहीं है. क्‍योंकि आंखों के आगे जिस समाज के दृश्‍य खुलते हैं, वह सिर से पैर तक बीमारियों में रंगी है, अपने दो कौड़ी के फौरी स्‍वार्थों से अलग उसकी आत्‍मा खाली है. खोखली. कहीं कोई वह सामाजिकता की करुणा, आपसी बंधाव नहीं है जो इस पिटी दुनिया का किसी तरह बेड़ा पार लगायेगा, मालूम नहीं इस हालत में भीतर से पूरी तरह जर्जर यह समाज फिर कहां जाएगा? एक बार फिर, इतनी उदास दुनिया है, मगर मन डिप्रैस नहीं होता. अपने घटियापे में लोग विलेन नहीं लगते, विलेन वह समाज दीखता है जिसमें अपने फ़ायदे के होड़ ने सबकी यह दुर्गति, परिणति की है. और जिस तरह से अभिनेताओं का इस्‍तेमाल है, रोज़मर्रा की ज़िंदगी से गहरे जुड़े संवादों का, और सबके बावज़ूद (फ़ि‍ल्‍म के टाइटल से अलग) कहीं कोई नाटकीयता नहीं, आप फ़ि‍ल्‍म देखकर सोचते हैं और आपका मन लाज़वाब हुआ जाता है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;i&gt;हिंदी सिनेमा अब भी संभावना है.&lt;/i&gt; शाबास दिबाकर!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;दिसम्‍बर 1995 में तब फ़ैशन पत्रिका, फ्रेंच ‘एल’ के ज़्यां दोमीनीक बोबी एडिटर इन चीफ़ थे, जब एक मैसिव स्‍ट्रोक के बाद पूरी तरह पैरालाईज़्ड हो गए. सारे अंग बेमतलब हुए, सिर्फ़ उनकी आंख, एक आंख, अपना काम करती रही. अस्‍पताल के बिस्‍तरे से लगे, उस आंख के सहारे ही उन्‍होंने अपने संस्‍मरण डिक्‍टेट कराये, उसकी किताब तैयार हुई. ‘&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Diving_Bell_and_the_Butterfly_(film)" style="color: #2d6e89;" target="_blank"&gt;द डाईविंग बेल ऐन्ड द बटरफ्लाई&lt;/a&gt;’ उसी किताब पर आधारित जुलियेन श्‍नाबेल की 2007 की फ़ि‍ल्‍म है. डाईविंग बेल, माने पानी की अतल गहराई में ऐसे डूबना जिससे बाहर सिर्फ आंख से दिखते उजाले की चौंध भर ही हो. और बटरफ्लाई? मन की ऐसी उड़ान जो शरीर के कैद से किसी पंछी के गहरे आसमान में निकल पड़ना हो जैसे, अंतहीन विस्तार. एक आंख से देखी दुनिया की यादों के उमंगों की, हृदयविदारक कहानी है फ़ि‍ल्‍म. एक ही समय में मार्मिक और अदम्य जिजीविषा की कहानी जो अपने तरल क्राफ्ट में लगभग एक विज़ुअल कविता सी बहती रहती है, या कहें कि निर्देशक जुलियन श्‍नाबेल की पेंटिंग जैसी..&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;एक पैरालाईज़्ड लेखक के बायोपिक को इतना जीवंत, कोमल और जिजीविषा के स्‍वप्निल रंगों में पेंट करते जाना आसान नहीं रहा होगा. जैसा कि ज़्यां दो ने अपनी किताब में कहा है कि अब मैं खदबदाती स्मृतियों की कला सीख रहा हूं, श्‍नाबेल की फ़ि‍ल्‍म उस खदबदाहट को एक अलौकिक आश्‍चर्यलोक में बदलता-सा चलती है. इतने सारे तक़लीफ़ों के नीचे दबा जीवन भी कैसी उमंग और दीप्तिमय कविता होती रह सकती है ‘द डाईविंग बेल ऐन्ड द बटरफ्लाई’ लगातार हमें उन ऊंचाइयों तक लिये जाता है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;कविता की ऊंचाइयां, समझ की गहराइयों तक, उड़ने, उड़ाये जाने का काम बखूबी करती है सिनेमा, सवाल है फ़ि‍ल्‍म बनानेवाला निर्देशक जीवन से, व अपने माध्‍यम से ऐसे गहरे संबंध रखता हो, फ़ि‍ल्‍म देखनेवाले दर्शक सिनेमा में जीवन को मार्मिकता से उतरता देखने का मान, ऐसे अरमान रखते हों..&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;***&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;i&gt;किसी सपनीले लोक में, गाढ़े अंधेरों की गहिन दुनिया में चमकते जुगनुओं सी चमकीली, एकदम पास-पास, फिर भी हाथ न आती रौशनी.. दिलफ़रेब ख़्वाब कोई.. मनहारे अंधेरों में छुपी किसी रौशन दुनिया का अव्‍यक्‍त अहसास बना रहे.. नमी, एक ताप कोई बना रहे.. अजाने वाद्य के किसी अनूठे संगीतबंध सा जीवन की उलझी परतें एक-एक करके खुलती रहें.. और यह खुलना किसी जादू से कम न हो.. वैसे ही जैसे मर्मस्‍पर्शी नितांत अंतरंग क्षणों में जीवन का साक्षात् करना.. जीवन को उसके समूचे ताप में, आत्‍मा के गहिन माप में जीना, और सृजनशीलता को.. कितना सुंदर हो सकेगा सिनेमा.. हो सकेगा, ज़रूर.. बशर्ते उसे बनानेवाला जानता हो मन के धन, बिछे धूल के मणि-कण.. अपनी ज़मीन को पहचानता हो, उसकी अंतरंग विद्युत तरंगों को.. और इन सब को जोड़ने वाले उस तार को और ये कि जो जितना सरल है उतना ही गूढ़ है और इसी के बीच न दिखने वाली कोई बहती नदी की धार है जो सिर्फ अपने होने भर से उस सरल दुरूह में कोई ऐसा मायने भर जाती है जिसके पीछे कोई तर्क नहीं होता, कोई नाटक नहीं होता.. और ये कि उस सिनेमा को देखने वाला दर्शक भी किसी अबूझ प्रक्रिया से उस कहानी की गहराईयों और ऊंचाइयों में ठीक उसी सुर में डूबे जैसे कोई अदृश्य सूत्र से सब बंधे हों. सिनेमा फिर जीवन को उसकी पूरी सच्चाई में, उसके समूचेपन में खोल देने का ज़रिया हो.. कि लो देखो यही जीवन है अपने समस्त जीवंत रंगों में, अपनी समूची मार्मिकता में. यही जीवन है यही तो इसलिये सिनेमा भी है.. या होना चाहिये..&lt;/i&gt;&lt;i&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;अप्रैल, 2010&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&lt;i&gt;(ज़रा अनजान, नई पहचान के एक नौजवान की चिरौरी पर एक साहित्‍यि‍क मासिक के विशेषांक के लिए यह लेखनुमा जो भी चीज़ है, लिखी थी. कुछ गल्‍प जैसा बंधता चले का आग्रह था, मगर लिखे को पाकर नौजवान मित्र खुश होने की जगह कातर होते रहे, कि लय नहीं है, लुत्‍फ़ नहीं है, आदि. उन्‍हें पसन्‍द न आया, उनके पास वजह होगी. कुछ समय तक लेख मेरे पास पड़ा रहा, फिर किन्‍हीं दूसरे मित्र की कृपा से लख़नऊ से छपनेवाली एक पत्रिका '&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&lt;i&gt;लमही&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&lt;i&gt;' के पास पहुंचा, उनकी कृपा हुई, लेख वहां जुलाई-सितम्‍बर के अंक में छपा जैसा सुन रहा हूं, स्‍वयं पत्रिका अभी मैंने देखी नहीं है.&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&lt;i&gt;जो बंधुवर धीरज से आखिर तक लेख निकाल जायेंगे, उनकी हिम्‍मत की अग्रि‍म दाद दिये देता हूं, शुक्रिया.)&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="clear: both;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="post-footer" style="color: #000033; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&lt;div class="post-footer-line post-footer-line-1"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Trebuchet MS', Trebuchet, Verdana, sans-serif;"&gt;&lt;span class="post-author vcard"&gt;Posted by &lt;span class="fn"&gt;Pramod Singh&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span class="post-timestamp"&gt;at &lt;a class="timestamp-link" href="http://cilema.blogspot.com/2010/07/blog-post.html" rel="bookmark" style="border-bottom-style: none; border-color: initial; border-left-style: none; border-right-style: none; border-top-style: none; border-width: initial; color: #b47b10; text-decoration: none;" title="permanent link"&gt;&lt;abbr class="published" style="border-bottom-style: none; border-color: initial; border-left-style: none; border-right-style: none; border-top-style: none; border-width: initial;" title="2010-07-15T17:24:00+05:30"&gt;Thursday, July 15, 2010&lt;/abbr&gt;&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-8954089486897349566?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/8954089486897349566/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=8954089486897349566' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8954089486897349566'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8954089486897349566'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='सिनेमा पर एक जरुरी लेख'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_5ov4XIuU0i0/TD785-wPqDI/AAAAAAAAExw/Z4JpxdivZDA/s72-c/Gunga_Jumna1_1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-1059465424334123279</id><published>2010-06-04T14:34:00.000-07:00</published><updated>2010-06-05T09:52:03.652-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इन टू द वाईल्ड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><title type='text'>जंगलों में जीवन तलाशता वो</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इन टू द वाईल्ड&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvNK6h3oI/AAAAAAAAAgw/znBj_C-XyoQ/s1600/in+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 260px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvNK6h3oI/AAAAAAAAAgw/znBj_C-XyoQ/s320/in+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479032693731745410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....और एक दिन वो सब कुछ छोड़ कर चला जाता है। कहीं दूर अलास्का के जंगलों की तरफ। अपने मां बाप और बहन को छोड़कर। बिना कुछ बताये। क्यों? इसके लिये उसके पास कई कारण हैं। वो अपने मां बाप को बचपन से देख रहा है छोटी छोटी बातों पर लड़ते हुए। वो देखता आया है उनकी बहसों के कारण कितने भौतिक हैं। कितने मटीरियलिस्टिक। उसके ग्रेजुएशन डे के दिन उसके पापा उसे सबसे बेहतर तोहफा क्या दे सकते हैं? एक चमचमाती कार। पर वो प्यार नहीं जो उसने बरसों से चाहा है कि उसे मिले। रिश्तों में किस तरह घुल सा जाता है पैसा कमाने का जुनून और सब कुछ बरबाद कर देता है। रिस्तों के मूल तत्व कहीं गायब से हो जाते हैं। और बच जाती है खानापूर्ति। जिन्दगी के मायने क्या इन्हीं बंधनों में जकड़े रहने से जुड़े हैं? वो चीजें जिनका अस्तित्व अपने उस रुप में है ही नहीं जिसमें उनके असल मायने तलाशे जा सके। फिर क्यों एक ऐसी चीज से जुड़े रहना जिनके लिये दिल से कुछ महसूस ही नहीं होता? क्यों उस जकड़न को जबरदस्ती सहे चले जाना? जैसे उसके मां बाप सहते रहे हैं एक दूसरे के साथ रहकर। क्या रिश्ते ऐसी ही जबरदस्ती भर हैं जो इसलिये हैं क्योंकि वो हैं? बस इसलिये। उसके पास ऐसे सवालों की एक लम्बी कड़ी है। वो इन सवालों की कड़ी से जूझता रहा है। और आज फैसला करता है कि बस अब और नहीं। वो बिना किसी को कुछ बताये निकल पड़ता है। एक सफर पर। जिसका कोई पूर्वनिर्धारित लक्ष्य नहीं है। अगर है तो वो है आजादी। हर बंधन से आजादी। हर रिश्ते से आजादी। हर भौतिक जरुरत से आजादी। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvmcl05VI/AAAAAAAAAhA/0KwludBFMLM/s1600/in+4.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvmcl05VI/AAAAAAAAAhA/0KwludBFMLM/s320/in+4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479033127973479762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आजादी पाने की इस मुहिम की शुरुआत वो गुलामी की सबसे बड़ी वजह को नेस्तनाबूत करने के साथ करता है। वो अपनी पूरी जमापूंजी को दान कर देता है। और जो बच जाता है उसे आग में जला देता है। पैसे जलते है ऐसे जैसे रस्सियां टूट रही हों, जकड़न खुल रही हो। और फिर वो समुद्र की रोमांचक लहरों, रेगिस्तान के जलाते थपेड़ों , और पहाड़ों की उंचाईयों से होते हुए पहुंचता है अलास्का के बीहड़ जंगलों में। इस दौरान उसे कई लोग मिलते हैं। कई विचित्र लोग। एक जोड़ा जो समुद्र के किनारे आजाद जिन्दगी जी रहा है। मस्ती भरी। कुछ दिन वो उनके साथ रहता है। और फिर एक दिन उन्हें छोड़ के चला जाता है। उन्हें बुरा लगता है। बहुत बुरा। सफर जारी रहता है। इस बीच उसकी मुलाकात एक खूबसूरत युवती से होती है। वो उसे पसंद करने लगती है। पर कुछ दिनों बाद वो चला जाता है किसी दूसरे अनिश्चित मुकाम की ओर। कहां ये जाने बिना।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvsJCNdZI/AAAAAAAAAhI/to8PMiyQ2Vs/s1600/in+old.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvsJCNdZI/AAAAAAAAAhI/to8PMiyQ2Vs/s320/in+old.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479033225803036050" /&gt;&lt;/a&gt; फिर उसकी मुलाकात एक बूढ़े आदमी से होती है। ये आदमी अकेला है और कुछ दिनों में ही बुढ़े को इसके साथ लगाव हो जाता है। गहरा लगाव। जैसे इस बूढ़ी उम्र में कोई सहारा मिल गया हो। पर एक दिन वो उसे भी छोड़कर चला जाता है। एक बार फिर रिश्ते के इस बंधन को तोड़कर।     &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvU2HvQSI/AAAAAAAAAg4/oJaGFAhZGwE/s1600/in+1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvU2HvQSI/AAAAAAAAAg4/oJaGFAhZGwE/s320/in+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479032825588957474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीहड़ जंगलों के बीच अब बस वो है और उसकी एक डायरी। जिसमें वो अपने जीवन के अनुभवों को लिख रहा है। कुछ किताबें। जो उसके साथ हैं किसी दोस्त सी।  खामोश पर अपनी  खामोशी में बोलती सी। इन जंगलों में भूख एक बड़ी जरुरत बनती है। तब जब खाने को कुछ ना मिले। किसी मरे जानवर का गोस्त। और खाने की मजबूरी। ऐसे ही एक दिन वो भूख मिटाने के लिये कुछ पत्तियां खाता है। उसे कुछ होने लगता है। वो अकेला है। उसे नहीं पता उसे क्या हो रहा है। अपनी एक किताब खोलता है और देखता है कि जो उसने खा लिया वो एक जहर है। यानी एक निश्चित मौत। वो तड़प रहा है। कोई नहीं है जो उसे बचायेगा। उसकी कराहें इन जंगलों में कोई नही सुन सकता। उसने ये जिन्दगी खुद चुनी है। पर मौत हमें इतनी आजादी नहीं देती कि हम उसे चुन सकें। वह मरना नहीं चाहता। पर उसका मरना तय है। अब अकेलापन एक आजादी नहीं है, एक जकड़ है जो उसे कसे जा रही। न चाहते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlv8fTzhBI/AAAAAAAAAhQ/uybb_loNUNU/s1600/into-the-death.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlv8fTzhBI/AAAAAAAAAhQ/uybb_loNUNU/s320/into-the-death.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479033506660320274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये एक फिल्म की कहानी है। और पूरी फिल्म में हम एक आदमी को जीते हैं। उसके दृश्टिकोण से दुनिया को देखते हैं। एक फलक देखते हैं कि सच यही आजादी है। पर फिल्म हमें इस सच्चाई का एक दूसरा पक्ष भी दिखाती है। फिल्म में दो समानान्तर नरेशन हैं। एक खुद क्रिस्टोफर मैकेन्डलस का, यानी वो जिसकी हम अब तक करते आये हैं। और दूसरा उसकी बहन का। जो उसे बहुत प्यार करती है। उसकी बहन बताती है कि कैसे उसके जाने के बाद उनका परिवार टूट सा गया। और इस टूटन का एक असर हुआ कि उसके मां बाप के रिश्तों के फासले घट गये। बेटे के इस तरह चले जाने का दुख उन्हें नजदीक ले आया। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlwNfoi0gI/AAAAAAAAAhY/DFEOGSaHDh0/s1600/in+3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlwNfoi0gI/AAAAAAAAAhY/DFEOGSaHDh0/s320/in+3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479033798805082626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीन पैन निर्देशित ये फिल्म दरअसल जीवन की एक दार्शनिक अभिव्यिक्ति है। जो आंखिर में यही कहती सी मालूम होती है कि रिश्तों से भले हम कितना ही आजाद होना चाहें रिस्ते हमसे अलहदा नहीं होते। क्योंकि हमारी जिन्दगी केवल हमारी व्यक्तिगत जिन्दगी नहीं है कई जीवन हैं जो इससे जुडे हैं। जिसका इनसे भरा पूरा लगाव है। हम तब तक खुश नही हो सकते जब तक इसे बांटने के लिये कोई हमारे साथ ना हो। ऐसी हर खुशी अधूरी है जिसका अन्त अकेलेपन के साथ होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-1059465424334123279?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/1059465424334123279/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=1059465424334123279' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/1059465424334123279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/1059465424334123279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='जंगलों में जीवन तलाशता वो'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAlvNK6h3oI/AAAAAAAAAgw/znBj_C-XyoQ/s72-c/in+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-8079007664921692231</id><published>2010-05-30T04:29:00.000-07:00</published><updated>2010-05-30T04:54:05.240-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कार्यशाला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिनेमा'/><title type='text'>सिनेमा पर कार्यशाला</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAJNkTV9HeI/AAAAAAAAAgo/_oFieOAIINE/s1600/cinema.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 283px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAJNkTV9HeI/AAAAAAAAAgo/_oFieOAIINE/s320/cinema.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477025382898933218" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जामिया एमसीअसारसी के कुछ पूर्वछात्र फिल्मों से जुड़ी हुई एक कार्यशाला आयोजित कर रहे हैं। सिनेमा तकनीक में यदि आपकी रुचि हो और और आप कम समय में इसके मूलभूत सिद्धान्तों को समझना चाहते हों तो यह आपके लिये एक अच्छा मौका है। सिनेमाथैक नाम से शुरु हो रही इस कार्यशाला में आपको फोटोग्राफी और फिल्मों के बारे में काफी कुछ सीखने को मिलेगा साथ ही कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों पर परिचर्चाएं भी होंगी। कार्यशाला के विषय में ज्यादा जानकारी आप&lt;a href="http://www.facebook.com/group.php?gid=124856854204506&amp;ref=mf"&gt; इस लिंक&lt;/a&gt; से ले सकते हैं। यदि इच्छुक हों तो तुरन्त &lt;a href="http://www.facebook.com/group.php?gid=124856854204506&amp;ref=mf"&gt;लिंक&lt;/a&gt; में दिये गये नम्बरों पर सम्पर्क करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Cinematheque&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Description:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;Cinematheque is an initiative by the Jamia Mass Comm. alumni, where industry professionals as well as practitioners from alternate media fields would come and conduct classes on various aspects of film making and photography.This 15-day workshop will provide technical hands-on knowledge as well as critical engagement with basic debates in film theory and aesthetics.The course culminates with the students scripting, shooting, directing and editing their own films and Audio-Visuals on high-end digital cameras(which Cinematheque would provide them with).&lt;br /&gt;course 1: photography &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;analog phtography&lt;br /&gt;digital photography&lt;br /&gt;composition&lt;br /&gt;scripting and storyboarding&lt;br /&gt;lighting &lt;br /&gt;post production&lt;br /&gt;avenues for photography:a presentation&lt;br /&gt;photo feature&lt;br /&gt;final AV&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;course 2: film making&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;camera: learning the equipment&lt;br /&gt;cinematography - 'the 5Cs'&lt;br /&gt;intensive scripting sessions&lt;br /&gt;storyboard and screenplay writing&lt;br /&gt;lighting&lt;br /&gt;use of sound in film: recording and editing&lt;br /&gt;post production basics&lt;br /&gt;film screenings and discussions&lt;br /&gt;film theory&lt;br /&gt;final short film&lt;br /&gt;(read less)&lt;br /&gt;Privacy Type:&lt;br /&gt;Open: All content is public.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; Hi, the contact details of the course coordinators seem to be missing from the page. so for any queries plz call-&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; Raju-9971586800; Shaunak-9873440123.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;The&lt;br /&gt;course is tentatively slated to begin from the 15th of june, and will&lt;br /&gt;be held in Civil Lines.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-8079007664921692231?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/8079007664921692231/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=8079007664921692231' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8079007664921692231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/8079007664921692231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html' title='सिनेमा पर कार्यशाला'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/TAJNkTV9HeI/AAAAAAAAAgo/_oFieOAIINE/s72-c/cinema.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-428400412668699853</id><published>2010-05-01T08:30:00.000-07:00</published><updated>2010-05-01T08:34:11.131-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बांध पर फिल्म'/><title type='text'>बांधों का विरोध करते फिल्मकार और फिल्में</title><content type='html'>बड़े बांधों को बनाये जाने को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही हैं। विश्वभर में कुलमिलाकर 47665 छोटे बड़े बांध हैं जिनमें से सबसे ज्यादा 22 हजार बांध चीन मे, 6600 से ज्यादा बांध संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके बाद 4291 बांध भारत में हैं। लेकिन अब इन बांधों को लेकर बड़े बड़े आन्दोलन ही खड़े नहीं हो रहे बल्कि इस विशय पर वृत्तचित्र और फिल्में भी बन रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अंधाधुृध औघोगिकीकरण के चलते किये जा रहे बांधों के निर्माण के प्रति विश्वभर में प्रतिरोध पनप रहा है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S9w_RZ9dXQI/AAAAAAAAAfE/p0In2NPOGVI/s1600/damab.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 215px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S9w_RZ9dXQI/AAAAAAAAAfE/p0In2NPOGVI/s320/damab.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5466313615979928834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;     मशहूर फिल्म निर्देशक जेम्स कैमरुन जिन्हें हालिया उनकी निर्देशित फिल्म अवतार के लिये बड़ी प्रसिद्धि मिली है, इस बीच बांधों से होने वाले नुकसान का विरोध करते देखे गये। कैमरुन डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकिंग में भी एक बड़ा नाम हैं। इस बार वो  अवतार की कास्ट के साथ अमेजन नदी पर बन रहे बैलो मोंट डैम की खिलाफत करने डैम से प्रभावित आदिवासियों के पास उनके समर्थन में पहुंचे। यह बांध 2015 तक काम करने लगेगा। लेकिन विश्व के बांकी हिस्सों की तरह वहां भी आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं। 13 जनजातियों के नेताओं ने मिलकर ये फैसला किया है कि वो इस बांध को न बनने देने के लिये हर संभव प्रयास करेंगे। उनका कहना है कि यदि अमेजन की उपनदी शिंजू पर यह बांध बना दिया गया तो उनके मछली के व्यवसाय का क्या होगा। साथ ही इस नदी के सूख जाने से उनके लिये यातायात की समस्या भी पैदा हो जायेगी। जेम्स कैमरुन का इस पर कहना है कि इस बांध के मसले पर पूरे विश्व समुदाय को एकजुट होना चाहिये क्योंकि अन्ततह इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S9w-_NpmWaI/AAAAAAAAAe8/FI3dVnGalBk/s1600/dam345.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 317px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S9w-_NpmWaI/AAAAAAAAAe8/FI3dVnGalBk/s320/dam345.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5466313303437760930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       दूसरी ओर फिल्मकार सोहन राय निर्देशित एक फिल्म डैम 999 भी रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में बांधों के टूट जाने की वजह से होने वाली त्रासदी की दास्तान फिल्माई गई है। हांलाकि फिल्म में बांधों का टूटना एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के तौर पर भी प्रयोग किया गया है। फिल्म की बैबसाईट में चीन में बांधों की वजह से हुई त्रासदी को फिल्म की प्रेरणा होने की बात लिखी गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;        बांधों को लेकर चीन का रवैयया उसके पड़ौसी लाओस और थाईलैंड दोनों के लिये ही चिन्ता का सबब बनता रहा है। मेकांग नदी के उदगम स्थान पर बड़े बड़े बांधों का निर्माण कर चीन ने लाओस और तिब्बत दोनों संकट में डाल दिया है। क्योंकि मेकांग का पानी ही वह जरिया था जिससे लाओस में बिजली उत्पादन सम्भव हो पाता था और लाओस यह उत्पादित बिजली थाईलेंड को बेचकर उसकी बिजली की आपूर्ति करता था। लेकिन चीन ने बांध बनाकर इस पानी को रोक दिया है। चीन बांधों के जरिये इन देशों को पहले भी परेशान करता रहा है। बरसात के मौसम में चीन इन बांधों को खोल देता रहा है जिससे लाओस, कम्बोडिया, थाईलैंड और वियतनाम के कई इलाकों में बाढ़ का संकट उत्पन्न होता रहा है। यही शैतानी चीन अब भारत के साथ भी कर रहा है। ब्रहमपुत्र नदी के पानी को मोड़कर चीन अपने देश में सूखे के संकट से बचना चाहता है। लेकिन इससे असम सहित भारत के कई उत्तरपूर्वी इलाके सूखे की कगार पर आ जायेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         इसी तरह चिली के पैंटागोनिया में दो नदियों पर पांच बांध बनाने के लिये कई कम्पनियों ने प्रस्ताव दिये हैं। लेकिन वहां भी इन बांधेंा का विरोध हो रहा है जिसकी वजह ये है कि इन बांधों को बनाने के लिये 1500 मील लम्बी ट्रांसमिशन लाईन्स खोदने की जरुरत होगी। जिसके कारण अब तक दुनिया के सबसे विस्त्रृत जंगली इलाके का कटान करना होगा। चिली के होम डीपो इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि ये हर साल इन जंगलों से 50 मिलियन यू एस डौलर कीमत की लकड़ियां विभिन्न उत्पादों को बनाने के लिये खरीदते हैं। कभी रसिया के सबसे बड़े हाईड्रोलिक पावर प्लांट में विस्फोट की वजह से 62 लोगों की मौत तो कभी साईबेरिया में इसी तरह के विस्फोट से 50 से ज्यादा जानें जाने की घटना, बड़े बांधों के दुष्प्रभाव समय समय पर सामने आते रहे हैं। इसके अतिरिक्त पर्यावरणविद भी समय समय पर बांधों की वजह से हो रहे पारथितिकीय नुकसान की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;        भारत में बड़े बांधों के विरोध के स्वर देश के कई हिस्सों से उभर कर आ रहे है हैं। उत्तराखंड में काली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बांध का वहां के लोग पुरजोर विरोध कर रहे हैं। इस बांध के बनने से भारत और नेपाल के कुल मिलाकर एक सौ पचास गांव विस्थापन को मजबूर हो जायेंगे। इतनी बड़ी संख्या में विस्थापन का दंश झेलने के बनिस्पत इस बांध का निर्माण डूब के क्षेत्र में आने वाली जनता को रास नहीं आ रहा। इससे पहले टिहरी बांध की त्रासदी को वहां के लोग अब तक नहीं भुला पाये हैं। उर्जा प्रदेश कहे जाने वाले उत्तराखंड से बांधों के लिये आ रहे विरोध के स्वर बताते हैं कि आम आदमी बड़े बांधों का पक्षधर नहीं है। इससे पहले मेधा पाटकर के नेतृत्व में गुजरात की जनता ने सरदार सरोवर बांध का भारी विरोध किया था। गुजरात में नर्मदा नदी घाटी परियोजना के तहत नर्मदा नदी पर 30 बड़े, 135 मध्यम और 3000 लघु आकार के बांध बनाये जाने की योजना थी। इस पूरी योजना में एक लाख लोगों को विस्थापन का दंश झेलने को विवश होना तय था जिनमें 60 प्रतिशत जनजातीय इलाकों के लोग थे। ऐसे में इन बांधों का विरोध होना तय था। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S9w_iBVOmLI/AAAAAAAAAfM/PWr3IF92FZI/s1600/dam123.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S9w_iBVOmLI/AAAAAAAAAfM/PWr3IF92FZI/s320/dam123.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5466313901426514098" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;       &lt;br /&gt;            ल्ेाकिन जिस तरह वैश्विक स्तर पर इन बड़े बांधों का विरोध हो रहा है उससे उर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की आवश्यकता का मुददा भी सामने आया है। सवाल यह है कि क्या बांधों के समानान्तर उर्जा के दूसरे वैकल्पिक स्रोत विश्वभर में जरुरी उर्जा की आपूर्ति करने में सक्षम हैं। जर्मनी जैसे कितने देश हैं जहां पानी से उर्जा उत्पादन की जगह पवन उर्जा पैदा करने को प्राथमिकता दी जाती है? वहां कुल उत्पादित उर्जा का केवल 3 दशमलव 5 प्रतिशत हाईड्रोलिक पावर के जरिये पैदा किया जाता है। जर्मनी और स्पेन में फोटोवोल्टिक उर्जा प्लांट का प्रचलन भी तेजी से बड़ रहा है। वैकल्पिक उर्जा के स्रोत जिनमें सौर उर्जा, पवन उर्जा तथा समुद्री ज्वार भाटों से उत्पन्न होने वाली उर्जा शामिल है का प्रचलन विश्वभर में बढ़ा है। 2008 में वैकल्पिक उर्जा के इन स्रोतों का कुल उत्पादित उर्जा का 18 प्रतिशत उत्पन्न करने में योगदान रहा। वैकल्पिक उर्जा के स्रोतों से विश्वभर में 2006 में 207 जीडब्लुई उर्जा का उत्पादन किया गया जो 2008 में बढ़कर 280 जीडब्लुई तक पहुंच गया। बांधों के विकल्प पूरी तरह तलाश पाना भले ही सम्भव न हो पर इस मात्रा को धीरे धीरे बढ़ाकर ही कम से कम बांधों के निर्माण की गति को रोका तो जा ही सकता है। जिससे कि उर्जा के स्रोत महज उर्जा का उत्पादन ही करें भारी प्रतिरोध का नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यह लेख &lt;a href="https://docs.google.com/viewer?a=v&amp;pid=gmail&amp;attid=0.1&amp;thid=1284ed3a7582bfcd&amp;mt=application/pdf&amp;url=https://mail.google.com/mail/%3Fui%3D2%26ik%3D4d49976c42%26view%3Datt%26th%3D1284ed3a7582bfcd%26attid%3D0.1%26disp%3Dattd%26realattid%3Df_g8n1xbo0%26zw&amp;sig=AHIEtbSYyN4gA19cAVR94AARLojjekED8g"&gt;दैनिक भास्कर&lt;/a&gt; में भी प्रकाशित हो चुका है।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-428400412668699853?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/428400412668699853/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=428400412668699853' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/428400412668699853'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/428400412668699853'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='बांधों का विरोध करते फिल्मकार और फिल्में'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S9w_RZ9dXQI/AAAAAAAAAfE/p0In2NPOGVI/s72-c/damab.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-247796584749234302</id><published>2010-04-08T21:43:00.000-07:00</published><updated>2010-04-08T21:51:12.817-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्मों से'/><title type='text'>फिल्म में काम करने के इच्छुक सम्पर्क करें</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S76vfDud2AI/AAAAAAAAAes/BwQ_1sJ67AM/s1600/sr3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 274px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S76vfDud2AI/AAAAAAAAAes/BwQ_1sJ67AM/s320/sr3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457992746530625538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लाग जगत से सम्पर्क रखने वालों के लिये जो खास तौर पर फिल्मों के शौकीन हैं एक खबर अनुरोध की शक्ल में यहां दे रहा हूं। जामिया के एमसीआरसी में शूट हो रही स्टूडेन्ट फिल्म के लिये एक लीड एक्टेस की आवश्यकता है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अदाकारा&lt;/span&gt; की &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उम्र 20 से 25 साल&lt;/span&gt; के बीच हो। थियेटर या फिल्मों का थोड़ा ही सही अनुभव या समझ हो। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;14 से 22 अप्रैल&lt;/span&gt; के बीच सात दिन पूरी तरह दे सके। और उससे पहले जितनी जल्दी हो सके रिहर्सल के  लिये हमसे सम्पर्क करे। लगभग 20 मिनट की ये फिल्म &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;16 एमएम फिल्म फौर्मेट पर एसआर 3 कैमरे &lt;/span&gt;से शूट की जायेगी। शूटिंग जामिया कैम्पस और उसके आस पास ही होगी। उनके लिये एक अच्छा अवसर जो फिल्मों में काम करने के शौकीन हैं और अभिनय के क्षेत्र में अपने लिये पोर्टफोलियो बनाना चाहते हैं। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद जितनी जल्दी हो सके हमसे सम्पर्क करें।&lt;br /&gt;   आप इन नम्बरों पर सम्पर्क कर सकते हैं- &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश पंत- 9310872283&lt;br /&gt;रोहित वत्स- 9868076865&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;साथ ही अपनी एक तस्वीर हमें ईमेल करें। आई डी है- mshpant@gmail.com, vatsbirpuria@gmail.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(पहले सम्पर्क करने वालों को वरियता दी जायेगी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-247796584749234302?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/247796584749234302/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=247796584749234302' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/247796584749234302'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/247796584749234302'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/04/blog-post_08.html' title='फिल्म में काम करने के इच्छुक सम्पर्क करें'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S76vfDud2AI/AAAAAAAAAes/BwQ_1sJ67AM/s72-c/sr3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-4842677700149223920</id><published>2010-04-05T13:44:00.000-07:00</published><updated>2010-04-06T09:56:23.229-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुरुसावा के सपने'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><title type='text'>कुरुसावा के सपने</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7tnbSzo7kI/AAAAAAAAAek/uwPEBkFr40w/s1600/KurosawaAtWork.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 242px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7tnbSzo7kI/AAAAAAAAAek/uwPEBkFr40w/s320/KurosawaAtWork.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457069092092046914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार हम सपने देखते हैं और जब जागते हैं तो सोचते हैं जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या। पर अक्सर ज्यादातर सपनों को हम भुला ही देते हैं ऐसे जैसे उन्हें हमने कभी देखा ही न हो। पर क्या आपको नहीं लगता कि किसी दूसरे के सपने अपनी आंखों से देखना कितना रोमांचक अनुभव हो सकता है। और वो भी तब जब सपने किसी सुन्दर फिल्म में फिल्मा लिये गये हो और वो भी अकिरा कुरुसावा जैसे निर्देशक के द्वारा। कुरुसावा की फिल्म ड्रीम्स एक ऐसा ही अनुभव है। कहा जाता है कि ये पूरी फिल्म अकीरा कुरुसावा के उन सपनों के बारे में है जो उन्होंने अलग अलग समय में देखे। फिल्म में 8 छोटी छोटी कहानियां हैं, मुश्किल से पांच पांच मिनट की। इन कहानियों में कुरुसावा मनुष्य और प्रकृति के बीच के तारतम्य के असन्तुलित से हो जाने के लिये अपनी चिन्ता जाहिर करते मालूम होते हैं। सभी कहानियों के पात्र किसी न किसी रुप में या प्रकृति से जुड़े हैं या प्राकृतिक जीवनदर्शन से। इन कहानियों में कहीं प्रकृति अपने पूरे साफ सुथरे नैसर्गिक रुप में दिखाई देती है तो कहीं उसके साथ हुए खिलवाड़ से पनपी विभीषिका पूरे भयावह रुप में सामने आ जाती है। और उसके समानान्तर चलता है आनन्द और विभीषिका दोनों से जूझता इन्सान। ये कुरुसावा के सपनों का फिल्मांकन तो है ही साथ ही हमारे इर्द गिर्द की दुनिया की चिन्ताएं भी हैं। भले इनका रुप प्रतीकात्मक है पर ये चिन्ताएं आज के सन्दर्भ में भी उतनी ही प्रासांगिक हैं। और इस लिहाज से ये फिल्म महत्वपूर्ण हो जाती है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वो बारिस में घुलती सूरज की चमक- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pBQp_VySI/AAAAAAAAAd0/k8zVT2IEaJM/s1600/rainbow.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 286px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pBQp_VySI/AAAAAAAAAd0/k8zVT2IEaJM/s320/rainbow.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456745652918012194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सनशाईन थ्रो रेन फिल्म की पहली कहानी है। फिल्म को देखकर लगा कि कई बार लोकोक्तियां या कहावतें जिन्हें हम नितान्त क्षेत्रीय समझ रहे होते हैं वो विश्वव्यापी भी हो सकती हैं। हम अपने घर में अक्सर सुना करते थे कि जब धूप और बारिस दोनों साथ साथ हो रही होती हैं तो उस वक्त लोमणियों की शादी होती है। इस कहावत के जापानी वर्जन को फिल्म के इस हिस्से में देखा जा सकता है। एक बच्चा जिसकी मां उसे इस मौसम में बारिश में जाने से मना कर रही है पर बच्चा जाता है और जब वो घर लौटता है तो उसकी मां उसे बताती है कि एक लोमड़ी वहां आयी थी जो उसे एक चाकू देके गई है। माने यह कि वे चाहती है कि तुम इससे खुद को मार लो। मां बच्चे से कहती है कि वो लोमड़ी से माफी मांग ले हो सकता है कि वो माफ कर दे। बच्चा लोमड़ी तलाश में घर से जंगल की तरफ चला आता है। और वहां एक इन्द्रधनुश है फूलोें के बगीचे के इर्द गिर्द पहाड़ों के बीच कहीं उगता हुआ। और बच्चा आगे बढ़ा जा रहा है अनन्त की ओर। फिल्म के इस हिस्से में सफेद कुहासे के बीच से उभरते लोमणियों के प्रतीकात्मक चेहरे जब पार्श्व में बजते किसी जापानी लोकसंगीत के साथ आगे बढ़ रहे होते हैं तो एक अजीब किस्म की रहस्यात्मक अनुभूती होती है। और उस मासूम बच्चे के लिये एक खास किस्म की सहानुभूति का भाव मन में पैदा होने लगता है न जाने क्यों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आड़ू का बगीचा-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pBmW17kXI/AAAAAAAAAd8/ZuQRQtYgTh4/s1600/peach.png"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pBmW17kXI/AAAAAAAAAd8/ZuQRQtYgTh4/s320/peach.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456746025735393650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; द पीच और्चर्ड फिल्म की दूसरी कहानी है। ये कहानी गुड़ियाओं के एक त्योहार के बारे में है। माना जाता है कि इस त्योहार को तब मनाया जाता है जब आड़ू के बगीचों में सुन्दर गुलाबी फूल उगते हैं। और त्योहार में प्रदर्शित की गई हर गुड़िया एक आड़ू के पेड़ का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन एक छोटा सा लड़का इस बार त्योहार में खुश नहीं है। क्योंकि उसके परिवार ने इस बार आड़ू के बगीचे से सारे पेड़ काट दिये। बच्चा एक लड़की के पीछे पीछे कटे पेड़ों वाले उस बगीचे में जाता है और देखता है कि गुड़ियाएं आड़ू के पेड़ों की आत्माओं में बदल गई हैं। और बच्चे को बताती है कि कैसे उन्हें काट दिया गया। लेकिन जब उन्हें महसूस होता है कि बच्चे को उनका खिलना कितना अच्छा लगता था वो फैसला करते हैं कि एक बार उसे फिर से आड़ू के उस खिले बगीचे का दर्शन करा दिया जांये। बगीचा एक बार फिर खिल जाता है पर थोड़ी देर बाद ही वहां सारे कटे हुए पेड़ वापस आ जाते हैं। वो लड़की जिसके पीछे बच्चा यहां आया था एक बार फिर दिखाई देती है। और थोड़ी देर में वो भी गायब हो जाती है और उसकी जगह एक गुलाबी फूलों वाला आड़ू का पेड़ वहां उग जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द बिजार्ड और द टनल फिल्म की अगली दो कहानियां हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मौत के वो काले परिंदे- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pB2nbfwyI/AAAAAAAAAeE/rNEjyMSJtD4/s1600/wongog.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pB2nbfwyI/AAAAAAAAAeE/rNEjyMSJtD4/s320/wongog.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456746305065829154" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रोज़्ा इस सिलसिलेवार हिस्से की पांचवी कहानी है। इस भाग में मशहूर चित्रकार विनसेंट वानगाग की पेटिंग के जरिये उनके जीवन के एक खास हिस्से को बड़े ही दार्शनिक तरीके से कुरुसावा जीवन्त कर देते हैं। फिल्म के इस हिस्से में विन्सेन्ट वानगाग की भूमिका में विश्वविख्यात फिल्म निर्देशक मार्टिन स्कोर्सीजी खुद मौजूद हैं। फिल्म शुरु होती है वानगाग की एक पेटिंग से जिसके अन्दर एक लड़का किसी को ढूढ़ते हुए प्रवेश कर जाता है। वो लड़का वानगाग की कई पेंटिंग्स से गुजरता है और अन्त में उसे एक बूढ़ा आदमी पेंटिंग बनाता हुआ दिखाई दे जाता है। इस आदमी के दोनों कानों में पटिटयां बंधी हुई हैं और वो अपने चित्रों की दुनिया में खोया पेंटिंग बनाये जा रहा है। लड़का उस आदमी से पूछता है कि आपके कानों में पटिटयां क्यों बंधी हुई हैं तो वा आदमी उसे बताता है कि मैने अपने दोनों कान ही काट लिये क्योंकि ये कान मुझे मेरा काम करने में रुकावट पैदा करते थे। माना जाता है कि वानगौग ने अपने जीवन के अन्तिम समय में इसी तरह अपने कान काट लिये थे और अपने आंखिरी समय में वो जीवन से इतने परेशान हो गये थे कि उन्होंने आत्महत्या ही कर ली। क्रोज के आंखिरी दृश्य में कुछ कौवे आसमान को चीरते हुए उड़ते चले आते हैं। सम्भवतह कुरुसावा ने इस दृश्य में वौनगौग की आत्महत्या को ही प्रतीकात्मक रुप में दिखाया है। वानगाग की पेंटिग्य को फिल्म का यह हिस्सा जिस तरह से जीवन्त कर देता है वो सचमुच एक कमाल का अनुभव लेने जैसा है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;माउन्ट फूजी का लाल सच-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pEVIzZlFI/AAAAAAAAAeM/EmNcWrD76_c/s1600/mount+fujy+red.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 173px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pEVIzZlFI/AAAAAAAAAeM/EmNcWrD76_c/s320/mount+fujy+red.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456749028443788370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; माउन्ट फूजी इन रेड फिल्म की छटी कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि कैसे माउन्ट फूजी में स्थित न्यूक्लियर प्लांट में फैले रेडियेशन के चलते इतना जहरीला प्रदूषण हुआ कि आसमान लाल हो गया। और वहां के सभी लोगों ने समुद्र में शरण लेकर मौत को गले लगाना बेहतर समझा। अन्त में तीन लोग एक आदमी औरत और बच्चा ही षश रह गये हैं जो लगभग जान ही चुके हैं कि जल्द ही उनकी मौत भी तय है। और उनके भीतर पसरा मौत का डर इस कहानी में साफ देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; फिल्म की अगली दो कहानियां जापान में हुए परमाणु हमलों की वजह से हुए ज़हरीले विकीरण पर कुरुसावा की चिन्ता को दिखाती हैं। ये कहानिया उस विभीषिका की सांकेतिक अभिव्यक्ति हैं जो जापान ने सम्भवतह उन परमाणु हमलों की वजह से झेली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दैत्य जो रो रहे हैं-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pEswW35LI/AAAAAAAAAeU/BmXwnU-xuow/s1600/weeping+demon.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pEswW35LI/AAAAAAAAAeU/BmXwnU-xuow/s320/weeping+demon.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456749434198549682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;द वीपिंग डैमन फिल्म की सांतवीं कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि एक पहाड़ पर कई ऐसे दैत्यनुमा लोग बुरी तरह चीख रहे हैं। अजीब सी आवाजें निकालेने वाले इन एक सींग वाले दैत्यों में से एक दैत्य लड़के को बतात है कि ये लोग न्यूक्लियर रेडियेशन के शिकार हैं। इसी विकीरण की वजह से इन लोगों की एक सींग उग आई और ये लोग भटकती हुई आत्माएं बन गये। और इनका सबसे बड़ा दुख ये है कि अब ये मर भी नहीं सकते और इसी तरह भटकते रहना इनकी मजबूरी है।      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   वो गांव पनचक्कियों वाला-&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pFNDLTGjI/AAAAAAAAAec/aaA4Ab8bg9w/s1600/village+of+the+watermill.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 179px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7pFNDLTGjI/AAAAAAAAAec/aaA4Ab8bg9w/s320/village+of+the+watermill.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456749989006088754" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक सुन्दर सा गांव जहां हौले हौले एक नदी बह रही है। पेड़ों से मन्द मन्द हवा बहती आ रही है। और नदी और हवा के बहते जाने के बीच कई पनचक्कियां चल रही हैं। कुछ बच्चे हैं जो एक पत्थर पे फूल चढ़ा रहे हैं और वो नौजवान लड़का जो उन्हें देख रहा है फूल चढ़ाते हुए। लड़का इतने अच्छे वातावरण में बड़ी राहत महसूस करते हुए आगे बढ़ता है वहां उसे एक बूढ़ा सा आदमी दिखाई देता है जो पनचक्की बना रहा है। फिल्म के इस हिस्से में उस बूढ़े आदमी और इस लड़के के बीच जो बात होती है वो बेहद रोचक है। उस बात को सुनने के बाद आपको महसूस होगा कि आदमी अगर चाहे तो पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों की मदद से ही जी सकता है बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाये। ये भी कि इस तरह जीते हुए आदमी अपनी मौत को एक जश्न के रुप में मना सकता है। संवाद की शुरुआत में लड़का पूछता है कि इस गांव का नाम क्या है तो बूढ़ा जवाब देता है हम इसे गांव ही कहते हैं। इसका कोई नाम नहीं है। लड़का बिजली के बारे में पूछता है तो बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि हमें बिजली की जरुरत महसूस ही नहीं होती। लड़का फिर पूछता है कि यहां रातें तो बड़ी गहरी होती होंगी। तब आप क्या करते हैं? बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि रातें गहरी काली ही होनी चाहिये। तभी तो हम आकाश में बिखरे तारोें को साफ साफ देख पायेंगे। अन्धाधुन्ध हो रहे आविष्कारों पर सवाल उठाते संवादों के सिलसिले के अन्तिम पड़ाव में पहुचते हुए फिल्म जिन्दगी को एक को इत्मिनान से जिये गये पर्व और मौत को किसी जश्न की तरह दिखाती है। और बताने की कोशिश करती है कि अगर प्रकृति की नैसर्गिकता बर्करार रखते हुए और उसपे अपनी शर्तें न थोपते हुए सरलता से जिया जाये तो मौत को भी उत्सव की तरह अपनाया जा सकता है। क्योंकि तब न मौत आने में जल्दी करेगी, न हम मौत को बुलाने की जल्दबाजी में रहेंगे। ये सब उसी तरह होगा जैसे प्रकृति। बिल्कुल अपनी प्राकृतिक निरन्तरता में, अपने समय से। फिल्म के इस हिस्से के आंखिरी पलों में 103 साल का बूढ़ा आदमी जो 99 साल की औरत की अन्तिम यात्रा के जश्न में शामिल होने जा रहा है नौजवान से कहता है कि मेरे खयाल से मेरी उम्र मौत को अपनाने की बिल्कुल सही उम्र है। और अन्त में सम्भवतह जापानी लोकगीत की सुन्दर सी धुन के साथ पारम्परिक वाद्ययंत्रों और एक समान पोशाक पहने छोटे छोटे बच्चों से लेकर सौ साल से बूढ़े लोगों के जुलूस की जुगलबन्दी फिल्म के इस हिस्से को अहसास कर पाने की हद तक दर्शनीय बना देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  अकिरा कुरुसावा के सपनों की ये फिल्मी दुनिया न केवल फिल्म देखने की सुखानुभूति देती है बल्कि एक सरल सन्देश भी दे जाती है कि प्रकृति और इन्सान का रिस्ता मानवीय रिस्तों से अलहदा नही है। जब तक हमें उसकी गरज है तब तक ही उसे हमारी फिक्र। जिस दिन इन्सान ने प्रकृति के बारे में सोचना छोड़ दिया उस दिन प्रकृति भी हमें ऐसे तरसाना शुरु कर देगी। और इसका असर हमारे सपनों में भय बनकर समा जायेगा। कुरुसावा के ये सपने इसी असर की असरदार नुमाईश हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-4842677700149223920?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/4842677700149223920/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=4842677700149223920' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4842677700149223920'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4842677700149223920'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='कुरुसावा के सपने'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S7tnbSzo7kI/AAAAAAAAAek/uwPEBkFr40w/s72-c/KurosawaAtWork.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-7161426098205454813</id><published>2010-03-23T12:43:00.000-07:00</published><updated>2010-03-24T05:53:55.161-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेक्स और धोखा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लव'/><title type='text'>लव.. सेक्स.. धोखा. और सच</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S6kVLXc81aI/AAAAAAAAAdU/sF-laCKGkMk/s1600-h/lsd_poster_hires.jpg"&gt;&lt;img src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S6kVLXc81aI/AAAAAAAAAdU/sF-laCKGkMk/s320/lsd_poster_hires.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451912108926883234" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 222px; height: 320px; " /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लव, सेक्स और धोखा। इन तीनों में से कोई भी शब्द हाईपोथैटिकल और नया नहीं है। तीनों इन्सानी फितरत के हिस्से हैं। और इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भी। लेकिन दिबाकर बनर्जी जिस तरीके से इन तीनों को स्क्रीन पे दिखाते हैं उससे फिल्म की ग्रामर को ही एक नई धारा सी मिल जाती है। मेरी समझ से इस तरह की फिल्म हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं बनी। जिसमें सब कुछ आन कैमरा चल रहा है। फिल्म कैमरे के पाईंट आफ व्यू से हमें तीन अलग अलग कहानियां दिखाती है। लेकिन जिस तरह से इन तीन बिल्कुल अलग कहानियों को लिंक किया गया है वह कमाल है। फिल्म दर्शकों को तीनों कहानियां उसी तरह दिखाती है जेसे वो कैमरे में रिकौर्ड हो रहीे हैं। कैमरे के एंगल और मूंमेंट बिल्कुल वियर्ड से लगने लगते हैं। इससे इस बात का खतरा भी पैदा होता है कि क्या एक आम दर्शक जो बालिवुड के एक सेट पैटर्न पर फिल्में देखने का आदी हो चुका वो इस तरह के विकृत से रुप में फिल्म देखना चाहेगा? शुरुआतमें दर्शकों को कैमरे की वजह से महसूस होने वाली इस विकृति को आत्मसात करने में समय लग सकता है। लेकिन जैसे जैसे वह इस बात का आदी हो जाता है और वह कैमरे के रिदम को समझने लगता है उसे फिल्म समझ में आनी शुरु हो जाती है। ऐसा लगता है कि फिल्म किसी फिल्म की मेकिंग का रा मटीरियल है। लेकिन वास्तव में फिल्म आज की महानगरीय सभ्यता में सर्विलेंस के बढ़ते जाल का पर्दाफाश करती है और जितने यथार्थवादी तरीके से करती है वह काबिलेतारीफ है। फिल्म ये नहीं दिखाती की आम जिंदगी में जो तांकझांक की जा रही है वो सही है या गलत बल्कि वह इससे जरुरी काम करते हुए यह दिखाती है कि आंखिर ये तांकझांक हो कैसे रही है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिल्म की पहली कहानी एक स्टूडेंट फिल्म मेकर के प्यार की कहानी है। कैसे वो अपनी फिल्म की मुख्य किरदार से प्यार करता है, प्यार के चलते कैसे उसके परिवार के सदस्यों से उसकी मुलाकात होती है, कैसे उसका पिता फिल्म का हिस्सा बनता है, कैसे वह लड़की को भगा कर ले जाता है और अन्ततह कैसे दोनों मारे जाते है। ये सबकुछ रिकौर्ड हो रहा है। फिल्म देखते हुए दर्शकों के कमेंट बड़े रोचक होते हैं। देख भाई प्यार का हस्र। कई बार लगता है कि जिस माहौल में हम जी रहे हैं वहां प्यार एक बड़ी सस्ती सी चीज हो गया है। ऐसी जिसका सम्बन्ध बस देह से है। फिल्म के इस पहले हिस्से के अन्त में फिल्म में बन रही फिल्म की नाईका स्रुति और फिल्म डाईरेक्टर राहुल को काट काटकर लड़के का भाई मार देता है और मरवाने का आदेश लड़की के पिता का होता है। यानी बेटी बेटी नहीं एक ऐसी चीज है जिससे घर की इज्जर बढ़ाई जा सकती है। जिसे शोपीस बनाकर घर में तब तक रखा जा सकता है जब तक कोई रईश खरीददार ना मिल जाये । हम इस सिस्टम में जीने के आदी हो गये हैं जहां ये चीजें बहुत आम हो गई हैं। कई बार ऐसा लगता है कि पूंजी हमारे मूल्यों पर इतनी हावी हो गई है जहां प्यार जैसी संवेदनाओं की कोई कीमत ही नहीं रह गई है और कमोवेश लड़कियों का एक बड़ा हिस्सा भी इस बात को मानने को तैयार हो जाता है। फैमिनिजम जैसी अवधारणाओं पर गहरा विश्वास रखने वाली लड़की भी अगर आपको यह कहते मिल जाये कि एक अमीर लड़के से शादी हो जाये तो लाईफ बन जाये। ये लाईफ बन जाने का मौजूदा कन्सेप्ट आने वाले समय में जिस तरह का समाज बनायेगा वो ऐसा होगा जैसा फिल्म दिखाती है। जहां बेटी उतनी जरुरी नहीं रह जायेगी जितनी परिवार की रैपुटेशन। फिल्म का पहला हिस्सा इस बात को गहरे तक कह जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिल्म दूसरी कहानी की ओर बढ़ते हुए डिपार्टमेंटल स्टोर्स में चोरी छिपे चलने वाले सेक्स स्कैंडल का पर्दाफाश करती है। मैट्रो सिटीज में जिस तरह से माल्स का प्रचलन बढ़ा है उसने उपभोक्ताओं की एक बड़ी खेप को इन स्टोर्स से खरीददारी करने के लिये आकर्शित किया है। और इसी से पैदा हुआ है चोरी का डर जिसने सर्विलेंस और हिडन कैमरे जैसे कन्सेप्ट की जरुरत को पैदा किया है। लेकिन क्योंकि सारी चीजें इन स्टोर्स में व्यापार से जुड़ी हैं तो इन हिडन कैमरों ने व्यापार के एक विकृत रुप को सामने ला खड़ा किया है। लड़कियों के चेंजिंग रुम में कैमरे छुपाने के कई केस इस बीच सामने आये हैं। किस तरह से लड़के लड़कियों के साथ बिताये अपने अंतरंग पलों को जानबूझकर एमएमएस के जरिये दुनिया के सामने परोस देते हैं फिल्म इसकी भी पड़ताल करती है। हांलाकि ये जीजें सामाजिक तानेबाने पर अविश्वास जैसी स्थिति के पनपने के गम्भीर खतरे को भी पैदा करती हैं। क्योंकि ये जरुरी नहीं है कि सेक्स के पीछे की भावना हमेशा इतनी सस्ती ही हो। लेकिन यह सस्तापन शहरी युवाओं के भीतर नीचे गिरने की किस हद तक पैठ बनाये हुआ है फिल्म इस ओर आगाह करने की कोशिश करती है। इस कोशिश में ये खतरा जरुर पैदा होता है कि लोग फिल्म को चीप मान लें। लेकिन जिस चीपनेस को वह सामने लाती है असल में हमें उसके प्रति सचेत होनी की जरुरत है और फिल्म इस जरुरत का अहसास दिलाने में अहम भूमिका निभाती है। प्यार जैसी भावना को यूज करने की प्रवृत्ति आज के युवाओं में कितनी हावी हो गई गई है फिल्म को देखकर महसूस किया जा सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;फिल्म की तीसरी कहानी में न्यूज मीडिया के स्टिंग औपरेशन और फिल्म इन्डस्ट्री में होने वाले कास्टिंग काउच दोनों को फिल्म सवालों के घेरे में खड़ा करती है। एक म्यूजिक वीडियो डाईरेक्टर के चंगुल में फंसी डांसर मृगनयनी की जान बचाने के बाद कैसे एक पत्रकार उसके साथ मिलकर उस डाईरेक्टर का स्टिंग औपरेशन करवाता है। ये इस तीसरी कहानी में दिखाया गया है। फिल्म के इस हिस्से में न्यूज मीडिया में किस तरह से सेक्स स्कैंडल्स को भुनाया जाता है इस बात की पड़ताल की गई है। और इसके चलते एक पत्रकार को अपने मूल्यों के साथ कैसे समझौता करना पड़ता है। मूल्य बचाने के चक्कर में वह यूजलेस ही मान लिया जाता है, उसे न्यूज मीडिया के मौजूदा वातावरण में इन मूल्यों को बचाये रखने में कितनी मुश्किलें होती हैं। कैसे फिल्म इन्डस्ट्री में लड़कियां अपने शरीर के रास्ते सोहरत तक पहुंचने की कोशिश करती हैं। और कैसे उन्हें यूज कर लिया जाता है। फिल्म इन सारे सवालों की तहों को दिखाती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तकनीक के तौर पर दिबाकर की ये फिल्म बौलीवुड के सारे सैट पैटर्न तोड़ती है। इस तरह ये पूरी तरह एक प्रयोग है। लेकिन सवाल ये है कि भारतीय दर्शक इस प्रयोगधर्मिता को कितना अपना पायेंगे। क्या उन्हें ये प्रयोग अच्छा लगेगा। फिल्म देखते हुए लगता है कि इससे वो लोग ज्यादा जुड़ाव महसूस करेंगे जो कैमरे को थोड़ा बहुत भी समझते हैं। स्क्रीन पर दर्शक रिर्कौडिंग के टाईमकोड को देख रहा होता है। नाईटमोड और लो लाईट जैसे संकेत कैमरे पर जैसे आते हैं वैसे वो स्क्रीन पर देख रहा होता है। कैमरा आड़ा तिरछा होता है तो स्क्रीन पर दिख रही चीजें भी उसी तरह दिखने लगती हैं। आड़ी तिरछी सी। आउट औफ फोकस से फोकस होते चेहरे, स्क्रीन पर कभी पानी तो कभी खून की बूंदें और कभी ब्लू स्क्रीन और कलर बार। हैंडीकैम के इस दौर में ज्यादातर लोग कैमरे की इस बेसिक टैक्नोलौजी से वाकिफ ही होंगे ये मान लिया जाय तो फिल्म को दर्शक तकनीक के तौर पर भी अपना लेंगे ऐसा माना जा सकता है। हांलाकि ऐसा मानना एक रिस्क ही है। क्योंकि हो सकता है ये तकनीकी डिस्टर्बेंस आम दर्शक पसंद ना करे। इसीलिये फिल्म पसंद के स्तर पर यूनिवर्सल तो कतई नहीं जा सकती।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S6kVrcIfRkI/AAAAAAAAAdc/0hxdc5Kqqkk/s320/Dibakar.jpg" /&gt;दिबाकर दिल्ली से जिस तरह के कैरैक्टर उभारकर लाते हैं वो रोचक होते हैं। वो इस शहर की बोलचाल की भाषा को अपने पात्रों के जरिये ऐसे कहलवाते हैं कि लगता है कि ये कैरेक्टर बिल्कुल हमारे आस पास के हैं। उनमें हमारे आसपास के लोगों की झलक देखने को मिल जाती है। इससे पहले ओये लकी लकी ओये और खेसला का घोंसला में भी दिबाकर ने दिल्ली की भाशा के जरिये अपने फिल्म के चरित्रों को उकेरा जिसे दर्शकों ने पसंद किया। फिल्म की खास बात है कि सारे चेहरे दर्शकों के लिये नये हैं। सुृति, आदर्श, नैना, लोकी लोकल सभी के कैरेक्टर उनके एक्सेंट और लोकल टच की वजह से यूनिक नजर आते हैं। डिपार्टमेंटल स्टोर में काम करने वाला गार्ड जो कि फिल्म का मुख्य पात्र नहीं है अपने एक्सेंट की वजह से याद रह जाता है। इनमें से कोई पात्र हीरोईक नहीं है। वो पात्र हमारे आसपास का ही कोई चेहरा लगता है जिसे या जिस जैसा शायद हमने कभी देखा हो । दरअसल पूरी फिल्म देखते हुए ये कहीं लगता ही नहीं कि हम सच नहीं देख रहे पर अफसोस इसी बात का है कि लव, सेक्स और धोखा आज के युवा भारत का ईमानदार सच है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-7161426098205454813?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/7161426098205454813/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=7161426098205454813' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/7161426098205454813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/7161426098205454813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='लव.. सेक्स.. धोखा. और सच'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S6kVLXc81aI/AAAAAAAAAdU/sF-laCKGkMk/s72-c/lsd_poster_hires.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-4776720921804229949</id><published>2010-02-20T23:04:00.000-08:00</published><updated>2010-03-21T00:33:50.714-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आईज आफ स्टोन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निलिता वचानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डाक्यूमेंट्री फिल्म'/><title type='text'>भूत के प्रकोप से मुक्ति की सच्ची कहानी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S4DXL8b23DI/AAAAAAAAAbo/KL5z-XigFuk/s1600-h/vachani4_DebrajRay_s.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 251px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S4DXL8b23DI/AAAAAAAAAbo/KL5z-XigFuk/s320/vachani4_DebrajRay_s.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5440584950065060914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;         &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.imdb.com/name/nm0882893/"&gt; निलिता वचानी&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.imdb.com/name/nm0882893/"&gt; &lt;/a&gt;एक जानी मानी डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर हैं ये बात कल उनकी फिल्मों के अंश देखते और उन पर उन्हीं की टिप्पणियों को सुनते मालूम हुई। आईज आफ स्टोन उनकी उल्लेखनीय वृत्तचित्रों में शुमार है। साथ ही सब्जी मंडी के हीरे भी चर्चा में रही है। ऐसा कल ही मालूम हुआ। वृत्तचित्रों के लिए एक खास किस्म की समझ होना बड़ा लाजमी है क्योंकि ये समझ उसे एक सादा डाक्यूमेंटेशन बनने से रोकती है। डाक्यूमेंटी का फार्म सादी बाईट और इवेन्ट के बेहद सरल डाक्यूमेंटेशन से इतर भी बहुत कुछ हो सकता है निलिता की फिल्में ये बात बड़ी आसानी से समझा देती हैं। क्यों एक फिल्म कला नहीं हो सकती और एक फिल्म कलाकार। एक फिल्मकार एक सलाहकार, मनोवैज्ञानिक और एक रिफोर्मर भी हो सकता है। बस उसका अपनी चीजों से जुड़ाव हो। अपनी फिल्मों के लिये और उसके चरित्रों के लिये उसके भीतर एक गजब तरह की आस्था हो और उसके अपने कन्सर्न फिल्म के समानान्तर सांस लेते हो। तो शायद फिल्म बनाने की पूरी घटना एक अनुभव बन सकती है। और फिल्म का हर एक चरित्र कोई बेहद अपने करीब का कोई चरित्र। निलिता की बातें कम से कम इस तरह का विश्वास पनपाने में सफल रहती हैं। वो कहती हैं कि फिल्म के चरित्रों के साथ उनका इतना लगाव हो जाता है कि वो उनसे आशा करने लगते हैं कि एक फिल्मकार होने के नाते मैं उनकी निजी समस्याओं को भी सुलझा सकती हूं। वो मुझे अपने निजी राज बताने लगते हैं और चाहते हैं कि मैं उनकी समस्याओं का समाधान कर दूंगी। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.nilitavachani.com/Films/Eyes/EyesSynopsis.htm"&gt; आइज आफ स्टोन&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; राजस्थान के भिलवाड़ा के एक गांव की 19 साल की औरत शान्ता की कहानी है। शान्ता जिसने बालिग होने की दहलीज को बस पार ही किया है तीन बच्चों की मां है। दस साल की उम्र में शादी और बारह की होते होते बच्चे पैदा करने के अनुभव से जूझती मां शान्ता बीमार सी रहने लगी। शरीर और सर दोनों में दर्द रहने लगा। नौ साल के वैवाहिक जीवन में से पंाच साल बीमारी की इसी हालत में गुजर गये हैं। पति एक ट्रक ड्राईवर है। इस डौक्यूमेंट्री को फिल्माने के दौर में शान्ता अपने मायके आई हुई है। सबका मानना है कि उसपर किसी बाहरी शक्ति ने अधिकार कर लिया है। वो कोई भूत है जो शान्ता के शरीर में समा चुका है। गांव में ये आम मान्यता है। और इसका हल भी मौजूद है। भान्क्या माता के मन्दिर में औरतों में लगने वाले इस भूत से मुक्ति के उपाय मौजूद हैं। शान्ता को लगातार सात शनिवारों तक मन्दिर में चौखी भरनी होगी। और नौवें शनिवार तक उसके भीतर से भूत का साया मुक्त हो जायेगा। इस पूरी प्रक्रिया के बीच निलिता अपने विदेशी सिनेमेटोग्राफर के साथ फिल्म बना रही हैं। उनका कैमरा शान्ता की परेशानियों से जूझता है। कैसे वो 19 साल की औरत दिनभर शारीरिक कष्ट उठा रही है। कैमरा गहरे तक जाकर इसकी पड़ताल करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यहां कई सवाल फिल्म देखते हुए खड़े होते हैं। क्या भूत लगने की या शरीर पर किसी दूसरी आत्मा के अधिकार होने की बातें सच भी होती हैं। यदि हां तो उसके पीछे की वैज्ञानिक अवधारणा क्या है। मनोवैज्ञानिक इस साईकोलौजिकल डिसोर्डर मानते हैं। यूरोप में डैमनिजम जैसी अवधारणाएं पहुत पुरानी रही हैं। उस दौर में भूतों से श्रीर को मुक्ति देने के जो तरीके अपनाये गये वो बहुत वहशियाना थे। सामाजिक सुधार आन्दोलनों के बाद यूरोप इस अवधारणा से मुक्त हो सका। लेकिन भारत जैसे देश में आज तक इस तरह की अवधारणाओं को मिथ्यात्मक नहीं माना जा सका है। निलिता की इस फिल्म से इस तथ्य की जड़ें और मजबूत हो जाती हैं। आज भी राजस्थान, मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में दैवीय शक्तियों के प्रकोप की बातों पर लोगों का गहरा विश्वास है। ओझा और भोपा जैसे लोगों पर लोगों की गांवों में बड़ी आस्था  है। पर इन आस्थाओं का आधार वास्तव में कितना मजबूत है। आइज आफ स्टोन इस आधार की कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करती। फिल्म पजेशन के इस कन्सेप्ट के मानवीय पक्ष पर केन्द्रित रहती है। निलिता शान्ता और उसके पति के बीच के सम्बन्धों की पड़ताल भी करती हैं। और इस पड़ताल के बीच से कुछ चौंकाने वाली बातें उभर आती हैं। कैसे उसके पति के लिये पत्नी एक ऐसी चीज है जिसका बदल जाना कोई खास अहमियत नहीं रखता। वो बताता है कि कैसे अगर उसे लगा कि पत्नी किसी काम की नहीं रही तो उसे बदला जा सकता है। वो बताता है कि गांव में ऐसा तो होता ही है। पैसे देकर नई पत्नी को लाया जा सकता है और मौजूदा पत्नी को किसी और को दे दिया जा सकता है। पांच से दस हजार रुपये जुगाड़ने भर की देर है। शान्ता अपनी बीमारी के बीच इस गहरी असुरक्षा से भी जूझ रही है कि कहीं उसे उसका पति छोड़ न दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; निलिता की इस फिल्म में डाक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म के बीच के अन्तर को खत्म सा होते देखा जा सकता है। एक डाक्यूमेंट्री फिल्म तथ्यों के परे मानवीय भावनाओं के इर्द गिर्द खड़ी होकर भी अपनी पूर्णता बनाये रख सकती है। वो एक पूरी फिल्म की तरह लग सकती है। उसके चरित्र पूरी तरह वास्तविक होने के बावजूद पूरी तरह मझे हुए कलाकार लग सकते हैं। उनकी विडम्बनाएं किसी फिल्म की गढ़ी हुई विडम्बनाएं लग सकती हैं। सच कई बार कितना नाटकीय हों जाता है और हमारे असल जीवन में उसकी नाटकीयता की झलकियां बड़ी आसानी से तलाशी जा सकती हैं। बस उसके लिये एक समझ होना जरुरी है। इसे हम जिन्दगी की समझ भी कह सकते हैं। निलिता उस तलाश में कामयाब रहती हैं। फिल्म देखते हुए कई बार लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि शान्ता जिस तरह की उटपटांग हरकतें कर रहीं है उसकी वजह कैमरा है। खुद निलिता ये बात कह कहती हैं कि ये असम्भव नहीं है। पर जब कैमरा वहां नहीं होता तब भी गांव में अन्य महिलाएं इस प्रक्रिया से जूझती रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; फिल्म को हिस्सों में देखने के बाद भी एक जिज्ञासा जगती है कि अब शान्ता का क्या होगा। कहीं उसका पति उसे छोड़ तो नहीं देगा। वो कब ठीक होगी। और कब अपनी दिनचर्या को सामान्य कर पायेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  आईज आफ स्टोन निलिता वचानी की पहली डाक्यूमेंट्री फिल्म है। इससे पहले वो सलाम बाम्बे में स्क्रिप्ट सुपरवाईजर और असिस्टेंट डाईरेक्टर की भूमिका निभा चुकी हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.nilitavachani.com/index.htm"&gt;सब्जी मंडी के हीरे&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; निलिता की एक और बेहतरीन फिल्म है जो बसों में सामान बेचने वाले एक आदमी हस्मत की कहानी है। इस फिल्म का जिक्र कभी और विस्तार से करने का मन है। निलिता की होम स्पाउन नाम से एक किताब भी आ चुकी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के आईपी कालेज से गंेजुएशन करने के बाद पिेन्सेल्वेनिया और सिकागो से एम ए किया। उनकी फिल्में 30 से ज्यादा फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जा चुकी हैं। 1992 में उन्ेंह राष्ट्रपति द्वारा दिये जाने वाले रजत कमल पुरस्कार से नवाजा गया और इसी साल मुम्बई फिल्म फेस्टिवल में उनकी फिल्म को पुरस्कृत किया गया। इसके अलावा भी कई विदेशी फेस्टिवल्स में उनकी फिल्में पुरस्कार जीत चुकी हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-4776720921804229949?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/4776720921804229949/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=4776720921804229949' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4776720921804229949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/4776720921804229949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='भूत के प्रकोप से मुक्ति की सच्ची कहानी'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S4DXL8b23DI/AAAAAAAAAbo/KL5z-XigFuk/s72-c/vachani4_DebrajRay_s.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-6121413463417435694</id><published>2010-01-26T05:28:00.000-08:00</published><updated>2010-01-26T05:50:51.219-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिल्ड्रन आफ पायर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नेश्नल अवार्ड'/><title type='text'>लाशों से कफन बीनने वालों पर बनी फिल्म को नेश्नल अवार्ड</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S17sXSj4bTI/AAAAAAAAAak/cGwtJzs3Hzs/s1600-h/mateen.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 162px; height: 194px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S17sXSj4bTI/AAAAAAAAAak/cGwtJzs3Hzs/s320/mateen.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431038085518880050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; जामिया के मासकम्यूनिकेशन रिसर्च सेन्टर  में साउन्ड के लेक्चरार मतीन अहमद को  फिल्म चिल्ड्रन आफ पायर की साउन्ड डिजाईनिंग के लिये इस बार का नेश्नल अवार्ड दिया जा रहा है। ये फिल्म वाराणसी के उन 6 बच्चों की कहानी है जो मरघटों पर जलती हुई लाशों पर लिपटे हुए कफन बीनते हैं। कफन बीनकर या कभी कभी चुरा और छीनकर अपनी जिन्दगी जीने वाले इन बच्चों का जीवन कैसे बसर होता है चिल्ड्रन आफ पायर इसे मार्मिक तरीके से दिखाती है। ये वो बच्चे हैं जो चाहते हैं कि लोग जल्द से जल्द मर जांयें ताकि उनकी मौत से इन्हें जीने की वजह मिल पाये। इस अजीब सी विडम्बना से जूझते इन बच्चों को आपस में लडते, गालियां करते, कफन पर झपटते, लावे सी आग में लगभग झुलसता सा देखते लगता है कि चिताओं के दई गिर्द केवल मरे हुए लोगों की लाशें ही नहीं हैं बल्कि इन बच्चों के कई बचपन भी हैं जिनकी मौत कई कई बार होती है। फर्क इतना सा है कि चिता में जलती लाशें कुछ देर में खाक हो जाती हैं पर बचपन की ये लाशें जिन्दा रहती हैं उनकी गरीबी पर व्यंग करती सी। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S17ix-S6p2I/AAAAAAAAAaU/s9aifEpiy3w/s1600-h/pyre1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 194px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S17ix-S6p2I/AAAAAAAAAaU/s9aifEpiy3w/s320/pyre1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431027548819203938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिल्म में साउन्ड की एक खास भूमिका है। एमसीआरसी में मतीन सर के छात्र रोहित वत्स फिल्म की साउन्ड पर बारीकी से बताते हैं कि जलती हुई लाशों की आवाज को औन द स्पाट जिस तरह से इस फिल्म में रिकौर्ड किया गया है वो कमाल है। भीडभड के दश्यों में बच्चों की धीमी आवाज भी बिल्कुल स्पष्ठ सुनाई पडती है। फिल्म में साउन्ड का उतार चढाव बडा लयात्मक है। कुछ दश्यों में शोर शराबे के तुरन्त बाद एकदम सन्नाटा छा जाता है लेकिन इसके बावजूद कोई जर्क साउन्ड में मालूम नहीं पडता। फिल्म में कैमरा उतना क्लोज नहीं जाता जितनी साउन्ड चली जाती है। फिल्म की साउन्ड का सबसे उम्दा पक्ष यह है कि तेज हवा की तरफ माईक्स को प्लेस करने के बावजूद भी साउन्ड फेदफुली रिकौर्ड करने में मतीन सर कामयाब रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S17i80YTMeI/AAAAAAAAAac/NHCrY8A_Y4c/s1600-h/childrenofthepyre518.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 216px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S17i80YTMeI/AAAAAAAAAac/NHCrY8A_Y4c/s320/childrenofthepyre518.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5431027735135990242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मतीन अहमद के साथ ही फिल्म के निर्देशक राजेश एस ज्याला को भी इस फिल्म के लिये स्पेश जूरी अवार्ड से नवाजा गया है। गणतंत्र्ा दिवस के मौके पर यह एक विडम्बना ही है कि ऐसी फिल्में ंतो सराही जा रही हैं जो लाशों पर जीने वाले मरते बचपन की नग्न सच्चाई को दिखा रही हैं पर उस सच्चाई से निजात दिलाने के प्रयास कम ही नजर आते हैं। खैर मतीन सर और फिल्म के निर्देशक और पूरी टीम को इस सच्चाई से वाकिफ कराने के लिये बधाई तो दी ही जानी चाहिये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-6121413463417435694?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/6121413463417435694/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=6121413463417435694' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/6121413463417435694'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/6121413463417435694'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/01/blog-post_26.html' title='लाशों से कफन बीनने वालों पर बनी फिल्म को नेश्नल अवार्ड'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S17sXSj4bTI/AAAAAAAAAak/cGwtJzs3Hzs/s72-c/mateen.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-7234590774111780369</id><published>2010-01-23T00:42:00.000-08:00</published><updated>2010-01-23T00:43:34.603-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आक्रोश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्मों पर'/><title type='text'>एक बेजुबान आक्रोश</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1q0JFgs_bI/AAAAAAAAAZ8/zxtf-LVL4nM/s1600-h/Aakrosh_300.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 267px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1q0JFgs_bI/AAAAAAAAAZ8/zxtf-LVL4nM/s320/Aakrosh_300.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429850368939720114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारे आक्रोष महज एक दुर्घटना बनकर समाप्त हो जाते हैं। ये आक्रोश भी कुछ ऐसा ही था। गोविन्द निहिलानी की इस फिल्म को देखकर ताजा ताजा बस यही समझ में आता है कि आक्रोश की अपनी असल आवाज उसके सन्नाटे में दबी होती है। मगर अक्सर इस चुप्पी के पीछे जो आक्रोश दबा होता है वो इतना खामोश रहता है कि उसका होना न होना बनकर समाप्त हो जाता है। आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार पर बनी इस पूरी फिल्म में सन्नाटा एक तकनीक की तरह प्रयोग हुआ है। पूरी फिल्म में ओम पुरी लहानिया भीखू कुछ नहीं बोलता। लेकिन उसके हावभाव उसके आक्रोश को खुद कह जाते हैं। लहानिया भीखू को उसकी पत्नी की हत्या के लिये  आरोपित किया जाता है। भास्कर कुलकर्नी नसीरुददीन साह को उसका सरकारी वकील बनाया जाता है। अमरीष पुरी अभियोजन पक्ष के वकील हैं। जो कुलकर्नी के गाईड भी हैं। कुलकर्नी वकालत के पेशे में नया है। उसका ये पहला केस है।ं इसलिये वो डरा हुआ है। दूसरी ओर लहानिया उस हत्या के बारे में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। कुलकर्नी के सामने आते ही वो बुत बन जाता है। धीरे धीरे कुलकर्नी केस में ज्यादा रुचि लेने लगा है। क्योंकि उसे लगता है  कि लहानिया ने हत्या की ही नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1q05DQ5c5I/AAAAAAAAAaM/T1dob2Xzdgg/s1600-h/Govind_Nihalani,_2006.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 222px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1q05DQ5c5I/AAAAAAAAAaM/T1dob2Xzdgg/s320/Govind_Nihalani,_2006.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429851192970277778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाष्कर मूलतह एक एलीट इन्टलेक्चुअल समाज का प्रतिनिधित्व करने वाला वकील है लेकिन एक सरकारी वकील के तौर पर वह लहानिया के मामले की जड़ों तक जाकर पड़ताल करना चाहता है। इसके लिये वह लहानिया के घर जा पहुंचता है। वहां उसका बूढ़ा बाप है जो उसे कुछ भी बताने को तैयार नहीं है। उसकी आंखें में एक अजीब सा डर है और उस डर का कारण उसकी जवान बेटी है। लहानिया के जेल जाने के बाद जिसे देखने वाला उसके अलावा और कोई नहीं है। इसलिये उसने अपनी जबान सिल ली है। भाष्कर को अब सच्चाई बताने वाला कोई नहीं है। लेकिन उसके इस तरह बार बार पड़ताल करने के कारण कुछ लोग उसके पीछे लग गये हैं जो उसपर नजरें रखे हुए हैं। नौमत यहां तक पहुंच जाती है कि उसपर हमला किया जाता है। वो जख्मी होकर अपने सीनियर वकील के पास जाता है। वो उसे सलाह देते हैं कि लहानिया का मामला एकतरफा है इसलिये वो उस केस से बैकआउट कर ले। लेकिन भाष्कर कोर्ट से अपने लिये सुरक्षा की गुजारिश करता है। उसे एक गार्ड दे दिया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस बीच पड़ताल करते हुए आदिवासियों के लिये काम करने वाले कुछ कम्यूनिस्ट कार्यकर्ताओं के जरिये भाष्कर को सच्चाई का पता चलता है कि लहानिया की पत्नी की हत्या के पीछे कौन लोग हैं। कि किस तरह कुछ प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों ने उसका बलात्कार और फिर हत्या कर दी। ये लोग उनमें से ही हैं जिनसे भाष्कर की रोज मुलाकात होती है। अब भाष्कर को सच्चाई पता है पर सबूत उसके पास नहीं हैं। और हमारी न्याय व्यवस्था केवल सबूतों पर भरोसा करती है सत्य पर नहीं।&lt;br /&gt; &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1q0VTtNd4I/AAAAAAAAAaE/wal6JYKOEGE/s1600-h/akrosh3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 242px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1q0VTtNd4I/AAAAAAAAAaE/wal6JYKOEGE/s320/akrosh3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429850578908706690" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;  एक दिन कुछ लोग लहानिया के घर में घुसकर उसके बाप और उसकी बहन को धमकाते हैं। वो दोनों डरे हुए हैं। लेकिन भाष्कर की लहानिया के लिये मेहनत को देखकर उनके मन में एक उम्मीद जगती है। पर वो उम्मीद भी पूरी फिल्म में अव्यक्त है। एक दिन बीहड़ जंगलों के रास्ते कोर्ट की ओर जाते हुए रास्ते में लहानिया के बूढ़े बाप की मौत हो जाती है। लहानिया की बहन भागती हुई कोर्ट पहुंचती है। फिल्म समाप्ति की ओर है। उसके पिता का अन्तिम संस्कार किया जा रहा है। चिता में आग लगने वाली है कि तभी लहानिया अपनी बहन की ओर देखता है। उसकी आंखों में एक भयानक किस्म का डर तैर जाता है। वो पास में पड़ी एक कुल्हाड़ी उठाता है। और अपनी बहन के सर पर एक जोरदार प्रहार कर देता है। फिल्म यहां समाप्त हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1qz_Xo9G1I/AAAAAAAAAZ0/pwPw0kzm-VY/s1600-h/akrosh.png1.png"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 225px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1qz_Xo9G1I/AAAAAAAAAZ0/pwPw0kzm-VY/s320/akrosh.png1.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429850202007477074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   आक्रोष का यह अन्तिम दृश्य अपनी स्वर हीनता में आक्रोष की एक बड़ी दार्शनिक सी व्याख्या करता है। कि दरअसल आक्रोष के मूल में बेइन्तहा डर छुपा होता है। एक ऐसा डर जिसमें असहायता घुली होती है। मदद की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी होती हैं। और ऐसे में आदमी अपनी सारी कमजोरियों को खत्म कर देना चाहता है। ताकि जब वह आक्रोष को बदले की शक्ल दे तो ऐसी कोई वजह न बचे जो उसे किसी भी तरह कमजोर करे। और बदले की प्रक्रिया में रुकावट पैदा करे। अपनी बहन की हत्या कर लहानिया अपनी ऐसी ही एक कमजोरी को समाप्त कर देता है। लेकिन ये पूरी फिल्म आदिवासी समाज के एक ऐसे वर्ग की कहानी कहती है जो प्रभावशाली लोगों द्वारा दबाया कुचला जाता रहा है। जिसे सच कह पाने की हिम्मत नहीं है। जिसके अन्दर आक्रोष बहुत है लेकिन ज्यादातर मामलों में वो आक्रोष बेजुबान है इतना कि अपने भरे पूरे अस्तित्व के बावजूद भी देश के किसी कोने से न वो सुनाई देता है न कहीं दिखाई देता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  आक्रोश तकनीकी तौर पर उतनी अच्छी फिल्म नहीं है न ही उसके फ्रेम्स इतने सिनेमैटिक हैं कि उनपर नजरें ठहर सकें। फिल्म को देखने से पहले ये दर्शक अगर ये मूड बना ले कि उसे एक गम्भीर फिल्म देखनी है जो एक सामाजिक सच से उपजी है तो उसे फिल्म अच्छी लग सकती है। बालिवुड फिल्मों की तर्ज पर कोई मसाला ट्रीटमेंट फिल्म में देखने को नहीं मिलता। पूरी फिल्म एक गहरा असन्तोष पैदा करती है। एक नकारात्मक सी संवेदना फिल्म देखने के बाद दर्शक के अन्दर भरी चली जाती है। फिल्म में कहीं मजा नहीं आता। फिल्म एक डौक्यूमेंट सा लगती है। और लगता है ये सारी वजहें फिल्म को कमजोर करती हैं। मगर दूसरी तरह से सोचें तो फिल्म हमें मनोवैज्ञानिक तौर पर उसी असन्तोष से भर रही है जो लहानिया, उसकी बहन और उसके बूढ़े बाप के भीतर गहरा समाया है। इस तरह आक्रोश उनके भीतर छिपे आक्रोश को महसूस कर पाने की समझ देखने वाले के अन्दर भी पैदा कर देती है। इस लिहाज से फिल्म अपना वैचारिक उददेश्य तो पूरा कर ही लेती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2302993896638626421-7234590774111780369?l=picturehaal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://picturehaal.blogspot.com/feeds/7234590774111780369/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2302993896638626421&amp;postID=7234590774111780369' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/7234590774111780369'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2302993896638626421/posts/default/7234590774111780369'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://picturehaal.blogspot.com/2010/01/blog-post_23.html' title='एक बेजुबान आक्रोश'/><author><name>उमेश पंत</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11833008737852448137</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-iQG9WbykQHY/Tq7fnF7VBLI/AAAAAAAAAs0/PMQgPwJ82Cg/s220/P7313025.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S1q0JFgs_bI/AAAAAAAAAZ8/zxtf-LVL4nM/s72-c/Aakrosh_300.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2302993896638626421.post-1870383048357288320</id><published>2010-01-05T00:11:00.000-08:00</published><updated>2010-01-05T01:06:19.213-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बवंडर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्में देखी'/><title type='text'>एक बवंडर से उठी फिल्म</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0Lvhs1jsqI/AAAAAAAAAXY/C8RWkT1wz2U/s1600-h/bawandar.+2"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 232px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0Lvhs1jsqI/AAAAAAAAAXY/C8RWkT1wz2U/s320/bawandar.+2" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5423160263558017698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान की भंवरी देवी को शायद आप अब तक न भूले हों।  1992 में राजस्थान की भतेरी गांव की इस महिला का गांव के ही कुछ उच्च जाति के लोगों ने बलात्कार किया। वजह यह थी कि एक छोटी जाति की महिला होने के बावजूद उसने गांव में हो रहे बाल विवाह को रोकने के लिए सरकार की मदद करनी चाही। केन्द्र सरकार के महिला विकास कार्यक्रम के तहत साथिन नाम की संस्था के साथ उसने सक्रिय रुप से गांव की सामाजिक बुराईयों के उन्मूलन का बीड़ा उठाया। जिसका खामियाजा उसे अपनी आबरु लुटाकर उठाना पड़ा। लेकिन कहानी का और शर्मनाक पक्ष तब सामने आता है जब हमारे देश&lt;br /&gt; की बिकी हुई कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और यहां तक कि न्यायपालिका का उसके साथ पूर्वाग्रही व्यवहार होता है। जज फैसला देता है कि एक उंची जाति का व्यक्ति एक नीची जाति की महिला का बलात्कार कर खुद के सामाजिक सम्मान को चुनौती नहीं दे सकता। ये हमारी धार्मिक परम्पराओं के खिलाफ है। यहां तक कि जज अपने 22 पेज के फैसले में एक और तर्क देते हैं कि यह मामला इसीलिए भी सच नहीं लगता कि एक आदमी जिसने अपनी पत्नी के साथ अग्नि को साक्षी मानकर उसकी रक्षा की कसमें खाई हैं वो कैसे अपनी आंखों के सामने उसके साथ ऐसा कुकर्म होने दे सकता है।  &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0LvxzpyAfI/AAAAAAAAAXg/Dfv2TK-amvk/s1600-h/bhavari+devi"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 270px; height: 180px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0LvxzpyAfI/AAAAAAAAAXg/Dfv2TK-amvk/s320/bhavari+devi" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5423160540265578994" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; इसीलिये भंवरी देवी का मामला झूठा है। और उसे न्याय नहीं मिलता। क्षेत्र के पुलिस विभाग से लेकर एमएलए और यहां तक कि जज तक उंची जाति के दबाव में आकर उसके खिलाफ फैसला देते हैं। पर वह टूटती नहीं। उसका संघर्श जारी रहता है। खुद प्रधानमंत्री उसके मामले में रुचि लेते हैं। मामला सीबीआई के पास चला जाता है। एक गांव का मुद्दा देषव्यापी मुहिम में मदल जाता है। देश भर के एनजीओ और महिला संगठन मुद्दे को भुनाने में जुट जाते हैं। भंवरी देष भर के महिला संगठनों के लिए आईकन बन जाती हैं। उसकी बहादुरी की चर्चाएं आज भी होती हैं। लेकिन न्याय उसे नहीं मिलता। &lt;br /&gt;उस मामले ने उन दिनों एक बवंडर खड़ा किया था और इस बवंडर को जग मुंदरा ने इसी नाम से फिल्मा लिया। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0LwPpNhfYI/AAAAAAAAAXo/ih-AGHSxOnQ/s1600-h/mundara.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 204px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0LwPpNhfYI/AAAAAAAAAXo/ih-AGHSxOnQ/s320/mundara.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5423161052858776962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तहलका की एक रिपोर्ट की मानें तो भंवरी जग मुंदरा की सन 2000 में बनी इस फिल्म से नाखुश हैं। उसका कहना है कि उसको न्याय दिलाने में फिल्म कोई भूमिका नहीं निभाती। मुंदरा ने उसको न्याय दिलाने का वादा किया था। लेकिन फिल्म बना लेने के बाद वो सब भूल गये। बवंडर इसी सच्ची घटना पर आधरित एक फिल्म है जिसके केन्द्र में भंवरी देवी की कहानी है। फिल्म में भंवरी सांवरी हो गई है। सांवरी राजस्थान के एक साधारण से गांव की बड़ी साधारण सी औरत है। जिसे इतना ही मालूम है कि वो गांव की एक औरत है जिसको गांव की साधारण परंम्पराओं को आगे बढ़ाते हुए एक औरत बनकर जीना है। फिल्म शुरु होती है बालविवाह के एक सार्वजिनक आयोजन से जहां पर कई छोटे बच्चे आपस में ब्याहे जा रहे हैं। हमेशा की तरह इस तरह के विवाह गांव की परम्परा में शुमार हैं। जिसमें असामान्य जैसा कुछ भी किसी को नहीं लगता। फलतह सांवरी को भी नहीं। गांव में एक एनजीओ है जिसको एक महिला शोभा माथुर साथिन नाम से चला रही हैं। ये महिला एक दिन सांवरी से मिलने आती हैं और उससे अपने एनजीओ से जुड़कर बालविवाह के खिलाफ आवाज उठाने का आग्रह करती है। लेकिन सांवरी को इस बात से कोई खास लेना दिना नहीं है। उसे अपने साधारणत्व से बाहर निकलने की कोई खास वजह नजर नहीं आती। महिला निराश होकर चली जाती है। लेकिन सांवरी के अन्दर कुछ ऐसा है जो उसे गांव की अन्य साधारण महिलाओं से अलग बनाता है। उसके अन्दर बड़ा गजब को आत्मविश्वास है। वो अपने अधिकार के लिये लड़ना जानती है। सांवरी अपनी बेटी को पढ़ाना चाहती है। उसका पति सोहन शहर में रिक्सा चलाता है। उसे अपनी पत्नी से बहुत प्यार है। वह शहर में रिक्सा चलाने के बजाय यहीं गांव में रहकर खेती करना चाहता है। एक दिन सांवरी को लगता है कि उसे एनजीओ वाली महिला का साथ  देना चाहिये और वो साथिन के आफिस जाकर उससे मिलती है। अब सांवरी साथिन की सक्रिय सदस्य हो गई है। उसके घर में साथिन का बोर्ड लग गया है। घर वाले भी इस बात से खुश हैं। इसी बीच गांव की ही बड़ी जाति का एक आदमी गांव की किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ करता है। लड़की इसकी खबर साथिन के सदस्यों को देती है। सांवरी के नेतृत्व में इस घटना के विरोध में एक जुलूस निकलता है। और ये महिलाएं उस आदमी की पिटाई करती हैं। इस घटना के बाद से सांवरी बड़ी जाति के प्रभावशाली पुरुषवादी मानसिकता के लोगों के  आंखों की किरकिरी बन जाती है। &lt;br /&gt;  &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0LwdhHwOiI/AAAAAAAAAXw/DUVfGlbqCgA/s1600-h/bawandar+1"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 221px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/S0LwdhHwOiI/AAAAAAAAAXw/DUVfGlbqCgA/s320/bawandar+1" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5423161291205261858" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt; एक दिन फिर गांव में बाल विाह का आयोजन हो रहा होता है। इसकी खबर पुलिस को हो जाती है। पुलिस वहां आती है और इन्सपैक्टर बताता है कि ये खबर उसे गांव ही से किसी ने दी है। गांव का सरपंच समझ जाता है कि यह काम सांवरी का ही है। उस रोज वो अपने परिवार के आदमियों के साथ सांवरी के घर जाकर तोड़ फोड़ करता है। और उसे धमकाता है कि सांवरी अपनी औकात में रहे। एक दिन सांवरी अपने पति के साथ अपने बंजर खेत में काम कर रही रही होती है। कि सरपंच अपने आदमियों के साथ वहां आ धमकता है। उसके पति को पीटने के बाद उसकी आंखों के सामने सभी बारी बारी से उसका बलात्कार करते हैं। और वहां से चले जाते हैं। सांवरी बुरी तरह टूट जाती है। घटना की रात वो सो नहीं पाती। अगले दिन वो अपने पति के साथ थाने में एफआईआर लिखाने जाती है। थानेदार एफआईआर लिखने से मना कर देता है। वो बलात्कार का सबूत मांगता है और मेडिकल सर्टिफिकेट लाने के लिये कहता है। वो सर्टिुिकेट लेने के लिये अस्पताल जाती है लेकिन वहां कोई महिला डाक्टर नहीं होती। दूसरे अस्पताल में जाती है तो वहां  कोर्ट के आर्डर के बिना सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया जाता है। सांवरी शोभा को घटना की जानकारी देती है। शोभा न्याय की लड़ाई लड़ने में उसका साथ देती है। और इस तरह उसका मुद्दा गांव से उठकर देषव्यापी हो जाता है। लेकिन अन्त में जज उसके खिलाफ फैसला देता है। और फिल्म हमारी न्याय व्यवस्था, जाति प्रथा, राजनैतिक पूर्वाग्रहों के साथ एक और बड़े मुद्दे पर बात करती है। वो ये कि शोभा जैसी महिलाएं जो सांवरी जैसी महिलाओं के साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ती हैं उन्हें खुद कितना मजबूत होना पड़ता है। खुद ऐसे सामाजिक कार्यों में उनका परिवार उन्हें कितनी मदद करता है। शोभा का पति जो कि समाजशास्त्र का एक प्रोफेसर है वो खुद उसके इस सामाजिक जीवन से परेशान है जिस वजह से वो घर की तरफ ध्यान नहीं दे पाती। फिल्म सामाजिक कार्यों में लगे ऐसे लोगों के पारिवारिक कलह पर भी ध्यान केन्द्रित करवाती है। लेकिन सवाल यही है कि एक मामला जो इतने बड़े स्तर पर उछाला गया, जिसकी देशभर में इतनी चर्चा
